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अंबिकापुर/सरगुजा@जिस बैंक का कर्ज नहीं चुकाया,उसी बैंक की अध्यक्षी! रामकिशुन की कुर्सी पर ‘कालातीत’ सवाल

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  • कर्ज कालातीत,लेकिन अध्यक्षी ‘टाइम पर’! रामकिशुन की कुर्सी पर बैंक के दस्तावेजों का सवाल…
  • कर्ज कालातीत,कुर्सी आबाद! सहकारी बैंक अध्यक्ष रामकिशुन की नियुक्ति पर गंभीर सवाल…
  • 2009 में 10 लाख की नकद साख सीमा,वर्षों तक बैंक के पत्रों में कालातीत खाता
  • 2026 की रिपोर्ट में करीब 42.10 लाख का नेट क्लोजर अमाउंट…अब नियुक्ति की पात्रता जांच की मांग…
  • बैंक रिकॉर्ड में कालातीत कर्ज,फिर अध्यक्ष की कुर्सी पर रामकिशुन कैसे?
  • जिस खाते पर नाबार्ड की आपत्ति,उसी बैंक की कमान रामकिशुन के हाथ!
  • 2009 का कर्ज पीछा नहीं छोड़ रहा,फिर भी अध्यक्षी नहीं छूटी! रामकिशुन पर सवाल
  • 24 लाख से 42 लाख तक पहुंचा कर्ज,अध्यक्ष पद पर बैठ गए रामकिशुन!
  • डिफॉल्टर खाते का साया,सहकारी बैंक कीअध्यक्षी पर सवाल! रामकिशुन कब हटेंगे?
  • 2009 में 10 लाख की नकद साख सीमा,बैंक के पत्रों में 2021 से 2024 तक खाते को कालातीत बताया गया
  • 2026 की सिस्टम रिपोर्ट में करीब 42.10 लाख का नेट क्लोजर अमाउंट—अब नियुक्ति की पात्रता पर उठी उंगली


-अनिल सिन्हा-
अंबिकापुर/सरगुजा,06 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
सहकारिता व्यवस्था में आम सदस्य से एक-एक रुपये की वसूली के लिए नियमों की किताब खोल दी जाती है,नोटिस निकलता है,दबाव बनता है, कार्रवाई होती है और जरूरत पड़े तो पद भी चला जाता है,मगर जब बात उसी व्यवस्था की सबसे बड़ी कुर्सी पर बैठे व्यक्ति की हो,तो क्या नियमों की किताब कुछ देर के लिए बंद हो जाती है? जिला सहकारी केंद्रीय बैंक मर्यादित अंबिकापुर,सरगुजा के अध्यक्ष रामकिशुन सिंह की नियुक्ति को लेकर सामने आई शिकायत ने यही असहज सवाल खड़ा कर दिया है। मामला किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि बैंक के उपलब्ध दस्तावेजों और एक लिखित शिकायत से जुड़ा है,शिकायतकर्ता ने आयुक्त एवं पंजीयक,सहकारी संस्थाएं,छत्तीसगढ़ के समक्ष दावा किया है कि रामकिशुन सिंह से संबंधित ऋण खाता कालातीत रहा है और ऐसी स्थिति में उनकी अध्यक्ष पद की पात्रता की जांच की जानी चाहिए,दस्तावेजों में 2 अप्रैल 2009 को प्रो. मैसर्स बाबा टांगीनाथ स्टोन क्रेशर,गंगापुर मेनरोड, अंबिकापुर के नाम पर 10 लाख रुपये की नकद साख सीमा स्वीकृत होने का उल्लेख है,इसके बाद वर्षों तक बैंक की ओर से जारी पत्रों में खाते की कालातीत राशि बढ़ती दिखाई देती है,अब सवाल सीधा है जब बैंक के रिकॉर्ड में ऋण खाता वर्षों तक कालातीत बताया जाता रहा,तो उसी बैंक की अध्यक्षी के लिए रामकिशन सिंह की पात्रता किस आधार पर तय हुई?
