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अंबिकापुर@फिर अंबिकापुर में सरकार बनाम सरकार!

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न्यायालय वही बने जहाँ जनता के लिए न्याय प्राप्त करना सरल हो,न्याय जनता के बीच रहे…जनता से दूर नहीं : सम्पूर्णाक

  • अंबिकापुर में न्यायालय भवन के नए निर्माण स्थल पर घमासान,अपनी ही सरकार के खिलाफ उतरे सांसद,मंत्री और महापौर
  • न्यायालय भवन को शहर से 10 किलोमीटर दूर ले जाने के निर्णय पर विवाद तेज,प्रशासन और जुडिशरी पर मनमानी के आरोप


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर,08 नवम्बर 2025
(घटती-घटना)।

सरगुजा मुख्यालय अंबिकापुर में प्रस्तावित नए जिला न्यायालय भवन के निर्माण स्थल को लेकर राजनीतिक और प्रशासनिक खींचतान तेज हो गई है,मामला कितना गंभीर हो गया है कि भाजपा के सांसद,मंत्री और महापौर तीनों अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना देने पर मजबूर हो गए। जिला एवं सत्र न्यायालय के नए भवन के लिए चुने गए स्थान को लेकर जनता और अधिवक्ताओं में गहरा असंतोष है, वर्तमान न्यायालय परिसर जहां वर्षों से न्यायिक गतिविधियों का केंद्र रहा है उसी स्थान पर नया भवन निर्माण की मांग उठ रही है। लेकिन इसके विपरीत न्यायालय को शहर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थानांतरित करने का निर्णय लिया गया जिसे अधिवक्ताओं एवं नागरिकों ने जनहित के विरुद्ध एवं दादागिरी पूर्ण निर्णय बताया है। जानकारी के अनुसार जिस भूमि को पहले क्रिकेट एसोसिएशन को देने की बात कही जा रही थी उसी स्थान को अब जल्दबाजी में न्यायालय निर्माण हेतु स्वीकृत कर दिया गया, जबकि वर्तमान न्यायालय परिसर के आसपास करीब 2 एकड़ 69 डिसमिल शासकीय भूमि पहले से उपलब्ध है। इसके अलावा समीपस्थ गुलाब कॉलोनी जो कथित रूप से शासकीय भूमि पर ही बनी है,उसे खाली कराया जाए तो अतिरिक्त लगभग 4 एकड़ भूमि आसानी से उपलब्ध हो सकती है,अधिवक्ताओं का आरोप है कि प्रशासन इस दिशा में कार्रवाई करने से इसलिए बच रहा है क्योंकि इस कॉलोनी में कोर्ट मैनेजर और कोर्ट अधीक्षक सहित कुछ प्रभावशाली लोग स्वयं कब्जाधारी हैं। इन लोगों को हटाना प्रशासन के लिए असुविधाजनक होता,इसलिए न्यायालय को जनता से दूर ले जाने का संकल्प अपनाया गया।
जनता और अधिवक्ता एकजुट
स्थानीय नागरिकों और अधिवक्ता संघ ने भी मौजूदा परिसर के समीप भवन निर्माण की मांग को सही ठहराया है,उनका कहना है कि नया न्यायालय भवन शहर के केंद्र से दूर होने पर वादकारियों को न्याय पाने में अतिरिक्त परेशानी झेलनी पड़ेगी।
प्रशासन मौन,सवाल कायम
जनप्रतिनिधियों के सार्वजनिक विरोध और सोशल मीडिया पर बढ़ती नाराज़गी के बावजूद प्रशासनिक स्तर पर अब तक कोई स्पष्ट प्रतिक्रिया नहीं आई है,लोग पूछ रहे हैं,जब सत्ता में रहते हुए मंत्री और सांसद को ही अपनी सरकार से निर्णय कराने के लिए आंदोलन करना पड़े,तो आम जनता की सुनवाई कौन करेगा?
फिर अंबिकापुर में सरकार बनाम सरकार
इधर सरगुजा मुख्यालय अंबिकापुर में भाजपा के सांसद चिंतामणि महाराज,पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल और महापौर तीनों अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना देते नजर आए, मुद्दा नए जिला न्यायालय भवन का स्थान, तीनों नेताओं ने पत्र लिखकर मांग की कि भवन मौजूदा परिसर के पास बने,लेकिन जवाब में खुद की सरकार का प्रशासन ही चुप्पी साधे हुए है।
न्यायालय को शहर से दूर ले जाने का असर जनता पर कैसे पड़ेगा : वादकारियों और ग्रामीणों कोः बस से उतरकर ऑटो या अन्य साधन से न्यायालय तक पहुंचना पड़ेगा इससे यात्रा में समय व किराए का दोगुना खर्च बढ़ जाएगा यदि उन्हें उसी दिन राजस्व विभाग, कलेक्ट्रेट या वकालत के अन्य कार्यालयों में जाना पड़े,तो उन्हें फिर शहर लौटने पर अतिरिक्त खर्च उठाना पड़ेगा अधिवक्ताओं का कहना हैः यह निर्णय जनता के लिए न्याय पाने की प्रक्रिया को सरल नहीं,बल्कि महंगा और कठिन बना देगा। यह न्याय को जनता से दूर ले जाने वाला कदम है।
स्थल चयन पर असहमति, पुराने परिसर के पास निर्माण की मांग-
सरगुजा सांसद चिंतामणि महाराज, पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल और अंबिकापुर महापौर सहित स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने शासन को पत्र लिखकर स्पष्ट कहा है कि न्यायालय भवन का निर्माण मौजूदा कोर्ट परिसर के पास ही किया जाए, ताकि अधिवक्ताओं, वादकारियों और आम जनता को सुविधा बनी रहे, वहीं प्रशासन ने नया स्थान शहर से दूर क्षेत्र में चयनित कर लिया है, जिसका विरोध अब खुलकर सामने आ रहा है।
अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना,सोशल मीडिया पर तंज
धरना और विरोध के इस अनोखे रूप पर सोशल मीडिया में तीखी प्रतिक्रियाएं देखने को मिलीं, लोगों ने लिखा, अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना, इसे कहते हैं स्वयं से संघर्ष की कला। जब मंत्री-सांसद की नहीं सुन रहा प्रशासन, तो जनता की कौन सुनेगा? सत्ता में रहकर समर्थन मांगना भी अब गज़ब है।


