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रंगों की राजनीति और सूखी नालियों का सच

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(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)
होली है… गुलाल उड़ रहा है… पर नगर पंचायत पटना में रंग से ज्यादा रंगदारी की चर्चा है, कहते हैं- यहाँ होली से ज्यादा गर्मी जिलाध्यक्ष बनाम विधायक की अदृश्य लड़ाई में है।
विकास की पिचकारी फंसी कहाँ?
नगर में लोग पूछ रहे हैं-विकास की फाइल कहाँ अटकी? कहने वाले कहते हैं- विधायक की तरफ से नगर विकास की रफ्तार धीमी है। दूसरी ओर जिलाध्यक्ष के प्रयास भी अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे। होली में जैसे पिचकारी का नोज़ल जाम हो जाए, वैसे ही यहाँ विकास की धार अटक गई है।
अध्यक्ष की स्थिति-कुर्सी है, पर कंट्रोल नहीं?
निर्वाचित अध्यक्ष गायत्री सिंह अब खुद चिंतन में बताई जा रही हैं, चुनाव में जीत भले आम समर्थकों के दम पर मिली हो, पर अब निर्णयों की कमान कहीं और दिखाई दे रही है, नगर में विधायक प्रतिनिधियों की सक्रियता इतनी अधिक बताई जा रही है कि लोग मज़ाक में कह रहे हैं-अध्यक्ष हैं…पर अध्यक्षीय अधिकार कहाँ हैं? होली में जैसे रंग सबके हाथ में हो, पर असली बाल्टी एक ही के पास।
सत्ता का संतुलन या असंतुलन?
राजनीति में अक्सर यह स्थिति बनती है-निर्वाचन एक तरफ, नियंत्रण दूसरी तरफ,नगर पंचायत पटना का हाल कुछ ऐसा ही बताया जा रहा है-कुर्सी एक के पास,रणनीति दूसरे के पास और जिम्मेदारी तीसरे के सिर जनता देख रही है और सोच रही है-हमने किसे चुना था और काम कौन कर रहा है?
होली का असली रंग
नेताओं की होली-रणनीति,समीकरण और शक्ति प्रदर्शन,नगर की होली- टूटी सड़कें,अटकी योजनाएँ और प्रतीक्षा,गुलाल भले उड़ रहा हो,पर नगर के नाले अब भी सूखे नहीं।


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