- तबादला सूची जारी,पालन ठप्प – जवाबदेही कौन लेगा?
- वरिष्ठ अधिकारियों के आदेश दरकिनार,अशासन पर चोट
- कोरिया पुलिस में तबादला प्रक्रिया : आदेश और क्रियान्वयन के बीच की दूरी
- प्रशासनिक आदेशों की प्रभावशीलता पर उठते प्रश्न
- तत्काल प्रभाव से लागू आदेश : क्या व्यवस्था समयबद्ध है?
- तबादला नीति,अनुशासन और जवाबदेही की पड़ताल
- आदेश जारी, अमल गायब? कोरिया पुलिस में तबादलों पर उठे बड़े सवाल
- डीजीपी से एसपी तक के आदेश,ज़मीन पर ‘स्थिति यथावत’ की चर्चा
- तबादला एक्सप्रेसः टिकट कटा,ट्रेन नहीं चली!
- कोरिया पुलिस में आदेशों का ‘स्टे मोड’ और कुर्सियों की अटूट निष्ठा
-रवि सिंह-
बैकुंठपुर/कोरिया,08 मार्च 2026 (घटती-घटना)। पुलिस विभाग में अनुशासन को रीढ़ कहा जाता है, ऊपर से आदेश आता है और नीचे तक उसका पालन होता है यही परंपरा मानी जाती है, लेकिन कोरिया जिले में हालात कुछ ऐसे नजर आ रहे हैं कि मानो आदेशों को भी वेटिंग लिस्ट में डाल दिया गया हो, कोरिया जिले में पुलिस विभाग की कार्यप्रणाली को लेकर इन दिनों कई स्तरों पर चर्चा है। एक ओर वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा लगातार तबादला सूचियां जारी की जा रही हैं, दूसरी ओर कुछ मामलों में उनके क्रियान्वयन को लेकर सवाल उठ रहे हैं,मुद्दा केवल स्थानांतरण का नहीं, बल्कि विभागीय अनुशासन, आदेश पालन और प्रशासनिक पारदर्शिता का बन गया है।
पुलिस विभाग की साख आदेश और अनुशासन पर टिकी होती है,यदि आदेशों का पालन वैकल्पिक हो जाए,तो वर्दी की सख्ती केवल परेड तक सीमित रह जाएगी,तबादला सूची का उद्देश्य व्यवस्था में संतुलन बनाना है,न कि फाइलों में स्थायी निवास पाना,अब देखना यह है कि आदेशों की ट्रेन सच में रवाना होगी,या प्लेटफॉर्म पर ही खड़ी रहकर सीटी बजाती रहेगी,कोरिया जिले के हालिया तबादला आदेश कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं, डीजीपी स्तर से लेकर एसपी स्तर तक आदेश जारी हुए हैं,अब मूल प्रश्न यह है की क्या सभी संबंधित अधिकारियों और कर्मचारियों ने नए पदस्थापना स्थल पर कार्यभार ग्रहण कर लिया है? यदि नहीं,तो देरी के कारण क्या हैं? प्रशासनिक व्यवस्था की मजबूती केवल आदेश जारी करने से नहीं,बल्कि उनके प्रभावी और समयबद्ध क्रियान्वयन से सिद्ध होती है,कोरिया पुलिस का यह प्रकरण अब केवल तबादले का मुद्दा नहीं, बल्कि अनुशासन और जवाबदेही की परीक्षा बन चुका है।
अनुशासन या ‘एडजस्टमेंट’?