10 लाख से शुरू हुआ खाता,लाखों की देनदारी तक पहुंचा-कहानी की शुरुआत 2 अप्रैल 2009 से होती है,बैंक के दस्तावेज के मुताबिक बाबा टांगीनाथ स्टोन क्रेशर के नाम पर 10 लाख रुपये की नकद साख सीमा स्वीकृत की गई थी, वर्षों बाद यह खाता सामान्य स्थिति में नहीं रहा,बैंक के पत्र बताते हैं कि खाते की रकम कालातीत हो चुकी थी और नाबार्ड निरीक्षण में इस पर आपत्ति भी दर्ज की गई,28 जुलाई 2021 के पत्र में बैंक ने करीब 24,75,511 रुपये की कालातीत राशि बताई,पत्र में यह भी लिखा गया कि ऋण कालातीत होने के कारण नाबार्ड निरीक्षण के दौरान आपत्ति ली गई तथा प्रबंध संचालक ने मामले को गंभीरता से लिया है,संबंधित राशि जमा करने के लिए निर्देश दिया गया,यानी 10 लाख की स्वीकृत सीमा से शुरू हुआ मामला 2021 तक करीब 25 लाख की कालातीत राशि के आसपास पहुंच चुका था,यहां सवाल यह नहीं कि ब्याज कैसे बढ़ा,बैंकिंग व्यवस्था में ब्याज और दंड जुड़ने की प्रक्रिया हो सकती है,सवाल यह है कि खाते की यह स्थिति अध्यक्ष पद की पात्रता जांच के समय किस टेबल पर रखी गई थी?
2024 में कालातीत राशि 34.73 लाख के पार-12 नवंबर 2024 के दस्तावेज में कालातीत राशि करीब 34,73,902 रुपये दर्ज है,अब आंकड़ों का क्रम और स्पष्ट हो जाता है,2009 में स्वीकृत सीमा—10 लाख,2021 में कालातीत राशि—24.75 लाख से अधिक,2022 में—28.63 लाख से अधिक, 2023 में—29.91 लाख से अधिक, 2024 में—34.73 लाख से अधिक,और फिर 2026 में बैंक के सिस्टम की एक रिपोर्ट सामने आती है।
2026 की रिपोर्ट ने बढ़ाया मामला-फाइल के पांचवें और छठे पेज पर बैंक की सीसी/ओडी अकाउंट क्लोजर इंक्वायरी रिपोर्ट है,इसमें कस्टमर का नाम बाबा टंगीनाथ स्टोन क्रशर दिखता है,रिपोर्ट में करीब 6.12 लाख रुपये करंट बैलेंस,करीब 30.32 लाख एक्यूड इंटरेस्ट,करीब 5.75 लाख एक्यूड पेनल्टी इंटरेस्ट और लगभग 42.10 लाख रुपये नेट क्लोजर अमाउंट दर्ज है,यानी बैंक के सिस्टम रिकॉर्ड में मामला केवल मूल 10 लाख की स्वीकृत सीमा तक सीमित नहीं दिखता,यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि नेट क्लोजर अमाउंट में ब्याज,जुर्माना अथवा अन्य बैंकिंग मदें शामिल हो सकती हैं और अंतिम बकाया की पुष्टि बैंक के पूरे खाते और वर्तमान स्थिति से ही होगी,फिर भी यह डॉक्यूमेंट एक बड़ा सवाल तो खड़ा करता ही है क्या प्रेसिडेंट की नियुक्ति के समय इस खाते की स्थिति का विधिवत परीक्षण किया गया था?
