
जिला प्रशासन की नीति पर फिर सवाल,क्या खनिज शाखा में सेटिंग कल्चर अमर है? या जिला खनिज शाखा में अटूट कब्जा

- प्रमोशन मिला,पोस्टिंग नहीं बदली…क्या किसी अदृश्य
- शक्ति का संरक्षण? या प्रमोशन मिला,व्यवस्था नहीं बदली…
- खनिज शाखा में वर्षों से जमे कर्मचारी को फिर से ‘यथावत’आदेश, अधिकारियों की चुप्पी क्यों?
- पहले उठा था सवाल एक ही कुर्सी पर वर्षों से जमे अमर लिपिक…
- एक्सक्लूसिव 7 जिला खनिज न्यास का अमर लिपिक अब प्रमोट भी…लेकिन सीट वही क्यों?
- पदोन्नति आदेश ने और बढ़ा दिए सवाल—क्या ‘यथावत पोस्टिंग’से किसी खास को संरक्षण?
-रवि सिंह-
कोरिया,12 दिसम्बर 2025
(घटती-घटना)।
कुछ सप्ताह पूर्व प्रकाशित समाचार जिला खनिज न्यास का अमर लिपिक ने जिला प्रशासन और खनिज शाखा में हलचल मचा दी थी,रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया था कि जिला खनिज न्यास का एक लिपिक,वर्षों से एक ही सीट पर जमे बैठा था, भर्ती, संपत्ति, पूर्व चयन, और कथित प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे थे,और अधिकारियों में उसे हटाने की ‘हिम्मत’न होने की चर्चाएँ जोरों पर थीं,रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि खनिज जैसी संवेदनशील शाखा में बार-बार वही स्टाफ रखना जोखिमपूर्ण और संदिग्ध माना जाता है, रिपोर्टिंग का उद्देश्य किसी व्यक्ति को निशाना बनाना नहीं प्रणाली की कमजोरियों को उजागर करना है, और इस समय सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि खनिज शाखा में ‘अमर लिपिक’ की स्थिति अब प्रमोशन के साथ और मजबूत होती दिखाई दे रही है।
अमर लिपिक की अमर कुर्सी क्या जिला खनिज शाखा एक व्यक्ति-आधारित व्यवस्था बन चुकी है?
जिला खनिज न्यास शाखा से जुड़ा विवाद कोई नया नहीं है। महीनों से यह चर्चा गर्म थी कि एक ही लिपिक वर्षों से लगातार उसी सीट पर बैठा है भर्ती से लेकर फाइल मूवमेंट, संपत्ति, रखरखाव, खनिज परिवहन, सभी प्रक्रियाओं की ‘चाभी’ एक ही व्यक्ति के हाथों में केंद्रित है, प्रश्न उठाए गए थे कि क्या यह विभाग किसी व्यक्ति के इर्द-गिर्द चलता है, या किसी ऐसी अदृश्य संरचना के अधीन है जिसे छूने की हिम्मत जिला प्रशासन में किसी अधिकारी के पास नहीं? पहले प्रकाशित रिपोर्ट जिला खनिज न्यास का अमर लिपिक ने इस मामले को जिला स्तरीय बहस का मुद्दा बना दिया था। फाइलें जमीं थीं, व्यवस्थाएं कठोर थीं और एक ही सीट पर वर्षों तक जमे रहने का यह रिकॉर्ड कई विभागों में शायद ही देखने को मिलता हो, और अब, हाल ही में जारी पदोन्नति आदेश ने इस विवाद में एक नया अध्याय जोड़ दिया है लिपिक को प्रमोट तो किया गया, लेकिन पोस्टिंग वही रखी गई, नई सीट नहीं, नया विभाग नहीं, नया दायित्व नहीं सबकुछ जस का तस।
क्या प्रमोशन=स्थायी सेटिंग?
कर्मचारी संगठनों में चर्चा गर्म है जब प्रमोशन के बाद भी सीट न बदले, चेयर न बदले, काम न बदले…तो यह प्रमोशन है या पुरानी व्यवस्था का विस्तार? लोग पूछने लगे हैं जिले की ट्रांसफर नीति किसके लिए लागू होती है और किसके लिए नहीं? ‘
पूर्व रिपोर्ट से जुड़ा एक और कनेक्शन…पहले की रिपोर्ट में तीन मुख्य मुद्दे उठे थे…
संपत्ति और अनुचित प्रभाव, कुर्सी पर वर्षों की पकड़, अधिकारियों की मजबूरी या मौन स्वीकृति? अब प्रमोशन आदेश में भी उसी स्टाफ को बिना बदले खनिज शाखा में ही रखा गया है, जिससे यह सवाल और गहरा हो गया है कि क्या खनिज शाखा में पूरी संरचना एक खास स्टाफ के इर्द-गिर्द चल रही है?
चर्चाएँः जिस कुर्सी पर सवाल थे,उस कुर्सी पर ही प्रमोशन के बाद भी टिके रहना क्या यह सामान्य है?
कार्यालयीन हलकों में चर्चा है कि यदि किसी शाखा में शिकायतें और अनियमितताओं पर पहले से ही चर्चा हो, और उसी शाखा में बैठे व्यक्ति को बिना बदले प्रमोशन दे दिया जाए, तो यह संदेश क्या देता है?
संभावित असरः क्या जांच की जरूरत और मजबूत हो गई?
पहले की रिपोर्ट में यह भी उल्लेख था कि खनिज शाखा में करोड़ों की संपत्ति, संवेदनशील फाइलें, और पुरानी चयन प्रक्रिया संदेह के घेरे में रही हैं, अब प्रमोशन के बाद भी पोस्टिंग वही बनाए रखने से जनता में संदेह और गहरा हो गया है।
जनता का सवालः क्या यह प्रशासनिक मजबूरी या कुछ और…?
