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स्थायी स्टेनो’ विवाद पर उबल रहा असंतोष,
कलेक्ट्रेट में चर्चा—आखिर किसकी छत्रछाया में चल रहा है यह प्रशासनिक साम्राज्य?
कलेक्टर बदले,सरकार बदली,अधिकारी बदले,
लेकिन नहीं बदला एक नाम,अब सवालों के घेरे में पूरा सिस्टम
-रवि सिंह-
कोरिया,03 जून 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ के सीतापुर में विधायक और नायब तहसीलदार के बीच हुए विवाद की गूंज अभी तक थमी नहीं है,सोशल मीडिया से लेकर अखबारों और न्यूज चैनलों तक वह मामला आज भी सुर्खियों में बना हुआ है, उस घटना ने पूरे प्रदेश को एक संदेश दिया था कि जब प्रशासनिक असंतोष को लंबे समय तक दबाया जाता है, जब शिकायतों को फाइलों में कैद कर दिया जाता है और जब व्यवस्था में संवाद की जगह अहंकार ले लेता है, तब विस्फोट होना तय हो जाता है, लेकिन लगता है कि कोरिया जिले के जिम्मेदार अधिकारी उस घटना से कोई सीख लेने के मूड में नहीं हैं, यही वजह है कि आज कोरिया कलेक्ट्रेट में एक नया सवाल तेजी से गूंज रहा है क्या यहां भी किसी बड़े टकराव या अप्रिय घटना का इंतजार किया जा रहा है?
कलेक्ट्रेट या निजी जागीर?
सरकारी कार्यालयों में प्रतिनियुक्ति एक अस्थायी व्यवस्था होती है,लेकिन कोरिया कलेक्ट्रेट में एक ऐसा मामला चर्चा का विषय बना हुआ है जिसे कर्मचारी अब व्यंग्य में स्थायी प्रतिनियुक्ति मॉडल कहने लगे हैं,लोग पूछ रहे हैं कि आखिर ऐसा कौन-सा प्रशासनिक चमत्कार है कि वर्षों से एक ही व्यवस्था कायम है? कलेक्टर आते हैं…कलेक्टर जाते हैं…नई सरकार आती है…नई नीतियां बनती हैं, लेकिन एक नाम और एक कुर्सी का रिश्ता ऐसा है जिसे कोई हिला नहीं पा रहा,कलेक्ट्रेट के गलियारों में मजाक चल रहा है कि कुछ कर्मचारियों का तबादला शासन करता है और कुछ का तबादला शायद भगवान भी नहीं कर सकते।
सीतापुर में झगड़ा हुआ,यहां असंतोष पनप रहा है…
सीतापुर की घटना एक दिन में नहीं हुई थी,उसके पीछे भी लंबे समय से जमा हो रहा असंतोष था,संवादहीनता थी,अधिकारों का टकराव था, व्यवस्था के प्रति नाराजगी थी, और जब वह सब एक सीमा पार कर गया तो मामला पूरे प्रदेश की सुर्खी बन गया,कोरिया कलेक्ट्रेट में भी कर्मचारी वर्ग के बीच इसी प्रकार की चर्चाएं सुनाई दे रही हैं,लोग खुलकर नहीं बोल रहे, लेकिन अंदरखाने नाराजगी की आग सुलग रही है,कई कर्मचारियों का मानना है कि जब किसी एक व्यक्ति का प्रभाव आवश्यकता से अधिक बढ़ जाता है तो बाकी कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से असंतोष पैदा होता है।
आखिर किस बात का संरक्षण?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि वर्षों से इस मामले को लेकर चर्चाएं हो रही हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं हो रही? क्या किसी ने जांच की? क्या किसी ने प्रतिनियुक्ति की फाइल देखी? क्या किसी ने यह जानने की कोशिश की कि नियम क्या कहते हैं? या फिर मामला इतना विशेष है कि नियम भी दूरी बनाकर चल रहे हैं? कलेक्ट्रेट परिसर में व्यंग्यात्मक टिप्पणी सुनने को मिल रही है कि शायद इस प्रतिनियुक्ति की फाइल पर कोई ऐसा सुरक्षात्मक कवच चढ़ा हुआ है जिसे प्रशासनिक तलवार छू नहीं पा रही।
संभागायुक्त कार्यालय की खामोशी भी चर्चा में…
अब सवाल केवल जिला प्रशासन तक सीमित नहीं है, लोग पूछ रहे हैं कि सरगुजा संभाग का शीर्ष प्रशासनिक कार्यालय आखिर क्या कर रहा है? यदि मामला चर्चा में है तो जांच क्यों नहीं? यदि शिकायतें गलत हैं तो खंडन क्यों नहीं? यदि शिकायतें सही हैं तो कार्रवाई क्यों नहीं? संभागायुक्त कार्यालय की चुप्पी अब खुद एक चर्चा का विषय बन चुकी है, लोग पूछ रहे हैं कि क्या आंखों पर नियमों की पट्टी बंधी है या फिर किसी और कारण से मामला अनदेखा किया जा रहा है?