जनता की प्रतिक्रिया
स्वयं से संघर्ष की कला! सोशल मीडिया पर लोग इस मुद्दे पर जमकर टिप्पणी कर रहे हैं,कुछ प्रमुख प्रतिक्रियाएं…
दिनेश कुमार शर्मा : अपनी ही सरकार के खिलाफ धरना — इसे कहते हैं स्वयं से संघर्ष की कला!
अविषेक शुक्ला : ग़ज़ब का उल्लू बना रहे हैं सबको इस्तीफा देना चाहिए,सरकार में रहना व्यर्थ है।
विनोद हर्ष : इसी को लोकतंत्र कहते हैं।
विकास शर्मा : सत्ता में रहते मंत्री,सांसद समर्थन दे रहे हैं — गज़ब है!
राज गुप्ता : सांसद शासन से निर्णय कराने में सक्षम हैं या समर्थन का मूल्य ही यही है?
रविशंकर पाण्डेय : यह गुंडों की संरक्षण वाली सरकार है।
मनोज कुमार तिवारीः सरकार की सुनवाई ही नहीं कर रहे हैं प्रशासनिक अधिकारी
आम जनता पर बढ़ेगा बोझ


शहर और दूर-दराज से आने वाले वादकारियों को अब न्यायालय पहुँचने में अतिरिक्त यात्रा समय, बस किराया, ऑटो का अलग खर्च सब कुछ अधिक देना होगा, जो व्यक्ति शहर के विभिन्न विभागों,विशेषकर राजस्व कार्यालय, में भी कार्य करते हैं,उन्हें अदालत से वापस शहर लौटने में पुनः खर्च और समय की हानि झेलनी पड़ेगी। नागरिकों का कहना है कि यह फैसला उनके लिए सजा से कम नहीं।
अधिवक्ताओं के लिए भी जोखिम
अधिवक्ताओं का कहना है कि अब उन्हें राजस्व न्यायालय और जिला न्यायालय के बीच बार-बार यात्रा करनी होगी, जिससे न केवल समय की भारी बर्बादी होगी,बल्कि सड़क दुर्घटनाओं का जोखिम भी बढ़ जाएगा।
निर्माण की गुणवत्ता पर भी सवाल
कुछ अधिवक्ताओं का कहना है कि न्यायालय भवन को शहर से दूर इसलिए बनाया जा रहा है ताकि निर्माण कार्य की गुणवत्ता पर निगरानी कमजोर हो जाए। शहर में निर्माण होता, तो अधिवक्ता और जनता नियमित रूप से गुणवत्ता की निगरानी कर सकते थे। दूर स्थान निर्माण होने से निर्माण एजेंसियों को गुणवत्ता में समझौता कर लेने का अवसर मिल सकता है।
न्याय जनता के बीच रहे,जनता से दूर नहीं
यह पूरा मामला अब सिर्फ निर्माण स्थल चयन का नहीं, बल्कि जनसुविधा बनाम प्रशासनिक मनमानी का विषय बन गया है, जनता और अधिवक्ताओं की मांग साफ है, न्यायालय वहीं बने जहाँ जनता के लिए सुविधाजनक हो, न्याय जनता के बीच रहे, जनता से दूर नहीं। यह मुद्दा अब केवल निर्माण स्थल का विवाद नहीं,बल्कि जनहित बनाम प्रशासनिक मनमानी का प्रश्न बन गया है, अधिवक्ताओं और आम जनता की मांग है न्याय जनता के लिए है, इसलिए न्यायालय जनता के बीच ही रहना चाहिए,दूर नहीं।


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