- इक्का-दुक्का वीडियो से पीठ थपथपाने की कोशिश,मगर धरातल पर तस्वीर बिल्कुल उलट …
- खरीदी सीमा 2000 से घटाकर 700 क्विंटल, सरकारी फैसले ने अव्यवस्था को न्योता दिया …
- किसान बोला मोबाइल घिस गया टोकन के इंतजार में, फिर भी हाथ खाली …
- समिति के तौल यंत्रों में छेड़छाड़? हर किसान के बोरे में समान कमी से बड़ा खेल उजागर …
- आधिकारिक कटौती तय फिर आधा किलो धान क्यों? नियमों को ताक पर रखकर चल रही है उगाही
- अध्यक्ष-प्रबंधक-कर्मचारी का त्रिकोणीय गठजोड़…पूरी प्रक्रिया पर हावी ‘वसूली तंत्र’…
- सरकारी चमक-दमक वाले वीडियो बनाम किसान की जमीनी हकीकत…कौन सच बोले?
- किसानों में डर …सीमित खरीदी ऐसे ही रही …तो शायद हम धान बेच ही न पाएं …
-राजन पाण्डेय-
कोरिया,12 दिसंबर 2025 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में धान खरीदी को लेकर सरकार और प्रशासन लगातार यह दावा कर रहे हैं कि प्रदेश में खरीदी प्रक्रिया निर्विघ्न,सुचारु और किसानों के हितों के अनुरूप चल रही है,दावा है हर किसान संतुष्ट है,हर बोरी धान की खरीदी सहज है,इन दावों के समर्थन में जनसंपर्क विभाग और जिला प्रशासन रोज़ किसी न किसी इक्का-दुक्का किसान का वीडियो जारी कर यह संदेश देने में जुटा है कि सब कुछ सामान्य है,लेकिन सोशल मीडिया पर चल रही सैकड़ों समस्याग्रस्त वीडियो और किसानों की पीड़ा बयान करता मेहनतकश चेहरा बताता है सच्चाई बिल्कुल कुछ और है।
धान खरीदी प्रारंभ होने के लगभग एक माह हो चुके हैं। खरीदी पूर्व किसानों के सुविधा के लिए राज्य सरकार और जिला प्रशासन द्वारा अनेक दावे किए गए थे। इन दावों के समर्थन में राज्य सरकार, जिला प्रशासन के साथ-साथ जनसंपर्क विभाग की टीम के द्वारा समाचार-पत्र, पोस्ट,विज्ञापन और सोशल मीडिया के उपयोग की सहायता से कुछ एक स्थान के इक्का दुक्का वीडियो और खबर डालकर जनता के बीच यह संदेश देने की कोशिश की जा रही है,कि वर्तमान में इस सरकार में किसानों को किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं है। और किसान सुगमता पूर्वक, निर्बाध रूप से अपनी उपार्जित फसल समितियों में विक्रय कर रहे हैं,ऑनलाइन टोकन की व्यवस्था हो या 24 घंटे के भीतर भुगतान की बात,सरकार के दावे भले ही कुछ भी हों, परंतु हकीकत एन उलट है,अधिकांश किसान ऑनलाइन टोकन व्यवस्था ऐप से बुरी तरह परेशान हैं। उनका कहना है कि एक तो यह ऐप चलता नहीं और गलती से खुल जाए तब तक खरीदी की सीमा पूर्ण हो चुकी होती है। किसान कैसे दिनों से केवल टोकन कटने के लिए कतार में हैं, और इंतजार कर रहे हैं। ऑनलाइन टोकन के अतिरिक्त समितियों में धान विक्रय के लिए टोकन काटने की व्यवस्था दी गई है, परंतु अधिकांश किसानों का आरोप है कि समिति सदस्य,कर्मचारी टोकन काटने की एवज में किसानों से अवैध वसूली करने में लिप्त हैं। जिनमें कई समितियों के वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हैं।
प्रति दिवस सीमित खरीदी किसानों की समस्या का बड़ा कारण
किसानों से उपार्जित फसल का एक-एक दाना समर्थन मूल्य में खरीदने का दावा करने वाली वर्तमान में भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने इस बार प्रतिदिन समितियों में धान खरीदने की सीमा को सीमित एवं प्रतिबंधित कर दिया है। जहां पहले के वर्षों में समितियों में प्रति दिवस लगभग 2000 मि्ंटल की खरीदी होती थी,वहीं इस वर्ष समितियों में केवल लगभग साढे 700 मि्ंटल प्रति दिवस की खरीदी निर्धारित की गई है। जिसके लिए टोकन कटना भी एक-एक दिन के हिसाब से तय किया गया है, और यही कारण है कि प्रदेश के अधिकांश किसान इस व्यवस्था के कारण भारी संकट और समस्या में हैं, क्योंकि सीमित खरीदी होने की वजह से ऑनलाइन ऑफलाइन दोनों माध्यमों से टोकन कट नहीं रहे। और किसान कभी मोबाइल, कभी चॉइस सेंटर, तो कभी समितियों के चक्कर काटते हुए आमतौर पर देखे जा रहे हैं। दूसरी सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि यदि खरीदी की सीमा को समय रहते नहीं बढ़ाया गया तो किसानों के मन में इस बात का भी भय व्याप्त है की वह अपना धान बेच भी पाएंगे या नहीं। और किसानों की इन्हीं मजबूरी का लाभ समितियों में पदस्थ कर्मचारी और अध्यक्ष उठा रहे हैं, और टोकन काटने के एवज में अवैध वसूली की बात सामने आ रही है।
