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टिकट की पिचकारी, कुर्सी का गुलाल और संतों का सियासी कमाल!

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(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)। होली आई और जिले की राजनीति में ऐसा रंग घुला कि अब पहचानना मुश्किल है— कौन विरोधी है, कौन सहयोगी और कौन “भविष्य का योगी”!
पूर्व विधायक की “रंग वापसी योजना”- बैकुंठपुर की पूर्व विधायक अंबिका सिंह देव ने इस बार होली खेलने से पहले ही रणनीति बना ली है, जिन्हें कभी पार्टी से निष्कासित कर किनारे लगाया गया था, आज वही “विजय के मुख्य रंग” बन गए हैं, राजनीति का नियम बड़ा सीधा है—“जब हार मिले, तो भूले हुए रंग भी याद आते हैं।” पिछली बार जिनकी अनदेखी भारी पड़ी, इस बार वही चुनावी थाली के सबसे जरूरी रंग हैं, अब पार्टी लाइन थोड़ी ढीली होगी, पर जीत की लाइन सीधी रहेगी!


देवेंद्र तिवारी – संगठन से सिंहासन तक- भाजपा जिलाध्यक्ष देवेंद्र तिवारी इन दिनों ऐसे सक्रिय हैं जैसे होली में डीजे का वॉल्यूम, उनका फॉर्मूला साफ—“पहले संगठन, फिर सत्ता; पहले झंडा, फिर डंडा।” युवाओं में पकड़, विधायक से नज़दीकी, राजधानी तक संदेश—“मैं तैयार हूँ!” जिले में चर्चा है— “तिवारी जी अब सिर्फ जिलाध्यक्ष नहीं, भविष्य की बड़ी पारी सोच रहे हैं।” होली का रंग जितना गाढ़ा, राजनीति की तैयारी उतनी पक्की।


अशोक जायसवाल – संत या सियासी संतुलन?- पूर्व नगर पालिका अध्यक्ष और कांग्रेस कोषाध्यक्ष अशोक जायसवाल अब गेरुए रंग की तरफ झुकते दिख रहे हैं, धार्मिक आयोजनों में बढ़ती सक्रियता, राजनीतिक दूरी की बातें— और दोनों दलों से समान भाव, लोग कह रहे हैं—“यह संन्यास है या सॉफ्ट एग्जिट?” राजनीति में जब रंग ज्यादा चढ़ जाए, तो कुछ लोग सच में धुल जाते हैं… और कुछ लोग नया रंग चुन लेते हैं।


वेदांती तिवारी – बैर छोड़ो, मंच जोड़ो- वेदांती तिवारी का बयान होली के अबीर जैसा मुलायम—“चुनाव क्षणिक है, जीवन लंबा है।” हार की टीस को मुस्कान में बदलना आसान नहीं, पर मंच पर साथ बैठना एक बड़ा संदेश है, यह राजनीति का नया ट्रेंड है— “आज विरोध, कल सहयोग।” होली सिखाती है—पुराने रंग धो डालो। राजनीति कहती है— पुराने विरोध भूल जाओ… समय आने पर याद भी कर लेना।


योगेश शुक्ला – टिकट दो, जीत लो!- कांग्रेस नेता योगेश शुक्ला ने साफ शब्दों में कह दिया— “पार्टी टिकट दे, जीतकर दिखाना मेरा काम!” नौकरी छोड़ी, सालों से सक्रिय, अब सीधे हाईकमान को पिचकारी मार दी, उनका संदेश—
“अब नहीं तो कब? मेरी भी बारी है!” जिले में चर्चा— “अगर टिकट नहीं मिला, तो रंग कहीं और भी जा सकता है।”


होली का असली सवाल- निष्कासित फिर से खास बन रहे हैं, संगठन वाले सत्ता की राह नाप रहे हैं, कोई संत बन रहा है, कोई बैर भूल रहा है, कोई टिकट मांग रहा है, पर जनता अब भी पूछ रही है—“हमारे लिए कौन सा रंग बचा है?” नेताओं की होली— रणनीति, समीकरण और कुर्सी की तैयारी, जनता की होली— महंगाई, बेरोजगारी और उम्मीद की सूखी पिचकारी।
अंतिम कटाक्ष- इस बार होली में रंग कम नहीं हैं— बस यह तय होना बाकी है कि अगली बार रंग जनता के हाथ में होगा
या फिर फिर से वही पुराने चेहरे नए रंग में नजर आएंगे।


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