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कोरिया @कोरिया जिले में साहू समाज का नेतृत्व कौन करेगा?

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  • छह महीने से अटकी चुनावी गाड़ी,अब नए पर्यवेक्षकों पर टिकी निगाहें…
  • 25 हजार की आबादी,लेकिन मतदाता सिर्फ 73! अध्यक्ष चुनाव से पहले फिर खड़े हुए बड़े सवाल
  • 73 बनाम 25 हजार का महासंग्राम : आखिर कोरिया साहू समाज का अध्यक्ष कौन बनेगा?
  • छह महीने से कुर्सी खाली, बैठकों का अंबार,पत्रों की भरमार,पर्यवेक्षक फिर तैयार; समाज पूछ रहा – चुनाव होगा या फिर नया इंतजार?
  • कोरिया साहू समाज में फिर चुनावी शंखनाद,सवाल वही—मतदाता बढ़ेंगे या विवाद?
  • पत्र, बैठक,विवाद और पर्यवेक्षक, फिर भी नहीं तय हो पाया साहू समाज का नया सरदार…
  • साहू समाज का चुनाव या सीमित लोकतंत्र का प्रयोग? 25 हजार लोगों के बीच 73 मतदाताओं पर बहस तेज
  • कुर्सी खाली,दावेदार तैयार, समाज इंतजार में,क्या इस बार निष्पक्ष होगा साहू समाज का चुनाव?
  • 25 हजार का समाज, 73 का लोकतंत्र! अब पर्यवेक्षक बताएंगे अध्यक्ष का रास्ता


