प्रवक्ता बनने पहुंचे इक्षुक और चयन समिति के सामने खड़े हुए ‘प्रश्नों’ के प्रश्न
- विटो पावर, पूर्व जिलाध्यक्ष की मौजूदगी और विचित्र इंटरव्यू,क्या चयन पहले से तय?
- आंदोलन कितने किए? प्रवक्ता चयन में पूछा गया अजीब सवाल,इक्षुकों में नाराज़गी
- पूर्व जिलाध्यक्ष चयन समिति में पक्षपात और पूर्व-निर्धारित परिणाम की आशंका
– ऑनलाइन आवेदन,शॉर्टलिस्ट और फिर जिलाध्यक्षों का विटो पावर प्रक्रिया पर प्रश्नचिह्न


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर 07 दिसम्बर नवंबर 2025 (घटती-घटना)। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी द्वारा सरगुजा संभाग के सभी जिलों के लिए प्रवक्ताओं के चयन हेतु आयोजित टैलेंट हंट कार्यक्रम अब सवालों के घेरे में है, राजीव भवन अंबिकापुर में हुए इस साक्षात्कार में उन उम्मीदवारों ने भाग लिया, जिन्होंने 21 नवंबर 2025 तक ऑनलाइन आवेदन किया था,लेकिन चयन प्रक्रिया और पूछे गए सवालों को लेकर इक्षुकों में असंतोष दिखाई दे रहा है, कांग्रेस का यह टैलेंट टेस्ट एक अवसर था अपने भीतर पारदर्शिता दिखाने का, युवाओं को भरोसा दिलाने का,और योग्यता आधारित चयन का संदेश देने का,लेकिन यदि यह प्रक्रिया भी पहले से तय समीकरणों का विस्तार बनकर रह गई,तो पार्टी जिस बदलाव की बात करती है,वह सिर्फ मंचों की घोषणा बनकर रह जाएगा। बता दें कि कांग्रेस पार्टी में प्रवक्ता बनने के लिए ऑनलाइन आवेदन मंगाए गए थे जिसकी अंतिम तिथि 21 नवंबर 2025 थी और उन्हीं आवेदनों में से साक्षात्कार के लिए इक्षुक लोगों को बुलाया गया था,इसके अतिरिक्त जिला अध्यक्ष कांग्रेस को अलग से विटो पावर प्रदान किया गया था,जिसके अनुसार ऑनलाइन आवेदनों के अतिरिक्त वह दो अपने पसंद के लोगों को भी साक्षात्कार में शामिल करा सकते थे,जिन्हें ऑनलाइन आवेदनों की शॉर्ट लिस्ट तैयार होने के बाद भी साक्षात्कार में शामिल होने का मौका मिल सकता था,सरगुजा सम्भाग के सभी जिलों के लिए राजीव भवन अंबिकापुर में हुए साक्षात्कार में इक्षुक लोगों ने साक्षात्कार दिया और अब उनमें से किसे किस जिले की जिम्मेदारी मिलेगी यह चयन समिति तय करेगी,वैसे कांग्रेस में सभी तरह के चयन को लेकर एक निर्धारित प्रकिया अपनाई जाती है लेकिन जब प्रकिया का परिणाम सामने आता है यह बात सामने नजर आती है कि प्रकिया दिखावा मात्र था और जो परिणाम है वह पहले से तय था,जिलाध्यक्षों की नियुक्ति में भी देखने को मिला कि कई जिलों में जिन्हें जिलाध्यक्ष बनाए जाने को लेकर कोई समर्थन प्रकिया के दौरान नहीं मिली उन्हें ही जिले की पार्टी की पार्टी कमान मिली,अब प्रवक्ताओं की नियुक्ति में भी यदि ऐसा ही कुछ सामने आता है जो वह अचरज का विषय नहीं होगा क्योंकि यह अब कांग्रेस की पहचान जैसा मामला बन चुका है,जहां समर्थन और योग्यता की बजाए बड़े नेताओं की सहमति मायने रखती है।
प्रवक्ता इंटरव्यू या आंदोलन की गिनती? सवालों पर सवाल
साक्षात्कार से होकर आए एक उम्मीदवार ने बताया कि उनसे ऐसे सवाल पूछे गए जिनका प्रवक्ता की भूमिका से कोई सीधा संबंध नहीं था, उदाहरण: आपने अब तक कितने आंदोलन किए? इक्षुकों का कहना है कि जहाँ प्रवक्ता की भूमिका राजनीतिक समझ, टीवी डिबेट कौशल, विपक्षी प्रवक्ताओं को तर्कों से जवाब देने की क्षमता, विचारधारा और मुद्दों पर पकड़ से आंकी जानी चाहिए थी, वहाँ आंदोलन की संख्या पूछना टैलेंट हंट की मूल भावना से मेल नहीं खाता।
चयन समिति में पूर्व जिला अध्यक्ष की मौजूदगी भी चर्चा में
साक्षात्कार में एक पूर्व जिलाध्यक्ष के शामिल होने पर भी सवाल उठ रहे हैं, इक्षुकों के अनुसार, जब चयन निष्पक्ष होना चाहिए, तब किसी पूर्व पदाधिकारी की भूमिका चयन में दखल जैसी लगती है।”
जिलाध्यक्षों को मिला ‘विटो पावर’…प्रक्रिया पर और भी गंभीर सवाल
सूत्र बताते हैं कि कांग्रेस ने जिलाध्यक्षों को विशेष अधिकार दिया था कि ऑनलाइन आवेदन और शॉर्टलिस्ट तैयार होने के बाद भी वे अपने दो पसंदीदा लोगों को सीधे साक्षात्कार में भेज सकते थे, यानी प्रक्रिया के बाहर के नाम भी चयन प्रक्रिया में शामिल हो सकते थे, इक्षुकों का कहना है कि यह प्रावधान चयन के निष्पक्ष होने पर संदेह पैदा करता है।
