

- पहले देरी,फिर गुणवत्ता पर सवाल और अब सड़क धंसी! गंगोटी-शिवपुर मार्ग पर पीडब्ल्यूडी कटघरे में…
- एस्टीमेट में मजबूत सड़क,जमीन पर धंसता रास्ता! 7.18 करोड़ की परियोजना पर बड़ा सवाल…
- ठेकेदार को एक्सटेंशन पर एक्सटेंशन, सड़क फिर भी अधूरी…अब बारिश ने दिखा दी असली तस्वीर!
- कागजों में करोड़ों की सड़क,जमीन पर गड्ढे और धंसाव! पीडब्ल्यूडी की निगरानी पर सवाल…
- ह्यूम पाइप डाला,मिट्टी भरी और छोड़ दिया? बारिश आते ही धंस गई 7.18 करोड़ की सड़क!
- 5 महीने का काम,14 महीने में भी अधूरा…जो बना वो भी बैठ गया…आखिर जिम्मेदार कौन?
- गंगोटी-शिवपुर सड़कः विकास की राह या कमीशन का गलियारा? पहली बारिश में धंसाव ने बढ़ाए सवाल…
- दैनिक घटती-घटना का अंदेशा सच होता दिखा…गुणवत्ता पर उठे सवालों के बीच सड़क में बड़ा धंसाव…
-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर,01 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। गंगोटी से शिवपुर नवापारा तक बनने वाली 5.10 किलोमीटर सड़क को लेकर दैनिक घटती घटना ने निर्माण की शुरुआत से ही जो सवाल उठाए थे,अब मौके की तस्वीरें उन सवालों को और गंभीर बना रही हैं, समय पर सड़क नहीं बनी,गुणवत्ता को लेकर भी सवाल उठे और अब बारिश के बाद सड़क के नीचे की संरचना के बैठने की तस्वीर सामने आ गई है। लोक निर्माण विभाग द्वारा जारी कार्यादेश के अनुसार इस सड़क की अनुमानित लागत 718.42 लाख यानी करीब 7.18 करोड़ रुपये है,कार्यादेश 30 जून 2025 को जारी हुआ था और इसमें कार्य की अवधि 5 माह 00 दिन,वर्षा ऋतु सहित निर्धारित की गई थी,ठेका मे.जवाहरलाल गुप्ता को दिया गया था और स्वीकृत दर स्ह्रक्र से 18.18 प्रतिशत कम थी,यानी जिस सड़क को नवंबर 2025 के आसपास पूरा हो जाना चाहिए था,वह सितंबर 2026 में भी पूरी नहीं हुई है,अब सवाल सिर्फ यह नहीं है कि सड़क कब बनेगी,बल्कि सवाल यह भी है कि जो हिस्सा बनाया गया, वह पहली ही बरसात में क्यों बैठने लगा?
जिस बात का अंदेशा था, वही तस्वीर सामने आ गई- निर्माण के दौरान पहले भी यह सवाल उठाया गया था कि सड़क का काम एस्टीमेट और तकनीकी मानकों के अनुरूप हो रहा है या नहीं,उस समय यह आशंका जताई गई थी कि यदि सड़क के नीचे पानी की निकासी के लिए लगाए जा रहे पाइपों और उनके आसपास की संरचना को उचित तरीके से तैयार नहीं किया गया तो बरसात में सड़क बैठ सकती है,अब सामने आई तस्वीरों में सड़क की सतह के नीचे गहरी मिट्टी धंसने और खाली जगह बनने जैसी स्थिति दिखाई दे रही है,एक स्थान पर सड़क के नीचे लगा पाइप स्पष्ट दिखाई दे रहा है और उसके आसपास की मिट्टी बड़े हिस्से में हटती या धंसी हुई नजर आती है,सड़क के ऊपर का हिस्सा भी प्रभावित दिखाई दे रहा है,यह तस्वीरें अपने आप में निर्माण दोष का अंतिम तकनीकी प्रमाण नहीं हैं, लेकिन इतनी गंभीर स्थिति निश्चित रूप से तत्काल तकनीकी जांच की मांग करती है।