शिकायतकर्ता ने उठाया पात्रता का मुद्दा– शिकायत के अंतिम पृष्ठ में आयुक्त एवं पंजीयक, सहकारी संस्थाओं को संबोधित करते हुए रामकिशुन सिंह की अध्यक्ष पद पर नियुक्ति के संबंध में शिकायत की गई है,शिकायतकर्ता का दावा है कि संबंधित ऋण कालातीत हो चुका था और सहकारी अधिनियम के तहत कालातीत ऋणी सदस्य अध्यक्ष,संचालक अथवा मनोनीत सदस्य बनने के योग्य नहीं है,इसी आधार पर रामकिशुन सिंह की पात्रता की जांच तथा वैधानिक कार्रवाई की मांग की गई है,यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि शिकायतकर्ता का आरोप अपने आप में अंतिम निष्कर्ष नहीं है,यह तय करना सक्षम सहकारी प्राधिकारी का काम है कि नियुक्ति के समय कौन-सा नियम लागू था,खाते की वास्तविक स्थिति क्या थी और क्या उस स्थिति में अध्यक्ष बनने पर कोई वैधानिक रोक थी,लेकिन सवाल इतना गंभीर जरूर है कि इसे सिर्फ शिकायत कहकर फाइल में दबा देना उचित नहीं होगा।
सहकारी बैंक में नियमों की दो किताबें तो नहीं?-यही इस पूरे मामले का सबसे तीखा व्यंग्य है,सहकारी व्यवस्था में किसानों और समितियों को समय पर ऋण चुकाने के लिए लगातार समझाइश दी जाती है,कालातीत खातों पर नजर रखी जाती है,वसूली अभियान चलते हैं, समितियों की वित्तीय स्थिति की समीक्षा होती है, पदाधिकारियों की पात्रता भी नियमों से तय होती है, तो फिर सवाल उठता है नियम आम सदस्य के लिए लोहे की दीवार हैं और अध्यक्ष के लिए रबर की सीमा? यदि रामकिशन सिंह पात्र थे,तो विभाग को नियम और उनकी पात्रता स्पष्ट करनी चाहिए,यदि पात्रता में समस्या थी,तो नियुक्ति प्रक्रिया पर जवाबदेही तय होनी चाहिए,बीच का रास्ता जनता को भ्रमित करता है।
‘वसूली’ की सख्ती और अध्यक्ष के खाते की नरमी?
स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि बैंक और समितियों से जुड़े मामलों में वसूली को लेकर काफी सख्ती दिखाई गई और कई समितियों के पदाधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई, यदि संबंधित मामलों में कार्रवाई नियमों के अनुरूप हुई है तो यह बैंक प्रशासन का अधिकार है, लेकिन उसी कसौटी को अध्यक्ष के मामले में भी लागू किया जाना चाहिए, सहकारिता का नियम यही होना चाहिए कि पद छोटा हो या बड़ा…खाता देखकर नियम न बदले,अगर किसी समिति अध्यक्ष के खाते में गड़बड़ी पर कार्रवाई होती है तो बैंक अध्यक्ष की पात्रता भी उसी पैमाने पर परखी जानी चाहिए,यही निष्पक्षता है,यही संस्थागत विश्वसनीयता है।
क्या कुर्सी तक पहुंचने से पहले ऋण की फाइल पहुंची थी?
अब विभाग के सामने सबसे जरूरी सवाल नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़ा है,क्या अध्यक्ष पद के लिए नाम तय करते समय संबंधित व्यक्ति से ऋणमुक्ति अथवा नियमित खाते का प्रमाण लिया गया था? क्या बैंक ने अपनी प्रणाली में उनके खाते की जांच की? क्या कालातीत खातों की सूची देखी गई? क्या नाबार्ड निरीक्षण की आपत्तियों को देखा गया? क्या नियुक्ति से पहले पात्रता संबंधी कोई सत्यापन रिपोर्ट बनी? यदि बनी तो उसमें क्या लिखा था? और यदि नहीं बनी तो क्यों नहीं बनी? इन सवालों के जवाब मिल जाएं तो विवाद का बड़ा हिस्सा खुद समाप्त हो सकता है।
2009 की फाइल आज 2026 में अध्यक्ष की कुर्सी तक पहुंच गई
इस मामले की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जिस ऋण खाते की शुरुआत 17 साल पहले हुई थी,वही आज अध्यक्ष पद की पात्रता का मुद्दा बन गया है,एक ओर बैंक के रिकॉर्ड में कालातीत राशि के संबंध में लगातार पत्र हैं,दूसरी ओर उसी सहकारी बैंक की अध्यक्षी है,बीच में नाबार्ड निरीक्षण की आपत्ति है,ब्याज है,दंड है,और अब शिकायत है, इतनी लंबी कहानी के बाद अगर विभाग कहे कि हमें कुछ पता ही नहीं था,तो अगला सवाल होगा की फिर बैंक के रिकॉर्ड किसके लिए रखे गए थे?
