इसरो की गौरव गाथा और भारत की अंतरिक्ष सफलता
नई दिल्ली,24 अगस्त 2025 (ए)।भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की ऐतिहासिक उपलब्धियों और भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र में उभरते स्थान को अब स्कूली बच्चों तक पहुँचाने का अहम प्रयास किया गया है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद ने अपने नए शैक्षिक मॉड्यूल में इसरो की गौरव गाथा को शामिल किया है। यह मॉड्यूल 1960 के दशक में साइकिल और बैलगाड़ी पर रॉकेट पुर्जों के परिवहन से लेकर चंद्रयान, मंगलयान और गगनयान जैसे महान अंतरिक्ष अभियानों तक भारत के सफर को विस्तार से दर्शाता है।
भारत: एक उभरती हुई अंतरिक्ष शक्ति
एनसीईआरटी ने दो मॉड्यूल जारी किए हैं — एक मध्य स्तर के छात्रों के लिए और दूसरा माध्यमिक स्तर के छात्रों के लिए। इन मॉड्यूल का शीर्षक है ‘भारत एक उभरती हुई अंतरिक्ष शक्ति’, जिसमें 1962 में विक्रम साराभाई के नेतृत्व में स्थापित भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति की स्थापना से लेकर इसरो के विकास और उपलब्धियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। मॉड्यूल में बताया गया है कि भारत का पहला रॉकेट इतना छोटा और हल्का था कि उसके पुर्जे साइकिल और बैलगाड़ी पर ले जाए जाते थे। मोटर वाहन जैसे कार और ट्रक विद्युत और चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न करते हैं, जो नाज़ुक रॉकेट उपकरणों को नुकसान पहुंचा सकते थे, इसलिए वैज्ञानिकों ने साइकिल और बैलगाड़ी को प्राथमिकता दी। इस सरल लेकिन सोच-समझकर लिए गए कदम ने शुरुआती मिशनों को सफलता दिलाने में मदद की।
मॉड्यूल में भारत के दो प्रसिद्ध अंतरिक्ष यात्रियों स्मड्रन लीडर राकेश शर्मा और ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला को भी शामिल किया गया है। राकेश शर्मा 1984 में सोवियत मिशन पर अंतरिक्ष यात्रा करने वाले पहले भारतीय बने थे, जबकि शुभांशु शुक्ला जून 2025 में अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर रहने वाले पहले भारतीय बने। इन दोनों की कहानियां छात्रों को प्रेरित करेंगी।
प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में अंतरिक्ष की महत्ता
इस शैक्षिक मॉड्यूल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक उद्धरण भी शामिल है, जिसमें उन्होंने कहा है कि अंतरिक्ष हमारे दैनिक जीवन का अभिन्न हिस्सा है, जो आधुनिक संचार का आधार है और दूर-दराज के परिवारों को जोड़ता है। भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम हमारे देश की पैमाने, गति और कौशल का आदर्श उदाहरण है।
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