ह्यूम पाइप के ऊपर सड़क, नीचे धंसी मिट्टी—कहां हुई चूक?- सड़क में पानी की निकासी के लिए 600 मिमी व्यास के RCC NP-x/Prestressed Concrete Pipe का प्रावधान BOQ में दर्ज है, अंतिम BOQ में इसकी मात्रा 110 मीटर दी गई है,लेकिन मौके की तस्वीर में जिस स्थान पर पाइप दिखाई दे रहा है,वहां उसके आसपास और ऊपर की मिट्टी में गंभीर धंसाव नजर आ रहा है, यहीं से सबसे बड़ा तकनीकी सवाल पैदा होता है क्या पाइप की बेडिंग,जॉइंटिंग,बैकफिलिंग और कम्पेक्शन निर्धारित तकनीकी प्रक्रिया के अनुसार किया गया था? क्या पाइप के दोनों ओर और ऊपर पर्याप्त रूप से स्वीकृत सामग्री डाली गई? क्या उस सामग्री को निर्धारित तरीके से परत-दर-परत कम्पैक्ट किया गया? क्या पानी के दबाव और मिट्टी के कटाव को ध्यान में रखकर सुरक्षा व्यवस्था की गई? इन सवालों का जवाब केवल मौके पर निरीक्षण और तकनीकी परीक्षण से ही मिल सकता है।
सिर्फ पाइप डाल देना ही सड़क निर्माण नहीं–सड़क के नीचे पाइप डालकर उसके ऊपर मिट्टी डाल देना पर्याप्त नहीं होता, कलवर्ट अथवा पाइप क्रॉसिंग की मजबूती इस बात पर निर्भर करती है कि उसके आसपास की संरचना किस तरह तैयार की गई, पाइप को किस आधार पर रखा गया और बैकफिलिंग व कम्पेक्शन किस गुणवत्ता से हुआ,वर्क ऑर्डर में सड़क निर्माण के अलावा संरचनात्मक एवं कलवर्ट संबंधी कई मदें शामिल हैं,दस्तावेज में पाइप कलवर्ट के लिए प्रथम श्रेणी की बेडिंग तथा अन्य संबंधित कार्यों का उल्लेख है,ऐसे में अब विभाग को यह बताना चाहिए कि मौके पर लगाए गए पाइप की बेडिंग और उसके आसपास की बैकफिलिंग किस मानक से की गई थी।
पहली बारिश में सड़क का बैठना सामान्य है या निर्माण की खामी?- यह सबसे महत्वपूर्ण सवाल है, निर्माणाधीन सड़क पर बारिश के बाद कुछ अस्थायी क्षति होना संभव हो सकता है,लेकिन यदि सड़क के नीचे बड़ा खोखलापन बन जाए,मिट्टी धंस जाए और ऊपर की सड़क की संरचना प्रभावित हो जाए, तो इसे सामान्य मानकर छोड़ना उचित नहीं होगा, इसलिए विभाग को मौके पर तत्काल जांच कर यह निर्धारित करना चाहिए कि धंसाव का कारण क्या है—जलभराव? अपर्याप्त कम्पेक्शन? पाइप के आसपास खराब बैकफिलिंग? मिट्टी का कटाव? ड्रेनेज डिजाइन की समस्या? या निर्माण प्रक्रिया में कोई तकनीकी कमी? बिना जांच के किसी एक कारण को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन जांच न करना उससे भी बड़ा सवाल होगा।
सड़क की हालत देखकर आवागमन भी खतरे में– ताजा तस्वीरों में सड़क के कई हिस्से बारिश के पानी से भरे दिखाई दे रहे हैं, कहीं गहरी कीचड़ है तो कहीं गिट्टी और मिट्टी का मिश्रण सड़क की सतह पर फैला है,ऐसे मार्ग से दोपहिया वाहनों और ग्रामीणों का आवागमन मुश्किल हो रहा है,जिस सड़क से ग्रामीणों को बेहतर कनेक्टिविटी मिलनी थी,वही निर्माण अवधि में परेशानी का कारण बनती जा रही है, सबसे चिंता की बात यह है कि सड़क अभी पूरी भी नहीं हुई है और निर्माणाधीन हिस्से में ही इस प्रकार की समस्याएं सामने आने लगी हैं।
