



- केंद्र का प्रोजेक्ट या भ्रष्टाचार का लाइसेंस? सोनहत में नियमों को खुली चुनौती
- केंद्र की आड़ में भ्रष्टाचार? एकलव्य विद्यालय निर्माण में घटिया काम, अवैध रेत और पेड़ों की कटाई के आरोप
- शिक्षा के मंदिर की नींव में गड़बड़ी! सोनहत का एकलव्य प्रोजेक्ट गंभीर सवालों के घेरे में
- साल के पेड़ कटे,लकड़ियां गायब, रेत अवैध — सोनहत का एकलव्य प्रोजेक्ट सवालों के घेरे में
- करोड़ों की परियोजना पर भ्रष्टाचार की छाया, सोनहत में एकलव्य विद्यालय निर्माण पर उठे बड़े सवाल
- मिट्टी मिली रेत, घटिया मसाला और मजदूरों का शोषण — एकलव्य निर्माण में बड़ा खेल?
- आदिवासी बच्चों के भविष्य से खिलवाड़? सोनहत में शिक्षा परियोजना पर भ्रष्टाचार के आरोप
- विकास की आड़ में जंगल पर वार! एकलव्य विद्यालय निर्माण में पर्यावरण और नियमों की अनदेखी
- “केंद्र का काम है, राज्य कुछ नहीं कर सकता” — सोनहत में इंजीनियरों की दबंगई पर उठे सवाल
- सोनहत में ‘एकलव्य’ निर्माण पर सवालों का अंबार: केंद्र की आड़ में नियम-कायदों की अनदेखी, गुणवत्ता से लेकर पर्यावरण तक सब कुछ कटघरे में
-राजन पाण्डेय-
सोनहत,07 मार्च 2026(घटती-घटना)। आदिवासी अंचल के बच्चों को बेहतर शिक्षा और आवासीय सुविधा उपलब्ध कराने के उद्देश्य से बनाई जा रही एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय परियोजना इन दिनों गंभीर विवादों में घिरती नजर आ रही है,करोड़ों रुपये की लागत से बन रहे इस विद्यालय के निर्माण कार्य को लेकर स्थानीय ग्रामीणों और जानकारों ने कई गंभीर आरोप लगाए हैं,आरोप है कि निर्माण में गुणवत्ता से समझौता,पर्यावरण को क्षति, श्रम कानूनों की अनदेखी और खनिज नियमों का उल्लंघन जैसे कई मामले सामने आ रहे हैं,सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि इस परियोजना को केंद्र सरकार की एजेंसी के माध्यम से संचालित बताया जा रहा है और इसी का हवाला देकर स्थानीय प्रशासन और विभागीय अधिकारियों को हस्तक्षेप से रोका जा रहा है, इससे यह सवाल उठने लगे हैं कि क्या केंद्र की परियोजना होने का मतलब स्थानीय कानूनों और नियमों से ऊपर हो जाना है।
केंद्र की ओट में नियमों की अनदेखी?– स्थानीय लोगों का आरोप है कि निर्माण स्थल पर जब भी गुणवत्ता या नियमों के पालन को लेकर सवाल उठाए जाते हैं, तो वहां मौजूद इंजीनियरों और ठेकेदार के प्रतिनिधियों का जवाब लगभग एक जैसा होता है, बताया जाता है कि उनका कहना है कि यह केंद्र सरकार की परियोजना है, इसलिए राज्य के अधिकारियों का इसमें कोई दखल नहीं हो सकता, यह कथित बयान कई सवाल खड़े करता है, यदि यह परियोजना केंद्र सरकार की है, तब भी क्या स्थानीय खनिज, वन और श्रम कानून लागू नहीं होंगे? क्या राज्य के अधिकारी किसी भी प्रकार की जांच या निरीक्षण करने के लिए अधिकृत नहीं हैं? विशेषज्ञों का मानना है कि चाहे परियोजना किसी भी सरकार की हो, लेकिन जिस राज्य की भूमि पर वह कार्य हो रहा है वहां के कानूनों का पालन करना अनिवार्य होता है।
निर्माण गुणवत्ता पर गंभीर आरोप– स्थानीय लोगों और निर्माण कार्य पर नजर रखने वाले कुछ जानकारों का कहना है कि विद्यालय निर्माण में गुणवत्ता के मानकों का पालन नहीं किया जा रहा है, आरोप है कि निर्माण में उपयोग की जा रही रेत में मिट्टी की मात्रा अधिक है और सीमेंट का अनुपात भी निर्धारित मानकों से कम बताया जा रहा है, बताया जा रहा है कि मसाले की गुणवत्ता को लेकर कई बार मजदूरों और स्थानीय लोगों ने भी चिंता व्यक्त की है। करोड़ों रुपये की लागत से बनने वाले इस भवन में यदि शुरुआती स्तर पर ही घटिया सामग्री का उपयोग किया जा रहा है, तो भविष्य में भवन की मजबूती और सुरक्षा को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है, लोगों का कहना है कि यदि समय रहते इसकी जांच नहीं की गई तो आने वाले समय में यह भवन छात्रों की सुरक्षा के लिए खतरा भी बन सकता है।
