(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)। होली का मौसम है… रंग उड़ रहे हैं… और बैकुंठपुर में प्रशासनिक गुलाल कुछ ज़्यादा ही गाढ़ा पड़ गया है, खबर आई है कि बैकुंठपुर की तहसीलदार अब सिर्फ तहसीलदार नहीं रहीं—बल्कि “आजीवन तहसीलदार” घोषित कर दी गई हैं! कहते हैं राज्य सरकार ने यह ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए माना कि—“वर्तमान से उपयुक्त व्यक्ति भविष्य में मिलना असंभव है!”अब इसे कहते हैं असली स्थायी रंग।
ट्रांसफर पॉलिसी पर पड़ा पानी- जहाँ आम अफसर साल-दो साल में ट्रांसफर की पिचकारी से भीग जाते हैं,
वहीं बैकुंठपुर की तहसीलदार पर ऐसा रंग चढ़ा कि ट्रांसफर लिस्ट भी शर्मिंदा हो गई, सरकारी सूत्रों के अनुसार— “जब व्यवस्था जम गई हो, तो क्यों हिलाएं?” जनता कह रही है— “लगता है होली में इस बार ‘स्थायित्व गुलाल’ का स्पेशल पैक आया है।”
मितव्ययता का महान मॉडल- तहसीलदार महोदया की सबसे बड़ी उपलब्धि बताई जा रही है— वे अन्य जिले से खुद गाड़ी चलाकर रोज कोरिया पहुँचती हैं! वाह! सरकार खुश है— “देखिए, वाहन का खर्च अलग से नहीं लग रहा।” हाँ, तेल व्यवस्था से मिल जाए तो क्या दिक्कत है? मितव्ययता भी बनी रहे और पदस्थापना भी, जनता का सवाल— “लेट-लतीफी भी मितव्ययता का हिस्सा है क्या?”
कार्यालय संचालन: किसी तरह चलता रहे- कार्यालय भले “किसी तरह” चल रहा हो, लेकिन चल तो रहा है! सरकारी दृष्टिकोण साफ है—“जब गाड़ी खुद चल रही है, तो सिस्टम भी चल ही रहा होगा।” होली में जैसे रंग आधा लगे, आधा रह जाए, वैसे ही काम भी आधा पूरा, आधा अधूरा— पर घोषणा पूरी।
जनता की सूखी होली- जनता पूछ रही है— आजीवन पदस्थापना का नियम कब बना? क्या यह प्रयोगात्मक प्रशासन है? “या फिर यह होली का विशेष ऑफर है?” कुछ लोग कह रहे हैं—“यह ट्रांसफर सीजन का ‘नो-रिफंड पॉलिसी’ मॉडल है।”
अंतिम कटाक्ष- होली सिखाती है— रंग बदलते रहो, पर बैकुंठपुर की तहसील में लगता है, रंग स्थायी कर दिया गया है, अब देखना यह है आजीवन पदस्थापना का यह रंग अगली होली तक टिकेगा या फिर नई सूची आते ही धुल जाएगा, क्योंकि प्रशासन की होली में रंग से ज्यादा “रंग जमाना” मायने रखता है।
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