-रवि सिंह-
कोरिया,14 जून 2026(घटती-घटना)।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी यह मानी जाती है कि जनता अपने प्रतिनिधि चुनती है,लेकिन कोरिया जिला साहू समाज में पिछले छह महीनों से चल रही चुनावी कवायद ने एक नया सवाल खड़ा कर दिया है क्या यहां अध्यक्ष जनता चुनेगी, सदस्य चुनेंगे,या फिर विवाद ही अध्यक्ष बनकर बैठ जाएगा?
कोरिया जिले में साहू समाज का जिला अध्यक्ष कौन होगा,यह सवाल आज समाज के हर चौपाल,हर बैठक और हर व्हाट्सएप ग्रूप में गूंज रहा है,वजह भी साफ है,पिछले छह महीनों में चुनाव की घोषणा हुई,स्थगित हुई,मतदाता सूची पर विवाद हुआ,मुख्य निर्वाचन अधिकारी बदले गए,इस्तीफे हुए, आरोप लगे, जवाब आए,खबरें छपीं,प्रदेश नेतृत्व सक्रिय हुआ और अब एक बार फिर पर्यवेक्षकों की नियुक्ति कर दी गई है,लेकिन अध्यक्ष का नाम आज भी फाइलों,बैठकों और चर्चाओं के बीच कहीं अटका हुआ है।
25 हजार की आबादी और लोकतंत्र का ‘73 मॉडल’
पूरे विवाद की जड़ वही संख्या है जिसने पूरे प्रदेश का ध्यान कोरिया की ओर खींचा था—73 मतदाता,समाज के जानकारों के अनुसार कोरिया जिले में साहू समाज की आबादी लगभग 25 हजार से अधिक मानी जाती है, जिले के अनेक गांवों,कस्बों और शहरों में समाज के लोग बड़ी संख्या में निवास करते हैं, ऐसे में जब चुनावी प्रक्रिया शुरू हुई और मतदाता सूची सामने आई तो उसमें मात्र 73 नाम दिखाई दिए,बस यहीं से सवालों की बाढ़ आ गई, लोग पूछने लगे कि क्या 25 हजार लोगों के सामाजिक भविष्य का फैसला सिर्फ 73 लोग करेंगे? क्या बाकी समाज केवल दर्शक बना रहेगा? क्या संगठन की सदस्यता इतनी सीमित हो चुकी है या फिर सदस्यता विस्तार का प्रयास ही नहीं किया गया? व्यंग्य करने वाले तो यहां तक कहने लगे कि यदि यही लोकतंत्र का नया मॉडल है तो भविष्य में पंचायत चुनाव भी दो मोहल्लों और विधानसभा चुनाव चार गलियों से करा लिए जाएं।
कोरिया का चुनाव, पूरे प्रदेश की नजर…
अब यह केवल कोरिया जिले का मामला नहीं रह गया है, जिस तरह यह विवाद लगातार चर्चा में रहा,उससे प्रदेश स्तर पर भी लोगों की नजर इस चुनाव पर टिक गई है,कई जिलों के समाजजन यह देखना चाहते हैं कि प्रदेश नेतृत्व आखिर इस मामले को किस तरह सुलझाता है, क्या सदस्यता का विस्तार होगा? क्या नई मतदाता सूची बनेगी? क्या पारदर्शिता बढ़ेगी? क्या सभी पक्षों को साथ लेकर चुनाव होगा? या फिर केवल तारीख बदलेगी और पुरानी कहानी नए कागज पर लिख दी जाएगी?
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है…
इन तमाम बैठकों, आदेशों, नियुक्तियों और चर्चाओं के बीच सबसे बड़ा सवाल आज भी वहीं खड़ा है क्या इस बार अध्यक्ष निष्पक्ष तरीके से चुना जाएगा? क्या समाज के अधिक लोगों को मतदान का अधिकार मिलेगा? क्या 73 की संख्या बढ़कर सैकड़ों या हजारों तक पहुंचेगी? क्या समाज की नई पीढ़ी को भी निर्णय प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा? और सबसे महत्वपूर्ण— क्या चुना जाने वाला अध्यक्ष पूरे 25 हजार लोगों का प्रतिनिधि होगा या फिर केवल मतदाता सूची में दर्ज कुछ नामों का?
खबरों ने हिलाई व्यवस्था,प्रदेश नेतृत्व को करना पड़ा हस्तक्षेप…
जनवरी और फरवरी के दौरान लगातार प्रकाशित खबरों ने इस पूरे मामले को समाज के भीतर से निकालकर सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया,मतदाता सूची,सदस्यता,चुनाव प्रक्रिया और पारदर्शिता को लेकर उठे सवाल लगातार बढ़ते गए,समाज के अनेक वरिष्ठ और युवा सदस्यों ने खुलकर कहा कि चुनाव से पहले सदस्यता अभियान चलाया जाना चाहिए,जब विवाद बढ़ा तो चुनाव प्रक्रिया पर रोक लगी,चुनाव स्थगित हुआ, फिर नई चर्चाएं शुरू हुईं। फिर नई बैठकों का दौर चला,अब हालात ऐसे बने कि प्रदेश साहू संघ को सीधे हस्तक्षेप करना पड़ा और आखिरकार 13 जून 2026 को संशोधित आदेश जारी कर कोरिया जिले के लिए नए पर्यवेक्षक नियुक्त कर दिए गए।
पर्यवेक्षक आए हैं, लेकिन क्या व्यवस्था भी बदलेगी?
प्रदेश साहू संघ ने रायपुर के सत्यप्रकाश साहू और प्रदीप साहू को पर्यवेक्षक नियुक्त किया है,आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि चुनाव प्रक्रिया 15 दिनों के भीतर पूरी कराई जाएगी तथा सदस्यता,मतदाता सूची,आय-व्यय, दस्तावेज और अन्य अभिलेखों की समीक्षा की जाएगी,लेकिन समाज के भीतर अब चर्चा पर्यवेक्षकों की नियुक्ति से आगे बढ़ चुकी है, लोग पूछ रहे हैं कि क्या पर्यवेक्षक केवल चुनाव करवाने आए हैं या चुनाव से पहले उन सवालों का जवाब भी तलाशेंगे जिनकी वजह से पूरा विवाद खड़ा हुआ था? क्योंकि यदि पुरानी सूची के आधार पर चुनाव करा दिया गया तो फिर वही सवाल उठेंगे जो पिछले छह महीनों से उठ रहे हैं।
समाज चाहता है पहले सदस्य बढ़ें, फिर अध्यक्ष चुना जाए…
समाज के एक बड़े वर्ग की मांग है कि चुनाव से पहले व्यापक सदस्यता अभियान चलाया जाए, उनका तर्क सीधा है,जब समाज की आबादी हजारों में है तो मतदाता सूची भी व्यापक होनी चाहिए,गांव-गांव जाकर सदस्य बनाए जाएं, युवाओं को जोड़ा जाए,महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जाए,इसके बाद नई मतदाता सूची प्रकाशित की जाए और फिर चुनाव कराया जाए,कई समाजजन मानते हैं कि अध्यक्ष पद की असली ताकत वोटों की संख्या में नहीं बल्कि सामाजिक स्वीकार्यता में होती है, यदि चुनाव सीमित दायरे में होगा तो परिणाम चाहे जो हो, विवाद खत्म नहीं होगा।
कुर्सी की लड़ाई या समाज का नेतृत्व?
पिछले कुछ महीनों की घटनाओं ने एक और बहस को जन्म दिया है, क्या चुनाव वास्तव में समाज के विकास के लिए हो रहा है या फिर यह केवल अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंचने की होड़ बनकर रह गया है? कई वरिष्ठ समाजजन कहते हैं कि संगठन का उद्देश्य सामाजिक एकता,शिक्षा,आर्थिक उन्नति और सामुदायिक विकास होना चाहिए,लेकिन पिछले महीनों में चर्चा विकास की कम और अध्यक्ष पद की ज्यादा दिखाई दी,कुर्सी अभी तक खाली है,लेकिन उसके आसपास राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ता जा रहा है।
अब फैसला पर्यवेक्षकों के हाथ में नहीं,भरोसे के हाथ में है…
सत्यप्रकाश साहू और प्रदीप साहू की नियुक्ति के बाद चुनावी प्रक्रिया एक बार फिर पटरी पर लौटती दिखाई दे रही है,लेकिन असली चुनौती चुनाव कराना नहीं है,बल्कि चुनाव पर समाज का भरोसा वापस लाना है, क्योंकि अध्यक्ष का चुनाव एक दिन में हो जाएगा, मतगणना भी कुछ घंटों में पूरी हो जाएगी,परिणाम भी घोषित हो जाएगा, लेकिन यदि समाज का विश्वास नहीं जीता गया तो विवाद का चुनाव खत्म होगा, विवाद नहीं, कोरिया का साहू समाज आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहां उसे सिर्फ अध्यक्ष नहीं चुनना है,बल्कि यह तय करना है कि आने वाले वर्षों में उसका संगठन सीमित दायरे का क्लब बनेगा या फिर 25 हजार लोगों की सामूहिक आवाज,और फिलहाल यही सवाल पूरे जिले में गूंज रहा है अध्यक्ष कौन बनेगा? से भी बड़ा सवाल है अध्यक्ष को चुनने का अधिकार आखिर किन-किन लोगों को मिलेगा?


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