पर्यावरण को नुकसान: साल के पेड़ों की कटाई- निर्माण स्थल के आसपास पर्यावरण को हुए नुकसान को लेकर भी गंभीर आरोप सामने आए हैं, ग्रामीणों के अनुसार परिसर में मौजूद कई पुराने और बड़े साल के पेड़ों को मशीनों के माध्यम से काट दिया गया, यह भी कहा जा रहा है कि पेड़ों की कटाई के बाद उनकी लकडç¸यां मौके से गायब हो गईं, अब सवाल यह उठता है कि क्या इन पेड़ों को काटने के लिए वन विभाग से अनुमति ली गई थी? यदि अनुमति ली गई थी तो उसका रिकॉर्ड सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? नियमों के अनुसार सरकारी भूमि पर कटे हुए पेड़ों की लकडç¸यों को वन विभाग के डिपो में जमा कराया जाना चाहिए। यदि ऐसा नहीं हुआ है तो यह एक गंभीर मामला हो सकता है।
अवैध रेत उत्खनन का आरोप- विद्यालय निर्माण में उपयोग की जा रही रेत को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण स्थल पर पहुंचने वाली रेत का बड़ा हिस्सा आसपास के नदी-नालों से अवैध रूप से निकाला जा रहा है, बताया जा रहा है कि रेत के परिवहन के लिए वैध रॉयल्टी पर्ची या अनुमति का कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं दिख रहा। इसके अलावा निर्माण स्थल पर भारी मात्रा में रेत का भंडारण भी किया गया है, जिसके लिए खनिज विभाग से अनुमति लेना आवश्यक होता है, यदि यह आरोप सही पाए जाते हैं तो यह खनिज अधिनियम का उल्लंघन माना जाएगा और शासन के राजस्व को भी नुकसान पहुंच सकता है।
मजदूरों के साथ भेदभाव के आरोप- निर्माण स्थल पर कार्यरत मजदूरों के साथ व्यवहार को लेकर भी कई सवाल उठे हैं, सूत्रों के अनुसार पुरुष और महिला मजदूरों के बीच मजदूरी में अंतर बताया जा रहा है, कहा जा रहा है कि दोनों समान कार्य करने के बावजूद महिला मजदूरों को कम भुगतान किया जा रहा है। श्रम कानूनों के अनुसार समान कार्य के लिए समान वेतन का प्रावधान है, इसलिए यदि ऐसा हो रहा है तो यह नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है।
जिम्मेदार विभागों की भूमिका पर सवाल- इस पूरे मामले में कई विभागों की भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं, वन विभाग, खनिज विभाग, श्रम विभाग, स्थानीय प्रशासन यदि इतने बड़े निर्माण कार्य में नियमों की अनदेखी हो रही है, तो क्या संबंधित विभागों को इसकी जानकारी नहीं है? या फिर किसी कारणवश इन मामलों को नजरअंदाज किया जा रहा है? स्थानीय लोगों का कहना है कि इतने बड़े प्रोजेक्ट में पारदर्शिता और निगरानी होना आवश्यक है, ताकि भविष्य में किसी प्रकार की अनियमितता सामने न आए।
बच्चों के भविष्य से जुड़ा है मामला- एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालय आदिवासी क्षेत्र के बच्चों के लिए एक महत्वपूर्ण शैक्षणिक परियोजना है, इसका उद्देश्य दूरदराज के विद्यार्थियों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर आवासीय सुविधाएं प्रदान करना है, लेकिन यदि इस परियोजना में निर्माण गुणवत्ता से लेकर पर्यावरण और श्रम नियमों तक की अनदेखी हो रही है, तो यह न केवल सरकारी धन की बर्बादी होगी बल्कि उन बच्चों के भविष्य पर भी असर पड़ सकता है जिनके लिए यह विद्यालय बनाया जा रहा है।
जांच की मांग- स्थानीय लोगों और सामाजिक संगठनों ने इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग की है, उनका कहना है कि यदि आरोप सही हैं तो दोषियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए और निर्माण कार्य की गुणवत्ता की भी स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए, अब देखना यह होगा कि प्रशासन और संबंधित विभाग इन आरोपों को किस तरह लेते हैं और क्या इस मामले में कोई जांच या कार्रवाई होती है या नहीं।
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