2022 में फिर बैंक का पत्र,फिर वही कालातीत खाता…
अगर 2021 की चिट्ठी के बाद मामला सुलझ गया होता तो विवाद की गुंजाइश कम हो सकती थी,लेकिन बैंक के अगले दस्तावेज में 1 नवंबर 2022 को फिर पत्र जारी हुआ,इस बार कालातीत राशि करीब 28,63,912 रुपये बताई गई,बैंक ने दोबारा नाबार्ड निरीक्षण की आपत्ति और प्रबंध संचालक द्वारा मामले को गंभीरता से लिए जाने का उल्लेख किया,मतलब साफ है…बैंक की चिंता खत्म नहीं हुई थी,कर्ज की फाइल अभी भी जीवित थी,कालातीत शब्द अभी भी दस्तावेज में मौजूद था,और सवाल भी वहीं था,यदि सामान्य सदस्य का खाता कालातीत हो तो उसके खिलाफ नियम सक्रिय हो जाते हैं,तो अध्यक्ष पद के लिए पात्रता जांच में यही नियम कितने सक्रिय थे?
2023 में भी नहीं बदली तस्वीर…
22 मार्च 2023 के बैंक पत्र में इसी खाते की कालातीत राशि करीब 29,91,135 रुपये दर्ज है,बैंक ने फिर राशि जमा करने और खाते को लेकर आपत्ति का उल्लेख किया,तीन साल के दस्तावेज सामने रखिए 2021—24.75 लाख से अधिक,2022—28.63 लाख से अधिक,2023—29.91 लाख से अधिक अर्थात बैंक के रिकॉर्ड में संबंधित खाता लगातार चर्चा में था,यह कोई एक दिन की चूक नहीं थी,यह कोई एक नोटिस का मामला नहीं था,यह वर्षों तक चलती रही बैंकिंग स्थिति थी,अब यदि इसी अवधि में रामकिशुन सिंह को सहकारी बैंक के शीर्ष पद की जिम्मेदारी मिली,तो नियुक्ति प्रक्रिया में उनके ऋण खाते की जांच हुई या नहीं—यह जानना स्वाभाविक है।
अब जांच हो तो केवल रामकिशन की नहीं, नियुक्ति प्रक्रिया की भी हो…
यदि सरकार या सहकारी विभाग इस शिकायत पर गंभीरता से संज्ञान लेता है तो जांच का दायरा सिर्फ यह नहीं होना चाहिए कि रामकिशुन सिंह के खाते में कितनी रकम बकाया है, जांच यह भी होनी चाहिए कि अध्यक्ष पद की नियुक्ति से पहले पात्रता परीक्षण किसने किया? किस अधिकारी ने दस्तावेजों का सत्यापन किया? क्या बैंक से रिपोर्ट ली गई? क्या संबंधित ऋण खाते की स्थिति सामने रखी गई? क्या कालातीत ऋणी सदस्य की पात्रता से जुड़े नियमों का परीक्षण किया गया? यदि खाते की स्थिति ज्ञात थी तो नियुक्ति की अनुमति किस आधार पर दी गई? यही असली जांच होगी।
अब रामकिशुन की कुर्सी पर फैसला दस्तावेज करेंगे…
इस मामले में व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप से ज्यादा जरूरी है कि दस्तावेजों की जांच हो,रामकिशुन सिंह के पास भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का पूरा अधिकार है,यदि ऋण नियमित हो चुका था,भुगतान हो चुका था,खाता किसी वैधानिक प्रक्रिया के तहत निपट चुका था या अध्यक्ष पद के लिए कालातीत ऋण बाधक नहीं था,तो संबंधित रिकॉर्ड सामने रखे जा सकते हैं,लेकिन यदि बैंक के रिकॉर्ड में नियुक्ति के समय भी वही स्थिति थी जिसका आरोप लगाया गया है,तो विभाग को बताना होगा कि पात्रता कैसे तय हुई,साफ जवाब ही इस विवाद का रास्ता है।
