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सूरजपुर@ 2.25 करोड़ का पशुपालन ऋण…93 लाख का धान प्रकरण और एक नाम बार-बार—क्या सहकारी बैंक में जवाबदेही से ऊपर ‘संरक्षण’ है?

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  • निलंबन,एफआईआर और फिर बहाली-सहकारी बैंक में किसका संरक्षण?
  • भैयाथान शाखा में करोड़ों का खेलः अजीत सिंह के कार्यकाल की परतें खोलती फाइलें
  • एफआईआर के बाद भी कुर्सी बरकरार? सहकारी बैंक की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल
  • 93 लाख धान प्रकरण,2.25 करोड़ पशुपालन ऋण तक—क्या संरक्षण तंत्र के सहारे बचता रहा सिस्टम?
  • आधा पैसा बकाया,63 लाख त्वरित जमा— क्या जमानत की रणनीति थी यह वापसी?
  • सहकारी बैंक में जवाबदेही या राजनीतिक पहुंच? भैयाथान शाखा विवादों के घेरे में
  • करोड़ों की अनियमितता, स्थानांतरणों का सिलसिला और फिर बहाली—कौन बचा रहा है किसे?
  • किसानों के भरोसे पर चोटः पशुपालन ऋण घोटाले में बैंक प्रबंधन कठघरे में


ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,18 फरवरी 2026 (घटती-घटना)।
भैयाथान-लटोरी शाखा के दस्तावेजों से उठते सवाल,बैंकिंग सिस्टम की साख दांव पर, जिला सहकारी केंद्रीय बैंक, अंबिकापुर की भैयाथान-लटोरी शाखा पिछले कई वर्षों से विवादों में रही है, 2019 के धान खरीदी प्रकरण (करीब 93.41 लाख) से लेकर 2.25 करोड़ रुपये के पशुपालन ऋण मामले तक—हर बड़े विवाद में एक नाम बार-बार सामने आता है। तत्कालीन शाखा प्रबंधक अजीत सिंह,दस्तावेजों में एफआईआर,निलंबन और आंशिक रिकवरी दर्ज है; लेकिन पुनः बहाली और करोड़ों की लंबित वसूली बैंकिंग कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है।
2019ः धान खरीदी में 93 लाख की अनियमितता
कलेक्टर कार्यालय,सरगुजा-अंबिकापुर के पत्राचार में धान खरीदी प्रकरण में लगभग 93.41 लाख की गड़बड़ी का उल्लेख हुआ और आवश्यक पुलिस कार्रवाई के निर्देश दिए गए, सवाल तब भी उठा था—क्या दोषियों पर अभियोजन चला? क्या रिकवरी पूरी हुई? यदि 2019 में कठोर और समयबद्ध कार्रवाई होती, तो क्या आगे के विवाद टल सकते थे?
2022-23ः 2.25 करोड़ का पशुपालन ऋण प्रकरण
भैयाथान-लटोरी शाखा में पशुपालन ऋण वितरण को लेकर गंभीर शिकायतें आईं,जांच में प्रथम दृष्टया अनियमितताएँ पाई गईं, 04 जनवरी 2023 को थाना झिलमिली में आईपीसी की धाराओं 409 (आपराधिक विश्वासघात), 420 (धोखाधड़ी) और 34 (सामूहिक मंशा) के तहत एफआईआर दर्ज हुई,27 जनवरी 2023 को निलंबन आदेश जारी हुआ,आरोपों के केंद्र में तत्कालीन शाखा प्रबंधक अजीत सिंह का नाम रहा—जिनके कार्यकाल में कथित तौर पर ऋण स्वीकृति, पात्रता सत्यापन और जमानत/मार्जिन जांच में गंभीर विसंगतियाँ सामने आईं।
स्थानांतरणों का सिलसिलाः कार्रवाई या बचाव?-प्रकरण के दौरान और बाद में संबंधित अधिकारी के कई स्थानांतरण हुए, क्या यह प्रशासनिक प्रक्रिया थी या मामला ठंडा करने की रणनीति? सख्त विभागीय कार्रवाई में देरी ने क्या जांच की धार कम की? सहकारी संस्थाओं में स्थानीय-राजनीतिक दबाव की चर्चा नई नहीं है—क्या यहाँ भी वही पैटर्न दिखा?
कानूनी परिप्रेक्ष्य
धारा 409 और 420 गंभीर अपराध हैं। जनता को यह जानने का अधिकार है—चार्जशीट की स्थिति क्या है? ट्रायल कहाँ तक पहुँचा? पूर्ण रिकवरी का रोडमैप और समयसीमा क्या है?
यदि ऋण ‘सही’ था तो 50′ रिकवरी लंबित क्यों?
सबसे बड़ा सवालः करीब आधी राशि आज भी बकाया क्यों है? दो वर्ष बाद भी करोड़ों की रिकवरी लंबित बताई जाती है,क्या लाभार्थियों की पात्रता और जमानत की जांच पुख्ता थी? क्या ऋण वास्तविक पशुपालकों तक पहुँचा या कागजों पर ही रहा? क्या आंतरिक ऑडिट ने जोखिम संकेतों को समय पर पकड़ा? बैंकिंग का सिद्धांत साफ है—वैध और सक्षम उधारकर्ताओं से किस्तें नियमित आती हैं, लंबित वसूली यह संकेत देती है कि या तो वितरण प्रक्रिया में गंभीर कमी थी, या रिकवरी तंत्र ढीला रहा।
15 दिनों में 63 लाख जमाः जमानत की रणनीति?
सूत्रों के अनुसार,एफआईआर और गिरफ्तारी की आशंका के बाद सिर्फ 15 दिनों में लगभग 63 लाख जमा हुए,यह त्वरित जमा कई सवाल खड़े करती हैः क्या यह जमानत/कानूनी राहत पाने की कोशिश थी? यदि इतनी राशि तुरंत जमा हो सकती है, तो शेष करोड़ों की वसूली क्यों अटकी है? क्या यह आंशिक स्वीकारोक्ति का संकेत था? यदि ऋण पूर्णतः वैध था, तो इतनी बड़ी रकम की अचानक वापसी का औचित्य क्या था?
निलंबन के बाद पुनः बहालीः किस आधार पर?
एफआईआर और लंबित रिकवरी के बावजूद अजीत सिंह की पुनः बहाली ने बैंक की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया,क्या आंतरिक जांच में उन्हें दोषमुक्त पाया गया? क्या अदालत से स्पष्ट राहत मिली? क्या बोर्ड ने बहाली से पहले रिकवरी और ट्रायल की स्थिति की समीक्षा की? बिना स्पष्ट सार्वजनिक स्पष्टीकरण के बहाली का संदेश यही जाता है कि या तो आरोप कमजोर थे—या प्रभाव/संरक्षण ने नियमों पर बढ़त बना ली।
संस्थागत जवाबदेहीः केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं
दो अलग-अलग प्रकरण (2019 और 2022-23), एफआईआर, निलंबन, आंशिक जमा और फिर वापसी—यह पैटर्न केवल व्यक्तिगत चूक नहीं, आंतरिक नियंत्रण और बोर्ड-स्तरीय जवाबदेही का प्रश्न है,क्या जोखिम प्रबंधन ढांचा पर्याप्त था? क्या ऋण स्वीकृति में तृतीय-पक्ष सत्यापन हुआ? क्या सामाजिक ऑडिट/लाभार्थी सत्यापन किया गया? सहकारी बैंक किसानों की जीवनरेखा हैं। यदि पात्रता जांच,जमानत मूल्यांकन और रिकवरी तंत्र कमजोर हों,तो नुकसान सीधे किसानों और बैंक की साख को होता है।
अब क्या होना चाहिए?
समयबद्ध रिकवरी डैशबोर्ड-सार्वजनिक प्रगति रिपोर्ट।
फॉरेंसिक ऑडिट-ऋण स्वीकृति से वसूली तक स्वतंत्र जांच।
बहाली के आधार सार्वजनिक— बोर्ड कार्यवाही का सार।
लाभार्थी सत्यापन/सामाजिक ऑडिट-जमीन-स्तर की पुष्टि।
जवाबदेही तय-यदि प्रणालीगत चूक है तो संबंधित अधिकारियों पर भी कार्रवाई।

भरोसे की परीक्षा
यह केवल 2.25 करोड़ या 93 लाख का हिसाब नहीं यह सहकारी बैंकिंग की साख का सवाल है। यदि आरोपों के केंद्र में रहे तत्कालीन शाखा प्रबंधक अजीत सिंह के कार्यकाल में ये प्रकरण हुए और फिर भी करोड़ों की वसूली लंबित है, तो बैंक प्रबंधन को स्पष्ट,दस्तावेज-आधारित जवाब देना होगा, क्योंकि अंततः यह किसानों का पैसा है और भरोसे पर खड़ी व्यवस्था में पारदर्शिता से बड़ा कोई संरक्षण नहीं होता।


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