सीमित खरीदी ने बिगाड़ा पूरा सिस्टम
इस बार सरकार ने समितियों में प्रतिदिन खरीदी की सीमा को अचानक घटाकर लगभग 2000 मि्ंटल से सीधे 700-750 मि्ंटल कर दिया, यही निर्णय धान खरीदी की पूरी प्रक्रिया की जड़ में बैठा सबसे बड़ा संकट है, सीमित खरीदी ? सीमित टोकन, सीमित टोकन? लंबी कतारें किसानों की बेचैनी और इसी अव्यवस्था का लाभ उठाते कुछ कर्मचारी और समिति पदाधिकारी कर रहे हैं अवैध वसूली किसानों का कहना है कि हम धान बेचेंगे भी या नहीं, यह भी अब किस्मत पर निर्भर हो गया है।
ऑनलाइन टोकनःऐप कम,यातना अधिक…
सरकार का दावा ऑनलाइन टोकन से किसानों को बड़ी सुविधा, किसानों का अनुभव ऐप चलना ही नहीं चाहता,और यदि गलती से खुल जाए तो खरीदी की सीमा कब की पूरी हो चुकी होती है,दूसरी तरफ ऑफलाइन टोकन की व्यवस्था भी भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुकी है, किसानों के अनुसार टोकन काटने के नाम पर खुलेआम वसूली, पैसा दो, तभी बारी बने, कई वीडियो इसकी पुष्टि सोशल मीडिया में वायरल हैं।
तौल में आधा किलो अतिरिक्त धान की जबरन वसूली
शासन के नियम के अनुसार, 40.700 किलो (ध्यान देंः 700 ग्राम बारदाने का वजन) प्रति बोरी निर्धारित है, परंतु समितियों में किसानों को 41.200 किलो तक धान तौलने को मजबूर किया जा रहा है, समिति कर्मचारियों का तर्क धान सूखती में कटौती हो जाएगी लेकिन विभागीय अधिकारियों के अनुसार कटौती की सीमा पहले से तय रहती है, यानि स्पष्ट रूप से अवैध धान वसूली।
क्या तौल कांटे ‘माइनस’ में सेट हैं?
किसानों का गंभीर आरोप वे घर से जो तौलाई कर धान ला रहे हैं, समिति के तौल कांटे में उसका वजन निश्चित मात्रा में कम मिल रहा है, अलग-अलग किसानों में वजन का अंतर बिल्कुल समान, अलग-अलग तौल यंत्रों में भी अंतर और शिकायतों की संख्या सैकड़ों में यह संकेत है कि तौल मशीनों में छेड़छाड़ कर अवैध उगाही की जा रही है, यह सिर्फ तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि भारी वित्तीय अनियमितता का संकेत है।
अध्यक्ष और समिति सदस्यः जिनसे उम्मीद,वे ही निकले बेवफ़ा
किसानों के प्रतिनिधि के रूप में बैठे मनोनीत समिति अध्यक्ष,जो किसानों की आवाज़ उठाने की जिम्मेदारी रखते हैं, इस बार किसानों के साथ नहीं समिति कर्मचारियों के साथ खड़े दिख रहे हैं, सूत्रों के अनुसार कई अध्यक्ष पहले ही समिति प्रबंधकों से अपना हिस्सा सेट कर चुके हैं इसकी भरपाई किसानों से करवाने के लिए तौल,टोकन और खरीदी प्रक्रिया में दबाव,किसानों की शिकायत को दबाने के प्रयास,यह स्थिति बताती है कि समिति,प्रबंधन और अध्यक्ष—एक त्रिकोणीय गठजोड़ बनाकर किसानों को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहे हैं।
प्रशासन को चाहिए जांच न कि दावा…
यदि धान खरीदी व्यवस्था इतनी ही पारदर्शी होती, तो- किसानों की इतनी बड़ी संख्या शिकायत क्यों कर रही?, सोशल मीडिया समस्याओं से अटा पड़ा क्यों है? तौल मशीनों में समान अंतर क्यों पाया जा रहा? टोकन के लिए अवैध वसूली क्यों हो रही है? प्रशासन को चाहिए कि तौल यंत्रों का पुनः परीक्षण करवाए, टोकन व्यवस्था की जांच करे, सीमित खरीदी के निर्णय पर पुनर्विचार करे,और सबसे महत्वपूर्ण समितियों में जारी अवैध वसूली के खिलाफ कार्रवाई करे,सरकार चाहे जितने विज्ञापन चलाए, जितने वीडियो जारी करे, लेकिन किसानों की असल पीड़ा को कभी दबाया नहीं जा सकता,खेत में खड़े किसान की सच्चाई, जनसंपर्क विभाग के कैमरे की मुस्कान से कहीं बड़ी होती है, छत्तीसगढ़ का किसान आज भी कह रहा है हम परेशान हैं,हमें मत छिपाओ,हमें सुनो।
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