5 महीने की समय-सीमा कहां गई?- कार्यादेश में स्पष्ट रूप से 5 माह 00 दिन की कार्य अवधि दी गई थी,अब निर्धारित अवधि समाप्त हुए काफी समय बीत चुका है,इसलिए अब विभाग से केवल सड़क पूरी करने की तारीख पूछना पर्याप्त नहीं है। जनता को यह भी बताया जाना चाहिए कि अब तक कितनी बार एक्सटेंशन दिया गया? पहला एक्सटेंशन कब दिया गया? दूसरा एक्सटेंशन कब दिया गया? कुल कितने दिनों की समय-वृद्धि स्वीकृत हुई? अगली पूर्णता तिथि क्या निर्धारित की गई है? क्या विलंब के लिए ठेकेदार को नोटिस दिया गया? कितने नोटिस जारी हुए? क्या किसी प्रकार का दंड लगाया गया? क्या समय-वृद्धि के लिए सक्षम अधिकारी से विधिवत अनुमति ली गई? इन सवालों का जवाब विभागीय फाइलों में जरूर होना चाहिए।
एक्सटेंशन की फाइल जनता के सामने क्यों नहीं?- यदि ठेकेदार को समय पर काम पूरा करने में कठिनाई हुई और विभाग ने नियमों के तहत समय-वृद्धि दी, तो उसके कारण भी स्पष्ट होने चाहिए,यदि बारिश,भूमि अधिग्रहण, साइट की समस्या,तकनीकी परिवर्तन या अन्य कोई वास्तविक कारण था तो उसका दस्तावेजी रिकॉर्ड होना चाहिए,लेकिन यदि बार-बार समय-वृद्धि दी गई और काम की गति में अपेक्षित सुधार नहीं हुआ,तो फिर अनुबंध प्रबंधन और विभागीय निगरानी दोनों की समीक्षा जरूरी है,सवाल यह नहीं कि एक्सटेंशन दिया जा सकता है या नहीं, सवाल यह है कि एक पांच महीने की परियोजना लगातार कितने समय तक एक्सटेंशन पर चल सकती है और प्रत्येक एक्सटेंशन के पीछे वास्तविक कारण क्या है?
18.18′ कम दर पर ठेका—अब हर लेयर की जांच जरूरी- इस सड़क का काम स्ह्रक्र से 18.18 प्रतिशत कम दर पर स्वीकृत हुआ था, कम दर पर काम मिलना अपने आप में कोई गड़बड़ी नहीं है,लेकिन जब निर्माण की गुणवत्ता पर सवाल उठें,सड़क की गति धीमी हो और निर्माणाधीन हिस्से में धंसाव जैसी स्थिति सामने आए,तो विभाग को गुणवत्ता परीक्षणों को सार्वजनिक करने की जरूरत बढ़ जाती है, सड़क की बेस,सब-बेस,कम्पेक्शन और बिटुमिनस कार्य की तकनीकी जांच होनी चाहिए, वर्क ऑर्डर में प्राइम कोट,टैक कोट और बिटुमिनस मैकडम जैसे कार्य भी शामिल हैं,ऐसे में यह भी देखा जाना चाहिए कि जहां-जहां कार्य पूरा बताया जा रहा है,वहां वास्तविक मोटाई और गुणवत्ता स्वीकृत एस्टीमेट के अनुरूप है या नहीं।
60 महीने की गारंटी है,लेकिन क्या जनता को 60 महीने इंतजार करना होगा?– कार्यादेश में कार्य पूर्ण होने के बाद 60 माह की परफॉर्मेंस गारंटी का प्रावधान है,लेकिन गारंटी का मतलब यह नहीं कि निर्माण के समय गुणवत्ता से समझौता किया जा सकता है और खराब होने के बाद ठेकेदार उसे सुधार देगा,जनता को मजबूत सड़क चाहिए, ऐसी सड़क नहीं जिसे हर बारिश के बाद मरम्मत की जरूरत पड़े,यदि सड़क निर्माण के दौरान ही कहीं धंसाव हो गया है तो विभाग को इसे ‘वारंटी में ठीक हो जाएगा’ कहकर टालने के बजाय यह पता लगाना होगा कि धंसाव हुआ क्यों।
