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कोरिया@प्रभार का प्रहार: तीन जिलों की कमान एक हाथ में,विकास हुआ बेदम

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  • एक अफसर, तीन जिले और ठप योजनाएं—क्या यही है प्रशासनिक मॉडल?
  • कागज़ों में दौड़ता विकास, जमीन पर सन्नाटा, प्रभार संस्कृति की पोल खुली
  • तीन जिलों का बोझ, जवाबदेही शून्य—प्रशासनिक व्यवस्था सवालों के घेरे में
  • कोरिया संभाग में ‘प्रभारी संस्कृति’, क्या अतिरिक्त प्रभार से थम रही विकास की रफ्तार?
  • मत्स्य, रेशम और क्रेडा में एक अधिकारी, तीन जिले—प्रभावशीलता पर उठते सवाल
  • रिक्त पद और अतिरिक्त प्रभार: क्या योजनाओं की गुणवत्ता हो रही प्रभावित?
  • प्रशासनिक ढांचे की चुनौती: स्टाफ की कमी या नीति की खामी?
  • प्रभार के पाश में विकास: संभाग में ‘एक अधिकारी-तीन जिले’ मॉडल पर सवाल

-रवि सिंह-
कोरिया,01 मार्च 2026(घटती-घटना)।
प्रशासनिक ढांचे में अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था अस्थायी समाधान के रूप में बनाई जाती है,लेकिन जब यही व्यवस्था स्थायी रूप लेने लगे तो विकास की रफ्तार प्रभावित होना तय है,सरगुजा संभाग के कोरिया, सूरजपुर,मनेन्द्रगढ़,अंबिकापुर और बलरामपुर जिलों में इन दिनों कई महत्व पूर्ण विभाग एक-एक अधिकारी के भरोसे तीन-तीन जिलों का भार उठाए हुए हैं,कागजों में योजनाएं स्वीकृत हो रही हैं,बैठकें हो रही हैं,प्रेजेंटेशन बन रहे हैं,लेकिन फील्ड में मॉनिटरिंग की कमी और प्रशासनिक सुस्ती के आरोप बढ़ते जा रहे हैं। ‘प्रभारी संस्कृति’ अब सवालों के घेरे में है,
कोरिया और आसपास के जिलों में‘प्रभारी संस्कृति’अब बहस का विषय बन चुकी है, योजनाएं कागजों पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ रही हैं,लेकिन जमीनी सच्चाई मिश्रित संकेत दे रही है, यदि सरकार वास्तव में विकास की गति को बनाए रखना चाहती है, तो अतिरिक्त प्रभार के इस मॉडल की समीक्षा आवश्यक है,अन्यथा,एक अधिकारी—तीन जिले की यह व्यवस्था विकास की राह में सबसे बड़ी बाधा बन सकती है।
मत्स्य विभाग: तीन जिलों की ‘नीली क्रांति’ एक ही अधिकारी के भरोसे- मत्स्य विभाग में उप संचालक के पास कोरिया के साथ अंबिकापुर और बलरामपुर का भी प्रभार है, मत्स्य पालन ऐसा विभाग है जो पूरी तरह फील्ड आधारित है, तालाबों का निरीक्षण, मछली बीज वितरण, हितग्राहियों को प्रशिक्षण, अनुदान योजनाओं की निगरानी और गुणवत्ता परीक्षण—इन सबके लिए नियमित उपस्थिति आवश्यक है, लेकिन जब एक अधिकारी को तीन जिलों के बीच लगातार सफर करना पड़े, तो वास्तविक निगरानी प्रभावित होती है, ब्लॉक स्तर के कर्मचारियों पर निर्भरता बढ़ जाती है, जिससे पारदर्शिता और गुणवत्ता दोनों पर असर पड़ सकता है, स्थानीय हितग्राहियों का कहना है कि निरीक्षण की आवृत्ति कम हो गई है, शिकायतों के समाधान में देरी हो रही है, योजनाओं का मूल्यांकन औपचारिकता बनकर रह गया है, सरकार मत्स्य उत्पादन बढ़ाने और किसानों की आय दोगुनी करने की बात करती है, लेकिन तीन जिलों का प्रभार एक अधिकारी को सौंपना इस लक्ष्य के विपरीत माना जा रहा है।
रेशम विभाग: आजीविका की उम्मीदें ‘अतिरिक्त प्रभार’ में उलझीं- रेशम उद्योग विशेष रूप से आदिवासी और ग्रामीण परिवारों की आय का महत्वपूर्ण स्रोत है, कोरिया, सूरजपुर और मनेन्द्रगढ़ में रेशम उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएं संचालित हैं, लेकिन विभाग के उप संचालक को तीनों जिलों का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया है, परिणामस्वरूप प्रशिक्षण कार्यक्रम नियमित नहीं हो पा रहे, तकनीकी मार्गदर्शन सीमित हो गया है, फील्ड विजिट कम हो गई है, रेशम उत्पादन एक तकनीकी प्रक्रिया है जिसमें समय पर सलाह और रोग नियंत्रण आवश्यक होता है, अधिकारी की सीमित उपलब्धता से किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है, विशेषज्ञों का मानना है कि यदि रेशम विभाग को मजबूत बनाना है, तो पूर्णकालिक अधिकारी की नियुक्ति आवश्यक है, अन्यथा योजनाएं केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएंगी।
क्रेडा विभाग: सौर ऊर्जा योजनाएं निगरानी के अभाव में सुस्त- क्रेडा (छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास अभिकरण) की योजनाएं ग्रामीण क्षेत्रों में सौर पंप, सोलर स्ट्रीट लाइट और अन्य ऊर्जा परियोजनाओं के माध्यम से लागू की जा रही हैं, यहां कार्यपालन अभियंता के पास सूरजपुर, कोरिया और मनेन्द्रगढ़—तीनों जिलों का प्रभार है। फील्ड से मिली जानकारी के अनुसार कई स्थानों पर सोलर पंप खराब पड़े हैं, सोलर लाइटें महीनों से बंद हैं, रखरखाव और मरम्मत में देरी हो रही है जब शीर्ष अधिकारी तीन जिलों में विभाजित हों, तो अधीनस्थ कर्मचारियों की जवाबदेही भी कमजोर पड़ जाती है, निरीक्षण कम होते हैं और शिकायतों का समाधान लंबित रहता है।
प्रशासनिक मॉडल पर उठते सवाल-

