

डीईओ ने बीईओ को दिया 7 दिन का अल्टीमेटम
समाचार प्रकाशित होते ही हरकत में आया विभाग…अब मांगा गया जवाब…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,06 जून 2026 (घटती-घटना)। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई जानकारी को 222 दिनों तक लंबित रखने के मामले में प्रकाशित खबर का असर अब साफ दिखाई देने लगा है, जिस मामले में महीनों तक जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से कोई ठोस पहल नजर नहीं आई,उसी मामले में समाचार के प्रमुखता से प्रकाशित होने के बाद जिला शिक्षा अधिकारी कार्यालय सक्रिय हो गया है,अब जिला शिक्षा अधिकारी अजय कुमार मिश्रा ने विकासखंड शिक्षा अधिकारी सूरजपुर हरेन्द्र सिंह को सात दिनों के भीतर जानकारी उपलब्ध कराने का अल्टीमेटम जारी किया है।
दरअसल,आवेदक द्वारा 24 अक्टूबर 2025 को सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन प्रस्तुत किया गया था,निर्धारित समय सीमा बीतने के बाद भी जानकारी नहीं दी गई,इसके बाद प्रथम अपील दायर की गई और 30 जनवरी 2026 को जिला शिक्षा अधिकारी ने 10 दिनों के भीतर सूचना उपलब्ध कराने का आदेश भी जारी किया था,लेकिन आदेश जारी होने के चार महीने से अधिक समय बीत जाने के बाद भी सूचना उपलब्ध नहीं कराई गई।
अब सात दिनों पर टिकी निगाहें…
फिलहाल पूरे मामले में अब निगाहें जिला शिक्षा अधिकारी द्वारा दिए गए सात दिन के अल्टीमेटम पर टिकी हैं,यदि निर्धारित अवधि में जानकारी उपलब्ध करा दी जाती है तो यह माना जाएगा कि खबर के बाद प्रशासनिक कार्रवाई ने असर दिखाया,लेकिन यदि इस बार भी आदेश का पालन नहीं हुआ तो मामला और गंभीर रूप ले सकता है,फिलहाल इतना तो तय है कि 222 दिनों तक फाइलों में कैद रही सूचना अब सुर्खियों के दबाव में बाहर आने की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है,समाचार का असर हुआ है,लेकिन असली परीक्षा यह होगी कि सात दिन बाद जानकारी मिलती है या फिर एक और आदेश फाइलों के ढेर में खो जाता है।
पत्रकारिता की भूमिका फिर हुई साबित
यह पूरा घटनाक्रम एक बार फिर साबित करता है कि जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने वाली पत्रकारिता आज भी प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित कराने का प्रभावी माध्यम है, जिस सूचना के लिए आवेदक 222 दिनों से भटक रहा था,उसी मामले में खबर प्रकाशित होने के बाद विभागीय सक्रियता दिखाई देना अपने आप में बहुत कुछ कहता है,अब सभी की निगाहें अगले सात दिनों पर टिकी हैं,यदि जानकारी उपलब्ध हो जाती है तो यह माना जाएगा कि खबर ने असर दिखाया,लेकिन यदि इस बार भी आदेश का पालन नहीं हुआ तो सवाल केवल सूचना के अधिकार का नहीं रहेगा,बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता का बन जाएगा,आखिर लोकतंत्र में सूचना जनता का अधिकार है,और अधिकार को महीनों तक फाइलों में बंद रखना किसी भी व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं माना जा सकता।
जब फाइलें नहीं चलीं…तब खबर चली…
कहावत है कि जहां फाइलों की रफ्तार थम जाती है, वहां खबरों की स्याही बोलने लगती है, इस मामले में भी कुछ ऐसा ही देखने को मिला। 222 दिनों से लंबित सूचना और प्रथम अपीलीय आदेश की अनदेखी को लेकर जब मामला समाचार पत्र दैनिक घटती-घटना में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ, तब प्रशासनिक तंत्र की सुस्ती पर सवाल खड़े हुए,खबर के माध्यम से यह तथ्य सामने आया कि सूचना का अधिकार कानून की निर्धारित समय-सीमा तो दूर,प्रथम अपीलीय अधिकारी के आदेश का भी पालन नहीं किया गया, मामला सार्वजनिक होने के बाद शिक्षा विभाग में हलचल बढ़ी और जिला शिक्षा अधिकारी को हस्तक्षेप करना पड़ा।
डीईओ ने माना मामला गंभीर
4 जून 2026 को जारी पत्र में जिला शिक्षा अधिकारी ने स्पष्ट रूप से उल्लेख किया कि प्रथम अपीलीय आदेश के बावजूद जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई है,इसे गंभीर प्रशासनिक लापरवाही मानते हुए विकासखंड शिक्षा अधिकारी सूरजपुर को निर्देशित किया गया कि एक सप्ताह के भीतर वांछित जानकारी उपलब्ध कराकर जिला कार्यालय को अवगत कराया जाए,यह आदेश अपने आप में इस बात का संकेत है कि मामला अब केवल एक आरटीआई आवेदन तक सीमित नहीं रह गया है,बल्कि विभागीय जवाबदेही का विषय बन चुका है।
सवाल अब भी बरकरार
हालांकि ताजा आदेश जारी होने के बाद विभाग सक्रिय नजर आ रहा है,लेकिन कई सवाल अब भी जवाब मांग रहे हैं,यदि प्रथम अपीलीय आदेश का पालन नहीं हुआ तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है? चार महीने तक आदेश की समीक्षा क्यों नहीं हुई? और सबसे बड़ा सवाल यह कि आखिर ऐसी कौन सी जानकारी थी जो 222 दिनों तक आवेदक को नहीं दी गई? इन सवालों के जवाब अभी सामने आना बाकी हैं।
लोकतंत्र में सूचना अधिकार…एहसान नहीं…
सूचना का अधिकार अधिनियम नागरिकों को शासन और प्रशासन में पारदर्शिता सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम प्रदान करता है,लेकिन जब जानकारी देने में महीनों की देरी होती है,तब यह कानून की मूल भावना को कमजोर करता है,इस मामले ने एक बार फिर यह साबित किया है कि मीडिया की सतर्कता और जनहित के मुद्दों को प्रमुखता से उठाने की भूमिका आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है,दैनिक घटती-घटना द्वारा मामले को प्रमुखता से उठाए जाने के बाद जिस तरह विभाग हरकत में आया है, उससे यह स्पष्ट है कि जवाबदेही तय कराने में स्वतंत्र पत्रकारिता की भूमिका अब भी प्रभावी बनी हुई है।
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