क्या विभागीय इंजीनियरों ने मौके की जांच की?- अब सबसे बड़ा सवाल विभागीय इंजीनियरिंग व्यवस्था पर है,जिस सड़क पर करोड़ों रुपये खर्च हो रहे हैं,उसकी निगरानी के लिए विभागीय अधिकारी और इंजीनियर मौजूद हैं,यदि पाइप के आसपास बैकफिलिंग या कम्पेक्शन में कमी हुई है,तो उसे सड़क की अगली लेयर डालने से पहले ही पकड़ लिया जाना चाहिए था,यदि कमी नहीं थी और बाद में असामान्य धंसाव हुआ,तब भी तकनीकी टीम को यह पता लगाना चाहिए कि ऐसा क्यों हुआ, मौके का निरीक्षण,लेवल की जांच,धंसे हिस्से की खुदाई,पाइप की स्थिति,बेडिंग, बैकफिल सामग्री और कम्पेक्शन की जांच—इन सभी की आवश्यकता हो सकती है।
कमीशन के आरोपों पर भी हो निष्पक्ष जांच- क्षेत्र में अब यह चर्चा भी तेज है कि क्या ठेकेदार और विभाग के बीच किसी प्रकार की मिलीभगत के कारण कार्रवाई नहीं हो रही है, कुछ लोग इसे ‘कमीशन का गलियारा’ तक कह रहे हैं, हालांकि किसी अधिकारी या ठेकेदार पर कमीशन लेने का आरोप बिना प्रमाण के तथ्य के रूप में नहीं लगाया जा सकता,लेकिन यदि काम समय पर पूरा नहीं हुआ,गुणवत्ता पर लगातार शिकायतें हुईं,निर्माण में तकनीकी खामियां सामने आईं,फिर भी लगातार समय-वृद्धि मिलती रही, नोटिस और कार्रवाई का असर दिखाई नहीं दिया, तो इन सभी परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच जरूर होनी चाहिए।
विकास कॉरिडोर या कमीशन का गलियारा?– जिस परियोजना को ग्रामीणों के लिए विकास का रास्ता बनना था,उसकी मौजूदा तस्वीर देखकर सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह सड़क विकास का कॉरिडोर बन रही है या ठेकेदार और विभागीय व्यवस्था की लापरवाही का रास्ता? तस्वीरें किसी कमीशन का प्रमाण नहीं हैं, लेकिन वे यह जरूर दिखाती हैं कि सड़क के कुछ हिस्सों में गंभीर भौतिक समस्या मौजूद है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, इसलिए ‘कमीशन का गलियारा’ अभी जांच का सवाल है,निष्कर्ष नहीं।
अब विभाग को फाइल खोलकर जवाब देना होगा- गंगोटी-शिवपुर नवापारा सड़क के मामले में अब जनता को केवल आश्वासन नहीं चाहिए,विभाग को सामने आकर बताना चाहिए, कार्यादेश 30 जून 2025, निर्धारित अवधि 5 माह,सड़क की लंबाई, 5.10 किमी,अनुमानित लागतः 718.42 लाख, ठेकेदार मे. जवाहरलाल गुप्ता, स्वीकृत दर, स्ह्रक्र से 18.18′ कम,परफॉर्मेंस गारंटी, 60 माह और अब इसके साथ सबसे महत्वपूर्ण जानकारी भी सामने आनी चाहिए पहली निर्धारित पूर्णता तिथि क्या थी? कितनी बार एक्सटेंशन मिला? अगली पूर्णता तिथि क्या है? कितने नोटिस जारी हुए? विलंब पर कितना दंड लगाया गया? कितने प्रतिशत काम का भुगतान हो चुका है? अब तक कितने गुणवत्ता परीक्षण हुए? और सबसे अहम—बारिश के बाद धंसी सड़क और पाइप के आसपास की मिट्टी की तकनीकी जांच कब होगी? क्योंकि अब मामला सिर्फ ‘सड़क कब पूरी होगी’ का नहीं रह गया है. अब सवाल है की जो सड़क बनी ही नहीं, वह बैठ कैसे गई? और अगर निर्माण के दौरान ही सड़क के नीचे धंसाव शुरू हो गया है, तो विभाग को यह साबित करना होगा कि 7.18 करोड़ रुपये की यह परियोजना वास्तव में मजबूत सड़क के लिए है या सिर्फ कागजों पर पूरा होने वाली एक और सरकारी कहानी बनकर रह जाएगी।
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