  1. क्या यह केवल अस्थायी व्यवस्था है या दीर्घकालिक नीति?
  2. क्या पदों को भरने में अनावश्यक देरी की जा रही है?
  3. क्या “स्टाफ की कमी” का तर्क विकास की सुस्ती को ढकने का माध्यम बन रहा है? प्रभार व्यवस्था अल्पकालिक समाधान हो सकती है, लेकिन लगातार तीन-तीन जिलों का भार एक अधिकारी को सौंपना प्रशासनिक दक्षता पर प्रश्नचिह्न लगाता है।
    असर सिर्फ विभाग पर नहीं, जनता पर भी- इन विभागों की योजनाएं सीधे किसानों, आदिवासियों और ग्रामीण हितग्राहियों से जुड़ी हैं। जब मॉनिटरिंग कमजोर होती है, तो योजनाओं की गुणवत्ता प्रभावित होती है, भ्रष्टाचार और लापरवाही की संभावना बढ़ती है, हितग्राहियों का विश्वास कम होता है, विकास का वास्तविक आकलन फाइलों से नहीं, बल्कि जमीन पर दिखाई देने वाले परिणामों से होता है।
    समाधान क्या?
    रिक्त पदों पर शीघ्र नियमित नियुक्ति
    प्रत्येक जिले के लिए अलग पूर्णकालिक अधिकारी
    फील्ड मॉनिटरिंग की अनिवार्य समयबद्ध व्यवस्था
    डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शिता बढ़ाने की पहल

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