कर्मचारी पूछ रहे हैं—नियम सबके लिए या चुनिंदा लोगों के लिए?
कलेक्ट्रेट के कर्मचारी खुलकर भले कुछ न कहें,लेकिन उनके बीच एक सवाल बार-बार उठ रहा है, जब अन्य कर्मचारियों के तबादले होते हैं, पदस्थापन बदलते हैं और प्रतिनियुक्तियां समाप्त होती हैं,तब इस मामले में अलग व्यवस्था क्यों? यदि नियम हैं तो उनका पालन क्यों नहीं? और यदि नियम लागू नहीं हैं तो फिर नियम पुस्तिका को संग्रहालय में रख देना चाहिए, कम से कम कर्मचारियों को यह भ्रम तो नहीं रहेगा कि नियम सबके लिए समान हैं।
स्थायी स्टेनो मॉडल प्रशासनिक शोध का विषय बन सकता है
व्यंग्य में कुछ कर्मचारी कहते हैं कि यदि प्रशासनिक प्रशिक्षण संस्थान चाहें तो स्थायी स्टेनो मॉडल पर अलग से शोध करवा सकते हैं, क्योंकि यह एक अनूठा प्रयोग है,जहां प्रतिनियुक्ति अस्थायी होकर भी स्थायी है, जहां बदलाव के दौर में भी कुछ नहीं बदलता, जहां चर्चा बहुत होती है लेकिन निर्णय नहीं होता,और जहां शिकायतें भी घूम-फिरकर वहीं पहुंच जाती हैं जहां से शुरू हुई थीं।
क्या किसी बड़े विवाद का इंतजार है?
सबसे गंभीर सवाल यही है की क्या प्रशासन तब जागेगा जब कोई बड़ा विवाद सामने आएगा? क्या तब संज्ञान लिया जाएगा जब मामला सोशल मीडिया की सुर्खी बन जाएगा? क्या तब जांच होगी जब कर्मचारी खुलकर विरोध करने लगेंगे? सीतापुर की घटना ने यह सिखाया था कि प्रशासनिक असंतोष को हल्के में लेना महंगा पड़ सकता है,लेकिन लगता है कि कोरिया में उस सीख को अभी तक फाइलों में ही रखा गया है।
जवाब चाहिए,चुप्पी नहीं…
यह मामला किसी एक कर्मचारी का नहीं रह गया है,यह प्रशासनिक पारदर्शिता का सवाल है,यह कर्मचारियों के विश्वास का सवाल है, यह व्यवस्था की निष्पक्षता का सवाल है,यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप है तो प्रशासन को सामने आकर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए,और यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है तो कार्रवाई होनी चाहिए,क्योंकि लोकतंत्र में सबसे खतरनाक स्थिति वह नहीं होती जब सवाल उठते हैं,सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब सवाल उठते रहें और जवाब देने वाले मौन साध लें,फिलहाल कोरिया कलेक्ट्रेट में सबसे ज्यादा चर्चा किसी फाइल, किसी योजना या किसी आदेश की नहीं, बल्कि इसी सवाल की है क्या प्रशासन किसी समाधान की तैयारी कर रहा है या फिर सीतापुर जैसी किसी नई सुर्खी का इंतजार?
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