पुलिस विभाग में आदेशों की अवहेलना कोई साधारण बात नहीं होती,लेकिन यहां तो मानो एक नया प्रशासनिक मॉडल विकसित हो गया है-आदेश जारी करो,पालन पर विचार करो। वरिष्ठ अधिकारी सूची जारी करते हैं, अधीनस्थ कर्मचारी परिस्थिति का मूल्यांकन करते हैं,और फिर तय होता है कि जाना है या नहीं,पुलिस विभाग अनुशासन आधारित संरचना है,यदि वरिष्ठ अधिकारियों के आदेशों का समयबद्ध पालन नहीं होता,तो यह विभागीय नियंत्रण प्रणाली पर प्रश्नचिह्न है, यह भी संभव है कि कुछ मामलों में प्रशासनिक कारणों से कार्यभार ग्रहण में विलंब हुआ हो,या औपचारिक रिलीविंग की प्रक्रिया लंबित हो। परंतु ऐसी स्थिति में पारदर्शिता आवश्यक है।
पहला आयामः डीजीपी का आदेश,ज़मीन पर विराम
26 जून 2025 को छत्तीसगढ़ पुलिस मुख्यालय,नया रायपुर अटल नगर से पुलिस महानिदेशक अरुण देव गौतम द्वारा तबादला सूची जारी हुई,सूची में स्पष्ट लिखा गया है की कोरिया जिले से उप निरीक्षक राजेश तिवारी का तबादला जिला सरगुजा,कागज़ पर तो सब कुछ बहुत अनुशासित दिखा, लेकिन नौ महीने बाद भी यदि संबंधित अधिकारी अपने नए जिले की राह नहीं पकड़ते,तो सवाल उठना लाजि़मी है की क्या आदेश केवल पढ़ने के लिए था? या जाना है,पर अभी नहीं की नीति लागू है? ऐसा प्रतीत होता है कि फाइल ने यात्रा कर ली, पर अधिकारी ने नहीं।
दूसरा आयाम : एसपी का आदेश,थाना वही
24 अक्टूबर 2025 को कोरिया पुलिस अधीक्षक ने आदेश जारी किया की पटना थाना में पदस्थ आरक्षक अमल कुजूर को रक्षित केंद्र बैकुंठपुर भेजा जाए, आदेश की भाषा सख्त थी, पर अमल में नरमी आ गई, पांच महीने बाद भी यदि कुर्सी वही और थाना वही, तो यह मान लेना चाहिए कि तबादला सूची ने केवल कागज़ का वजन बढ़ाया है।
तीसरा आयाम : नया आदेश,पुराना ठिकाना
9 फरवरी 2026 को एक और सूची आई,इस बार पटना थाना से रामायण सिंह को रक्षित केंद्र बैकुंठपुर भेजा गया, पर हालत वही- आदेश आगे बढ़ा, पर कदम नहीं, लगता है कि अब तबादला आदेश में एक नई शर्त जोड़नी पड़ेगी,यदि संबंधित कर्मचारी सहमत हों तो…
कागज़ बनाम ज़मीन
दस्तावेज़ी तौर पर प्रक्रिया पूर्ण दिखाई देती है की आदेश जारी,वितरण सूची संलग्न,हस्ताक्षर और मुहर युक्त प्रति, तत्काल प्रभाव का उल्लेख परंतु यदि कुछ कर्मचारी पूर्व पदस्थापना स्थल पर ही कार्यरत दिखते हैं,तो यह प्रशासनिक व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़ा करता है,तबादला आदेश केवल स्थान परिवर्तन नहीं होता,बल्कि कार्य प्रणाली में संतुलन और पारदर्शिता का माध्यम होता है,लंबे समय तक एक ही स्थान पर पदस्थ रहने से स्थानीय समीकरण और प्रभाव बढ़ते हैं,इसलिए समय-समय पर स्थानांतरण आवश्यक माने जाते हैं।
चर्चा का दूसरा पहलू
सूत्रों के अनुसार जिन कर्मचारियों की चर्चा हो रही है,उनके कार्यकाल के दौरान विवाद और स्थानीय समीकरणों की बातें भी उठती रही हैं, ऐसे में तबादला केवल प्रशासनिक कदम नहीं,बल्कि पारदर्शिता का माध्यम भी माना जाता है,लेकिन जब आदेश ही अमल में न आएं,तो पारदर्शिता की खिड़की भी आधी बंद रह जाती है।
बड़ा सवाल
क्या प्रभाव और पहुंच अनुशासन से ऊपर हो गए हैं?
क्या अब तबादला भी पारस्परिक सहमति का विषय बन गया है?
क्या अधिकारी को पहले पूछना होगा- आपको कहां भेजें?
यदि ऐसा है, तो विभागीय व्यवस्था को नया नाम देना पड़ेगा- स्वैच्छिक स्थानांतरण योजना।
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