प्रक्रिया हर बार चलती है,पर परिणाम अक्सर पहले से तय…कार्यकर्ताओं का आरोप…
कांग्रेस में चयन प्रक्रियाओं को लेकर यह चर्चा नई नहीं है,कार्यकर्ताओं का कहना है कि जिलाध्यक्ष चयन हो या संगठनात्मक नियुक्तियाँ या अब प्रवक्ता चयन प्रक्रिया औपचारिक रहती है,लेकिन परिणाम पहले से तय होते दिखते हैं,कुछ जिलों में हाल ही में ऐसे जिलाध्यक्ष नियुक्त हुए, जिन्हें प्रक्रिया के दौरान बहुत कम समर्थन मिला था, फिर भी वे अंतिम चयन में आगे निकल आए,इसी पैटर्न को देखते हुए इक्षुकों का कहना है यदि प्रवक्ता चयन में भी यही दोहराया गया तो यह अचरज की बात नहीं होगी, कांग्रेस में अब योग्यता नहीं,सहमति (बड़े नेताओं की) अधिक मायने रखने लगी है।
दैनिक घटती-घटना का एडिटोरियल कॉलम में अपना विचार
कांग्रेस का यह टैलेंट हंट एक अवसर बन सकता था योग्य वक्ताओं को सामने लाने का, लेकिन जब इंटरव्यू की दिशा आंदोलन की गिनती में बदल जाए, जब चयन समिति के स्वरूप पर ही संदेह उठने लगे,और जिलाध्यक्षों को विटो पावर देकर प्रक्रिया को लचीला बना दिया जाए, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रवक्ता पद वास्तव में ‘प्रक्रिया’ से तय होंगे या ‘पसंद’ से? कांग्रेस को यदि अपने संचार तंत्र को मजबूत करना है, तो उसे चयन प्रक्रिया को पारदर्शी, तर्क-आधारित और योग्यता-केंद्रित बनाना होगा,वरना प्रवक्ता नहीं,‘प्रबंधित नाम’ सामने आएँगे और पार्टी का नुकसान भी उन्हीं बहसों में दिखेगा जहाँ प्रवक्ता सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
प्रक्रिया बनाम प्रभाव…कांग्रेस का टैलेंट टेस्ट
कांग्रेस पार्टी ने सरगुजा संभाग में प्रवक्ता चयन के लिए टैलेंट हंट का आयोजन कर यह संदेश देने की कोशिश की कि संगठन अब योग्यता आधारित ढांचे की ओर बढ़ रहा है। लेकिन कार्यक्रम से बाहर निकलते ही प्रतिभागियों की प्रतिक्रियाएँ बताती हैं कि इस प्रक्रिया ने जितनी उम्मीदें जगाईं थीं,उतने ही सवाल भी खड़े किए हैं,एक प्रवक्ता का चयन महज़ साक्षात्कार का विषय नहीं होता यह पार्टी की वैचारिक आवाज़, तर्क क्षमता,जनसंवाद और मीडिया प्रबंधन का प्रतिनिधित्व होता है,इसलिए चयन प्रक्रिया जितनी मजबूत और पारदर्शी होगी,पार्टी का प्रदर्शन उतना ही प्रभावी दिखाई देगा, लेकिन अंबिकापुर में पूछे गए प्रश्नों और चयन समिति की संरचना को देखकर ऐसा प्रतीत हुआ कि कांग्रेस संगठन अभी भी पुराने ढर्रे पर अटका हुआ है,जहाँ योग्यता से ज्यादा रिश्ते और समीकरण भारी पड़ते हैं, सबसे बड़ा सवाल चयन समिति को लेकर है। जब समिति में पूर्व जिला अध्यक्ष जैसे पदाधिकारी मौजूद हों, तो स्वाभाविक है कि निष्पक्षता पर प्रश्न उठेंगे। साथ ही जिलाध्यक्षों को दी गई ‘वीटो पावर’ ने मेरिट-आधारित चयन को कमजोर किया है। यदि किसी के पास इतनी छूट हो कि शॉर्टलिस्ट के बाहर भी वह अपने पसंद के दो लोगों को जोड़ सके, तो लोग प्रक्रिया की नीयत पर सवाल उठाने से खुद को रोक भी नहीं पाएंगे,चयन में पूछे गए सवालों पर भी असहमति है, प्रवक्ता के काम की प्रकृति के अनुसार उसकी तर्कशक्ति, राजनीतिक समझ, और मीडिया में खुद को स्थापित करने की क्षमता प्रमुख होनी चाहिए। लेकिन यदि उससे पूछा जाए कि उसने कितने आंदोलन किए, तो यह चयन की गंभीरता को हल्का कर देता है, आंदोलन संगठन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, पर प्रवक्ता चयन का आधार नहीं, कांग्रेस अक्सर कहती है कि वह युवाओं को अवसर देती है, प्रक्रिया को महत्व देती है और पारदर्शिता को सर्वोपरि मानती है। लेकिन जब प्रक्रियाएँ ‘कागज़ पर पारदर्शी’ और ‘भूगोल में प्रभावित’ दिखने लगें, तो पार्टी की विश्वसनीयता सवालों में घिरती है, आज कांग्रेस को एक बात समझनी होगी प्रक्रिया के प्रति अविश्वास, परिणामों को विवादित बना देता है, और जब प्रवक्ता जैसे महत्वपूर्ण पद का चयन विवाद से घिर जाए, तो उसका असर केवल संगठन पर नहीं, पार्टी की सार्वजनिक छवि पर भी पड़ता है।
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