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खड़गवां@ कैबिनेट मंत्री के गृह क्षेत्र में बदहाल पशु चिकित्सालय चपरासी के भरोसे चल रही व्यवस्था!

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खड़गवां पशु चिकित्सा केंद्र में डॉक्टर नदारद, इलाज के लिए घंटों भटक रहे किसान
सरकार के दावों पर सवाल, पशुपालकों ने उठाई कार्रवाई की मांग
-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां,04 जून 2026(घटती-घटना)।
प्रदेश सरकार ग्रामीण क्षेत्रों में पशुपालकों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने और पशुधन संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करती है,करोड़ों रुपये की योजनाएं चलाई जा रही हैं,पशु चिकित्सा सेवाओं को सुदृढ़ बनाने की बातें की जा रही हैं,लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है,स्थिति इतनी चिंताजनक है कि कैबिनेट मंत्री के गृह क्षेत्र में स्थित पशु चिकित्सालय की हालत स्वयं सरकारी दावों की पोल खोलती नजर आ रही है।
खड़गवां मुख्यालय स्थित पशु चिकित्सा केंद्र इन दिनों अव्यवस्था,लापरवाही और अधिकारियों की अनुपस्थिति के कारण चर्चा का विषय बना हुआ है,अस्पताल का निर्धारित समय सुबह 7 बजे से 11 बजे और शाम 5 बजे से 6 बजे तक है,लेकिन स्थानीय लोगों के अनुसार सुबह 9ः30 बजे तक भी अस्पताल में कोई जिम्मेदार अधिकारी या चिकित्सक मौजूद नहीं था, पूरा केंद्र चपरासी के भरोसे संचालित होता दिखाई दिया।
कैबिनेट मंत्री के गृह क्षेत्र में ही यह हाल…
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कैबिनेट मंत्री के गृह क्षेत्र में स्थित पशु चिकित्सालय की ऐसी स्थिति है तो दूरस्थ ग्रामीण और आदिवासी अंचलों में पशु चिकित्सा सेवाओं की क्या हालत होगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि मंत्री के क्षेत्र में ही अस्पताल समय पर संचालित नहीं हो रहा है तो उन क्षेत्रों की स्थिति का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है जहां अधिकारियों की निगरानी और भी कम है, यही कारण है कि अब लोग केवल डॉक्टरों की अनुपस्थिति पर सवाल नहीं उठा रहे, बल्कि पूरे विभागीय तंत्र की कार्यप्रणाली पर भी प्रश्नचिह्न लगा रहे हैं।
जवाब का इंतजार…
फिलहाल खड़गवां पशु चिकित्सालय की यह स्थिति कई सवाल छोड़ रही है। क्या विभाग इस मामले को गंभीरता से लेगा? क्या डॉक्टरों की अनुपस्थिति की जांच होगी? क्या पशुपालकों को समय पर उपचार सुविधा मिल पाएगी? इन सवालों का जवाब प्रशासन को देना होगा,क्योंकि पशुओं का इलाज इंतजार नहीं करता और किसानों की परेशानी केवल फाइलों में दर्ज आंकड़ों से दूर नहीं होती।
किसानों ने उठाई कार्रवाई की मांग…
ग्रामीणों और पशुपालकों ने प्रशासन से मांग की है कि अस्पताल में चिकित्सकों की नियमित उपस्थिति सुनिश्चित की जाए,साथ ही अस्पताल की कार्यप्रणाली की जांच कर लापरवाह अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की जाए,लोगों का कहना है कि पशुधन ग्रामीण अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार है, ऐसे में पशु चिकित्सा सेवाओं में लापरवाही सीधे किसानों की आजीविका पर चोट करती है। यदि समय रहते सुधार नहीं किया गया तो ग्रामीणों का सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था से विश्वास उठ जाएगा।
डॉक्टर गायब,चपरासी संभाल रहा अस्पताल
ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल में अक्सर यही स्थिति बनी रहती है, पशुपालक अपने बीमार मवेशियों को लेकर सुबह-सुबह अस्पताल पहुंच जाते हैं,लेकिन वहां डॉक्टर की जगह चपरासी मिलता है, किसान इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं,लेकिन उन्हें केवल इंतजार ही नसीब होता है,लोगों का कहना है कि यदि अस्पताल में डॉक्टर मौजूद नहीं रहेंगे तो पशुओं का उपचार कौन करेगा? क्या अब पशु चिकित्सा केंद्रों को भी भगवान भरोसे छोड़ दिया गया है?
मवेशियों की बीमारी बढ़ रही,किसान परेशान
खड़गवां क्षेत्र के ग्रामीणों की आजीविका का बड़ा हिस्सा पशुपालन पर निर्भर है,गाय,बैल, भैंस और बकरियां ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ मानी जाती हैं,लेकिन जब पशु बीमार पड़ते हैं तो उनके इलाज के लिए किसानों को सरकारी अस्पताल का सहारा लेना पड़ता है,ग्रामीणों का आरोप है कि अस्पताल पहुंचने पर घंटों इंतजार के बावजूद डॉक्टर नहीं मिलते, कई बार मजबूरी में उन्हें निजी चिकित्सकों की शरण लेनी पड़ती है या बिना इलाज कराए वापस लौटना पड़ता है, इसका सीधा असर पशुओं की सेहत पर पड़ता है और कई मामलों में बीमारी गंभीर रूप ले लेती है।
कागजों में सेवा, जमीन पर सन्नाटा
सरकारी रिकॉर्ड में पशु स्वास्थ्य सेवाओं को लेकर लंबी-लंबी उपलब्धियां दर्ज हैं,टीकाकरण अभियान,पशु उपचार शिविर, कृत्रिम गर्भाधान कार्यक्रम और पशुधन विकास योजनाओं की सफलता के आंकड़े पेश किए जाते हैं,लेकिन खड़गवां पशु चिकित्सालय की स्थिति देखकर लगता है कि कागजों में दौड़ती व्यवस्था जमीन पर पहुंचते-पहुंचते थक जाती है,अस्पताल के बाहर बैठे किसान सवाल पूछ रहे हैं कि यदि अस्पताल खुला है तो डॉक्टर कहां हैं? यदि डॉक्टर उपलब्ध नहीं हैं तो उनकी उपस्थिति दर्ज कैसे हो रही है? और यदि यह स्थिति रोज की है तो जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई क्यों नहीं कर रहे?


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