बड़े जिले का आकर्षण बड़ा जिला मतलब
बड़ा स्टाफ बड़ा बजट बड़ा मीडिया कवरेज
और बड़ी पहचान होली में जैसे बड़ी पिचकारी सबको आकर्षित करती है, वैसे ही बड़े जिले की कुर्सी भी…
जनता की सोच पर ये जनता सोच रही है…
जिला छोटा है तो क्या काम भी छोटा है?
बड़ा जिला ही सफलता का प्रमाण है?
या यह भी होली का एक रंग है जो कुछ दिनों में उतर जाएगा?
(घटती-घटना होली विशेष व्यंग्य)।
होली का मौसम है…रंग उड़ रहे हैं…और कोरिया की प्रशासनिक गलियों में एक नई चर्चा तैर रही है-अब कोरिया में मन नहीं लगता…बड़ा जिला चाहिए! कहा जा रहा है कि कलेक्टर साहिबा का दिल अब छोटे जिले की सीमाओं में नहीं समा रहा। मन बड़े नक्शे,बड़े बजट और बड़े बोर्ड की ओर उछल रहा है।
छोटा जिला,छोटा मन?
कोरिया जैसे जिले में काम करना आसान नहीं- सीमित संसाधन,सीमित बजट,और सीमित तालियाँ,होली में भी अगर रंग कम पड़ जाए, तो मन करता है बड़े शहर की रंगत में नहा लिया जाए,चर्चा यह भी है कि अब कोरिया नहीं, अगली होली बड़े जिले में खेलनी है।
ट्रांसफर लिस्ट की प्रतीक्षा
हर साल होली के बाद एक और रंग उड़ता है जो ट्रांसफर लिस्ट का रंग होता है, गलियारों में फुसफुसाहट है की नाम लगभग तय है…बस लिस्ट का इंतजार है,राजनीति और प्रशासन में सबसे गाढ़ा रंग वही होता है जो सूची में चढ़ जाए।
अवार्ड का सहारा?
चर्चाओं में यह भी कहा जा रहा है कि अच्छे काम का अवार्ड रास्ता आसान करता है। सच भी है प्रशासन में उपलब्धियाँ अक्सर अगली पोस्टिंग का टिकट बन जाती हैं, होली में जो सबसे ज्यादा रंगीन दिखे,उसी की फोटो अगले दिन अखबार में छपती है।
अंतिम कटाक्ष
होली सिखाती है,जहाँ हो,वहीं रंग भरो, प्रशासन सिखाता है जहाँ मौका मिले,वहाँ रंग बदलो, अब देखना यह है की कोरिया की यह होली आखिरी है या अगली सूची तक सिर्फ अफवाहों का गुलाल उड़ता रहेगा,क्योंकि ट्रांसफर की राजनीति में सबसे तेज रंग वही है, जो चुपचाप फाइल में चढ़ जाता है।
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