

- पार्किंग में बाजार,नियम फाइल में लाचार,व्यापारी लाइन में, सिस्टम ऑनलाइन…
- किराया पूरा,सुविधा अधूरी—वाह नगर पालिका सूरजपुर!
- वाह रे सूरजपुर! दुकान खोलो तो अपराध,बंद करो तो विकास-शॉपिंग कॉम्प्लेक्स बना ‘संघर्ष कॉम्प्लेक्स’
- सूरजपुर नगर पालिका शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में ‘त्योहारी टकराव’
- नीलामीधारी दुकानदार बनाम अस्थायी बाजार,पार्किंग पर कब्जा और प्रशासन की चुप्पी…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,03 मार्च 2026 (घटती-घटना)। कहते हैं शहर विकास की राह पर है,सड़कें चमक रही हैं,दावे दमक रहे हैं और भाषणों में ‘समृद्ध सूरजपुर’ की गूंज है,लेकिन पुराने बस स्टैंड स्थित अग्रसेन चौक के नगर पालिका शॉपिंग कॉम्प्लेक्स में हालात कुछ और ही कहानी कह रहे हैं,यहां दुकानदारों का कसूर सिर्फ इतना है कि उन्होंने नगर पालिका से बाकायदा बोली लगाकर दुकान ली…और अब शांति से व्यापार करना चाहते हैं! सूरजपुर नगर पालिका परिसर के सामने स्थित शॉपिंग कॉम्प्लेक्स इन दिनों एक बार फिर विवादों के केंद्र में है,हर त्यौहार के साथ यहां एक‘स्थायी समस्या’अस्थायी दुकानों के रूप में खड़ी हो जाती है,नीलामी के माध्यम से दुकान लेने वाले स्थायी व्यापारी आरोप लगा रहे हैं कि उनके ठीक सामने टेंट-तंबू लगाकर अस्थायी दुकानें सजा दी जाती हैं, जिससे उनका व्यवसाय प्रभावित होता है और दुकानें लगभग एक सप्ताह तक अवरुद्ध हो जाती हैं,मामला केवल अतिक्रमण का नहीं,बल्कि आजीविका, व्यवस्था और प्रशासनिक जिम्मेदारी का बन गया है।
हर त्यौहार पर वही दृश्य
स्थानीय व्यापारियों के अनुसार रक्षाबंधन में राखी की दुकानें, 15 अगस्त और 26 जनवरी पर झंडा और सजावटी सामग्री,दिवाली-दशहरा में पटाखे और पूजन सामग्री,और फिलहाल होली पर रंग-गुलाल की दुकानें हर अवसर पर अस्थायी टेंट दुकानें ठीक स्थायी दुकानों के सामने सजा दी जाती हैं। ये दुकानें लगभग एक सप्ताह तक रहती हैं, इस दौरान पीछे की स्थायी दुकानें ग्राहकों की नजर से ओझल हो जाती हैं।
पार्किंग से ‘मिनी बाजार’ तक
कॉम्प्लेक्स के सामने जो स्थान पार्किंग के लिए निर्धारित है,वहीं अस्थायी बाजार सजा दिया जाता है,परिणामस्वरूप ग्राहकों के लिए वाहन खड़ा करना मुश्किल, मुख्य प्रवेश अवरुद्ध, पीछे की दुकानों तक पहुंच बाधित,स्थायी दुकानदारों का कहना है कि ‘पार्किंग अब पार्किंग नहीं रही, मिनी बाजार बन चुकी है।
आरोप : पैसे लेकर दुकान लगवाने की चर्चा
व्यापारियों के बीच यह भी चर्चा है कि कुछ लोग अपनी दुकान के सामने अस्थायी दुकान लगवाने के लिए कथित रूप से पैसे लेते हैं,कुछ दुकानों के सामने बिना सहमति के जबरन दुकानें लगा दी जाती हैं, अस्थायी दुकानदार कुछ दिनों के लिए आते हैं,कमाई करते हैं और चले जाते हैं,हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है,लेकिन इससे असंतोष का माहौल जरूर बना है।
विकास का मॉडलः सामने पार्किंग,ऊपर टेंट,बीच में तनाव
कॉम्प्लेक्स के सामने जो जगह ग्राहकों की गाडि़यों के लिए तय थी,वहां इन दिनों टेंट-तंबू सजाकर अस्थायी दुकानें सजी हैं, परिणाम ये है की ग्राहक पहले टेंट की भूलभुलैया पार करें,फिर रास्ता खोजें और अगर पार्किंग मिल जाए तो खुद को भाग्यशाली समझें स्थायी दुकानदारों का कहना है कि पार्किंग की जगह ‘मिनी बाजार’ बन चुकी है,अस्थायी दुकानदारों का कहना है कि त्योहार है,रोजी-रोटी है, नगर पालिका का कहना क्या है? यह फिलहाल फाइलों के पन्नों में विश्राम कर रहा है।