डेस्क से यह सवाल उठ रहा है क्या खनिज कार्यालय में ऐसा क्या है कि वर्षों से वही स्टाफ, वही कुर्सी, वही सेटिंग चलती रहती है? पूर्व प्रकाशित अमर लिपिक रिपोर्ट के बाद जो सुधार की उम्मीद थी…जो पारदर्शिता की अपेक्षा थी…वह पदोन्नति आदेश आते ही फिर से सवालों में घिर गई, क्योंकि प्रमोशन हुआ, लेकिन व्यवस्था वही और सवाल पहले से अब और बड़े हो गए।
प्रमोशन के बाद भी कुर्सी वही क्यों?
यह सवाल सिर्फ प्रशासनिक निर्णय पर नहीं,बल्कि विभागीय पारदर्शिता पर भी उठता है, नियमों के अनुसार संवेदनशील शाखाओं में लंबे समय तक एक ही कर्मचारी की पोस्टिंग को टाला जाना चाहिए,खनिज शाखा खुद एक अत्यंत संवेदनशील शाखा मानी जाती है, जहाँ राजस्व, रॉयल्टी, खनिज परिवहन, निरीक्षण, और बड़ी मात्रा में फाइलें किसी भी जिले की आर्थिक दिशा तय करती हैं, ऐसे में, वर्षों से एक ही व्यक्ति का एक ही सीट पर बने रहना अपने आप में प्रश्नचिह्न है।
क्या यह सिर्फ संयोग है? या सोची-समझी संरचना?
ताजा प्रमोशन आदेश इसलिए और संदेह बढ़ाता है क्योंकि जब पूरे जिले में पदोन्नति के साथ पोस्टिंग बदली जाती है, जब संवेदनशील शाखाओं में अक्सर रोटेशन किया जाता है, जब एक ही सीट पर वर्षों तक जमे रहना शासन की नीति के विरुद्ध है, तब खनिज शाखा में इतना विशेष संरक्षण क्यों दिखाई देता है? प्रमोशन मिलना एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया है, लेकिन प्रमोशन के बाद भी उसी कुर्सी पर बने रहना अब बहस का विषय बन चुका है।
अब नया मोड़ः पदोन्नति आदेश में भी यथावत पदस्थापना-
जारी हुए ताजा आदेश में जिला खनिज शाखा के जिस लिपिक पर सवाल उठे थे, उन्हीं सहित कई कर्मचारियों को सहायक ग्रेड-3 से सहायक ग्रेड-2 में प्रमोशन दे दिया गया, लेकिन पोस्टिंग वहीं की वहीं! न शाखा बदली…न विभाग बदला…न पदस्थापना बदली…बस प्रमोशन मिला और सीट वही रखी गई, यानी पहले से उठ रहे सवालों के बीच भी प्रशासन ने यथावत पोस्टिंग का रास्ता चुन लिया।
बड़ा सवालः क्या यह सिस्टम किसी का संरक्षण कर रहा है?-
जब पहले से ही खनिज शाखा में एक ही सीट पर वर्षों तक बैठे रहने पर सवाल उठ रहे थे, तो स्थानांतरण नीति का पालन क्यों नहीं हुआ? संवेदनशील शाखाओं में लंबे समय तक एक ही कर्मचारी रखने पर प्रतिबंध क्यों नहीं लागू? यदि खनिज कार्यालय में पहले भी शिकायतें, चर्चाएँ और संपत्ति संबंधी सवाल रहे हैं, तो पदोन्नति के बाद भी उसी स्थान पर बनाए रखना किसका निर्णय?
अधिकारियों की चुप्पी, सबसे बड़ा संकेत…
जब किसी मामले पर लगातार चर्चाएँ उठें, जब मीडिया रिपोर्ट आएँ, जब कर्मचारी संगठन भी सवाल उठाएँ…फिर भी न तबादला, न रोटेशन, न विभागीय समीक्षा, और अब प्रमोशन के बाद भी यथावत तो यह चुप्पी कहीं न कहीं गहरे संकेतों की ओर इशारा करती है, क्या जिला प्रशासन भी अब यह स्वीकार कर चुका है कि यह अमर कुर्सी कभी खाली नहीं होगी? ये सवाल जनता पूछ रही है और प्रशासन इससे कब तक बचता रहेगा?
व्यवस्था वही, कुर्सी वही,और अब प्रमोशन भी वही… क्या यही है नई प्रशासनिक नीति?
क्या आदेश का निष्कर्ष यही है यह सिर्फ एक व्यक्ति की बात नहीं, यह पूरे जिले की प्रशासनिक विश्वसनीयता पर प्रश्न है, अगर संवेदनशील विभागों में जवाबदेही नहीं बनेगी, अगर वर्षों तक एक ही कुर्सी पर कब्जा बना रहेगा, अगर प्रमोशन के बाद भी पोस्टिंग न बदले, तो फिर जनता सवाल पूछेगी और पूछना उसका अधिकार है।
सवाल ये नहीं कि प्रमोशन क्यों दिया गया…सवाल यह है कि सीट क्यों नहीं बदली गई?
सवालः क्या खनिज शाखा में किसी ‘स्थायी व्यवस्था’को बचाया जा रहा है?
सवालः क्या संवेदनशील फाइलों पर पकड़ कमजोर नहीं पड़ने दी जा रही?
सवालः क्या रोटेशन नीति सिर्फ कागजों तक सीमित है?
सवालः क्या किसी की ‘सुविधा ‘इस व्यवस्था पर भारी है?
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