- रिकॉर्ड में टीका लग गया,पशुपालक बोले…हमारे मवेशियों तक टीम पहुंची ही नहीं…
- चापा-खुरा टीकाकरण पर उठे सवाल,ऑनलाइन आंकड़े और जमीनी हकीकत में बड़ा अंतर
- बिना टीका लगे ही भर दिए आंकड़े? खड़गवां पशु चिकित्सालय पर लगे गंभीर आरोप
- पशुओं के स्वास्थ्य से खिलवाड़ या कागजी सफलता? खड़गवां में जांच की मांग तेज
-संवाददाता-
खड़गवां (एमसीबी),05 जून 2026 (घटती-घटना)। पशुपालन विभाग द्वारा संचालित चापा-खुरा (एफएमडी) टीकाकरण अभियान को लेकर खड़गवां विकासखंड में गंभीर सवाल खड़े होने लगे हैं, विभागीय रिकॉर्ड और ऑनलाइन पोर्टल में जहां टीकाकरण अभियान को लगभग शत-प्रतिशत सफल बताया जा रहा है, वहीं दूसरी ओर कई पशुपालकों का दावा है कि उनके पशुओं तक टीकाकरण दल कभी पहुंचा ही नहीं। ऐसे में विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है, क्षेत्र के ग्रामीणों और पशुपालकों का आरोप है कि कई गांवों में पशुओं का नियमित टीकाकरण नहीं किया गया, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में सभी पशुओं को टीकाकृत दर्शा दिया गया है, यदि यह आरोप सही साबित होते हैं तो मामला केवल लापरवाही का नहीं बल्कि सरकारी अभिलेखों में गलत जानकारी दर्ज किए जाने का भी हो सकता है।
रिकॉर्ड में सफलता,गांवों में सवाल
पशुपालकों का कहना है कि चापा-खुरा रोग पशुओं के लिए बेहद खतरनाक संक्रामक बीमारी है,सरकार हर वर्ष इसके नियंत्रण के लिए बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान चलाती है,लेकिन खड़गवां क्षेत्र के कई ग्रामीणों का दावा है कि उनके पशुओं को वर्षों से कोई टीका नहीं लगाया गया,इसके बावजूद विभागीय रिकॉर्ड में टीकाकरण पूर्ण होना कई सवालों को जन्म दे रहा है,सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि पशुओं तक टीका पहुंचा ही नहीं तो ऑनलाइन पोर्टल में उनकी एंट्री किस आधार पर की गई?
15 वर्षों से जमे कर्मचारियों पर भी उठे सवाल
इस पूरे विवाद के बीच विभाग में लंबे समय से एक ही स्थान पर पदस्थ कर्मचारियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठने लगे हैं,स्थानीय लोगों का कहना है कि कुछ कर्मचारी 15 वर्ष या उससे अधिक समय से एक ही क्षेत्र में कार्यरत हैं,ग्रामीणों का मानना है कि लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से जवाबदेही कमजोर होती है और पारदर्शिता प्रभावित होती है,ग्रामीणों ने मांग की है कि ऐसे कर्मचारियों के कार्यकाल और कार्यप्रणाली की भी समीक्षा की जाए।
क्या बिना टीका लगाए ही भर दिए गए आंकड़े?
ग्रामीणों का आरोप है कि कई बार टीकाकरण दल गांवों तक पहुंचे बिना ही रिपोर्ट तैयार कर देते हैं,यदि ऐसा हुआ है तो ऑनलाइन पोर्टल में दर्ज आंकड़ों की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिन्ह लग सकता है,स्थानीय पशुपालकों का कहना है कि यदि स्वतंत्र एजेंसी या प्रशासन द्वारा गांव-गांव जाकर भौतिक सत्यापन कराया जाए तो वास्तविक स्थिति सामने आ सकती है।
पूरे जिले में जांच की उठी मांग…
ग्रामीणों के बीच यह चर्चा भी है कि मामला केवल खड़गवां तक सीमित नहीं हो सकता,यदि जांच शुरू होती है तो एमसीबी जिले के अन्य विकासखंडों की स्थिति भी सामने आ सकती है,पशुपालकों का कहना है कि विभागीय आंकड़ों और वास्तविक स्थिति का मिलान कराया जाना चाहिए ताकि यह स्पष्ट हो सके कि कितने पशुओं का वास्तविक टीकाकरण हुआ और कितने केवल कागजों में दर्ज हैं।
बेजुबान पशुओं की सेहत से जुड़ा मामला
विशेषज्ञों के अनुसार चापा-खुरा रोग (एफएमडी) पशुओं में तेजी से फैलने वाली बीमारी है। यदि समय पर टीकाकरण न हो तो पशुधन को भारी नुकसान हो सकता है,ग्रामीणों का कहना है कि यदि टीकाकरण में वास्तव में लापरवाही बरती गई है तो इसका सीधा असर पशुपालकों की आय और पशुधन की सुरक्षा पर पड़ सकता है, यही कारण है कि लोग इसे केवल विभागीय मामला नहीं बल्कि पशुपालकों और बेजुबान पशुओं के स्वास्थ्य से जुड़ा गंभीर विषय मान रहे हैं।
क्या ऑनलाइन पोर्टल की होगी जांच?
मामले में एक बड़ा सवाल यह भी है कि ऑनलाइन पोर्टल में अपलोड किए गए आंकड़े किस आधार पर दर्ज किए गए? क्या प्रत्येक पशु का भौतिक सत्यापन किया गया था? क्या टीकाकरण के दौरान फोटो,टैगिंग या अन्य प्रमाण संलग्न किए गए थे? यदि जांच होती है तो संभवतः इन सभी बिंदुओं की पड़ताल की जा सकती है।
विभाग ने क्या कहा?
जब इस संबंध में पशु चिकित्सा अधिकारी खड़गवां जे.पी. कंवर से जानकारी ली गई तो उन्होंने कहा मेरे द्वारा टीकाकरण के लिए दवाई उपलब्ध कराई जाती है और मेरी जानकारी में टीकाकरण किया जा रहा है, विभागीय अधिकारी के इस बयान के बाद अब सवाल यह है कि यदि टीकाकरण किया जा रहा है तो फिर ग्रामीणों और पशुपालकों की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं?
अब प्रशासन की ओर टिकी निगाहें…
मामले के सामने आने के बाद क्षेत्र में निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। पशुपालकों का कहना है कि गांव-स्तर पर सत्यापन कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जानी चाहिए,यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं तो यह केवल आंकड़ों की गड़बड़ी नहीं बल्कि सरकारी योजनाओं की निगरानी व्यवस्था पर भी गंभीर सवाल खड़ा करेगा, फिलहाल खड़गवां में एक ही सवाल चर्चा का विषय बना हुआ है क्या वास्तव में सभी पशुओं का टीकाकरण हुआ है, या फिर चापा-खुरा रोग के खिलाफ लड़ाई केवल सरकारी रिकॉर्ड और ऑनलाइन पोर्टल तक ही सीमित रह गई है?
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