आवेदन पर आवेदन,मुहर पर मुहर
दुकानदारों ने मुख्य नगर पालिका अधिकारी को बाकायदा आवेदन देकर कहा…‘साहब! दुकान हमने नियम से ली है,किराया दे रहे हैं,टैक्स दे रहे हैं। बस सामने की पार्किंग बचा लीजिए।’प्रतिलिपि कलेक्टर साहब से लेकर तहसीलदार और अध्यक्ष महोदय तक भेजी गई,मुहरें भी लग गईं, तारीख भी पड़ गई,अब कार्रवाई का इंतजार है… जो शायद अगली होली तक रंग लाए।
त्योहार सीजन में ‘शांतिपूर्ण’ व्यापार बंद
मामला यहीं खत्म नहीं हुआ,सोशल मीडिया पर एक भावुक पोस्ट वायरल हुई ‘अब तो नहीं होगा किसी त्योहारी सीजन गरीब व्यापारी का नुकसान।’ यानि त्योहार के समय दुकानें खुली रहें तो नुकसान,बंद हों तो विकास! कुछ व्यापारियों का आरोप है कि दबाव में उन्हें दुकानें बंद करनी पड़ीं,प्रश्न उठता है क्या अपने ही प्रतिष्ठान में व्यापार करना अब‘अनुमति आधारित स्वतंत्रता’ हो गया है?
नगर पालिका : किराया वसूलो, जिम्मेदारी टालो?
व्यंग्यकार पूछ रहे हैं क्या नगर पालिका की भूमिका सिर्फ किराया लेने तक सीमित है? या फिर सुविधा-असुविधा देखना भी कभी-कभार एजेंडे में आता है?‘सुसज्जित-संपन्न सूरजपुर’ के दावे हवा में हैं,और जमीनी हकीकत यह कि दुकानदार पार्किंग ढूंढते-ढूंढते विकास खोज रहे हैं।
आजीविका बनाम अतिक्रमणः संतुलन या संघर्ष?
यह मामला सिर्फ अतिक्रमण का नहीं है,यह है स्थायी बनाम अस्थायी, किरायेदार बनाम टेंटधारी,नियम बनाम राजनीति,हर पक्ष अपनी जगह सही है,लेकिन समाधान? वह शायद अगली बैठक की कार्यवाही में लिखा जाएगा।
‘कॉम्प्लेक्स’ का असली अर्थ समझ आया
नगर पालिका शॉपिंग कॉम्प्लेक्स अब सचमुच‘कॉम्प्लेक्स’ हो चुका है, जहां व्यापार से ज्यादा उलझनें बिक रही हैं, दुकानदार पूछ रहे हैं की हम दुकान खोलें तो समस्या, बंद करें तो समाधान…आखिर शहर चलेगा कैसे? अब देखना है कि प्रशासन इस ‘विकास लीला’ का अंत कैसे करता है की पार्किंग खाली होगी या बयानबाज़ी? तब तक,सूरजपुर के व्यापारी विकास के रंग में भीगते रहेंगे…बस फर्क इतना है कि यह रंग थोड़ा व्यंग्यात्मक है।
आजीविका बनाम अस्थायी बाजार,यह मुद्दा केवल अतिक्रमण तक सीमित नहीं है। यह दो आजीविकाओं के टकराव का मामला है…
स्थायी दुकानदार
नीलामी में मोटी रकम देकर दुकान ली…
नियमित किराया और टैक्स अदा करते हैं…
वर्षभर व्यवसाय चलाते हैं
अस्थायी दुकानदार
सीमित समय के लिए आते हैं…
त्योहारी सीजन में कमाई का अवसर…
छोटे व्यापारियों के लिए आय का साधन…
दोनों ही पक्ष अपनी-अपनी जगह जायज दलील रखते हैं। लेकिन सवाल संतुलन का है…
नगर पालिका की भूमिका पर सवाल,स्थायी दुकानदार पूछ रहे हैं…
क्या नगर पालिका की जिम्मेदारी केवल नीलामी और किराया वसूली तक सीमित है?
क्या सार्वजनिक स्थल और पार्किंग की व्यवस्था सुनिश्चित करना प्रशासन की प्राथमिकता में नहीं है?
या हर त्यौहार पर यही स्थिति दोहराई जाती रहेगी? ‘सुसज्जित और समृद्ध सूरजपुर’ के दावों के बीच यह विवाद प्रशासनिक नीति और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा रहा है।
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