सहकारी बैंक की साख का सवाल…
जिला सहकारी केंद्रीय बैंक केवल एक वित्तीय संस्था नहीं है, इससे किसानों, समितियों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का सीधा संबंध होता है,ऐसे संस्थान की अध्यक्षी पर जब ऋण खाते की स्थिति को लेकर सवाल उठता है तो उसका असर सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता,सवाल संस्था की विश्वसनीयता तक पहुंचता है,क्योंकि जिस व्यक्ति से बैंक के करोड़ों रुपये के वित्तीय अनुशासन की निगरानी की उम्मीद की जाती है,उसकी अपनी पात्रता पर ही सवाल उठ जाए तो जनता स्वाभाविक रूप से पूछेगी पहले अपनी किताब साफ थी या बैंक की?
अब पंजीयक के सामने गेंद
शिकायत की प्रतियां कई वरिष्ठ अधिकारियों और संबंधित संस्थाओं को भेजे जाने का उल्लेख दस्तावेज के अंतिम पृष्ठ पर है,अब देखना यह है कि यह शिकायत भी सरकारी फाइलों की उस लंबी कतार का हिस्सा बनती है जहां आवेदन जाते हैं,डायरी नंबर मिलते हैं,नोटशीट घूमती है और फिर मामला किसी अलमारी में शांत हो जाता है—या इस बार वास्तव में नियमों की किताब खोली जाती है,क्योंकि यहां फैसला किसी अखबार को नहीं करना है, फैसला सहकारी विभाग को करना है।
व्यंग्य का अंतिम वार
सहकारी बैंक की इस कहानी में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि रामकिशुन सिंह ने 2009 में 10 लाख रुपये का ऋण लिया था,बैंक के दस्तावेज इस खाते के अस्तित्व और बाद के वर्षों में कालातीत राशि दर्ज होने की तस्वीर सामने रखते हैं,सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब बैंक की फाइल में कर्ज कालातीत हो रहा था,तब अध्यक्ष पद की पात्रता किस तारीख को नियमित हो गई? अगर नियम कहते हैं कि ऐसे ऋणी व्यक्ति अध्यक्ष नहीं बन सकते,तो फिर कुर्सी तक रास्ता किसने साफ किया? अगर नियम ऐसा नहीं कहते,तो शिकायतकर्ता को नियम की प्रति दिखा दी जाए,अगर खाता बाद में नियमित हुआ,तो तारीख बता दी जाए,अगर भुगतान हुआ,तो उसका रिकॉर्ड सामने रख दिया जाए,और अगर सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ है,तो सबसे अच्छा यही होगा कि विभाग सार्वजनिक रूप से स्थिति स्पष्ट कर दे,क्योंकि सहकारी बैंक में वसूली का डंडा गरीब सदस्य की चौखट तक पहुंच सकता है,लेकिन वही डंडा अध्यक्ष की कुर्सी के दरवाजे पर जाकर रुक जाए…ऐसा संदेश संस्था की साख के लिए ठीक नहीं है,अब सवाल रामकिशन सिंह के पक्ष या विपक्ष का नहीं है,सवाल है एक ही नियम सबके लिए है या नहीं,और यही तय करेगा कि यह मामला सिर्फ एक शिकायत है…या फिर सहकारी बैंक की व्यवस्था में ‘कालातीत’ हो चुकी जवाबदेही की फाइल।


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