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सूरजपुर/भैयाथान@ एक दिन का कार्यवाहक सचिव,सात माह पुराना आदेश और फिर बहाली! सोनपुर समिति में नियमों पर सवाल

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  • जिसे समिति कर्मचारी नहीं मानती,उसकी वापसी की तैयारी! श्यामलाल सिंह की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
  • नियुक्ति नहीं,चयन प्रक्रिया नहीं…फिर विवेक चौरसिया की बहाली किस नियम से?
  • विवेक चौरसिया की वापसी पर घमासान,नियुक्ति के दस्तावेज गायब,पुराने आदेश का अचानक सहारा
  • सोनपुर समिति में ‘हटाओ और लौटाओ’ का खेल? शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह की भूमिका जांच के घेरे में…
  • कर्मचारी नहीं तो बहाली कैसी? विवेक चौरसिया को लेकर सोनपुर समिति में नियमों की परीक्षा
  • श्यामलाल सिंह को विवेक से इतनी हमदर्दी क्यों?नई नियुक्ति के बजाय पुराने आदेश से वापसी पर सवाल
  • न विज्ञापन,न चयन प्रक्रिया और न नियुक्ति का स्पष्ट दस्तावेज…एक दिन के कार्यवाहक सचिव के जरिए सात माह पुराने आदेश पर कार्रवाई…बेरोजगार युवाओं ने मांगी जांच…


-ओंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,06 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)।
आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर में विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने का मामला अब महज एक कर्मचारी की वापसी का विवाद नहीं रह गया है,उपलब्ध दस्तावेजों,समिति की ओर से दिए गए जवाब और शिकायतकर्ताओं द्वारा उठाए गए सवालों को एक साथ देखा जाए तो नियुक्ति प्रक्रिया, प्राधिकृत अधिकारी की भूमिका,संचालक मंडल की बैठक और पुराने आदेश के अचानक पालन—चारों स्तर पर सवाल खड़े होते हैं। मामला इसलिए भी दिलचस्प है कि एक ओर समिति के पत्रों में विवेक कुमार चौरसिया को पूर्व में वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक के रूप में कार्य में रखे जाने की बात सामने आती है,दूसरी ओर शिकायतकर्ताओं का आरोप है कि उनकी नियमित नियुक्ति से संबंधित विज्ञापन,आवेदन,चयन प्रक्रिया और नियुक्ति आदेश का कोई स्पष्ट दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया। इसके बावजूद बाद में उन्हें पुनः कार्य में रखने की कार्रवाई की गई,व्यंग्य में कहें तो सोनपुर समिति में शायद ‘नियुक्ति आदेश नहीं मिला तो पुराना आदेश ही सही’ वाली व्यवस्था चल पड़ी है,पहले कर्मचारी को वैकल्पिक व्यवस्था में रखिए,फिर उसे कार्य से पृथक कीजिए,फिर महीनों बाद पुराने पत्र को निकालिए और प्राधिकृत अधिकारी बदलते ही बैठक बुलाकर वापसी का रास्ता खोल दीजिए, हालांकि यह केवल घटनाक्रम पर आधारित व्यंग्यात्मक सवाल है,कार्रवाई की वैधानिकता का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच से ही होगा।
जिसकी नियुक्ति ही नहीं हुई,उसकी बहाली किस पद पर?-विवेक कुमार चौरसिया की पूर्व स्थिति को लेकर समिति के दस्तावेज सबसे महत्वपूर्ण हैं,समिति की ओर से दिए गए जवाब में कहा गया है कि तत्कालीन समय में संस्था के कुछ कर्मचारी अनुपस्थित थे और संस्था के कामकाज को सुचारू रखने के लिए विवेक कुमार चौरसिया को वैकल्पिक व्यवस्था के तहत अस्थायी लिपिक के रूप में काम में रखा गया था,दस्तावेज में यह भी कहा गया है कि उनकी नियमित नियुक्ति नहीं की गई और नियुक्ति आदेश भी जारी नहीं किया गया, यहीं से पूरा मामला उलझता है,अगर नियमित नियुक्ति हुई ही नहीं थी तो फिर बाद में उन्हें पुनः कार्य पर रखने का आधार क्या था? अगर नियुक्ति हुई थी तो उसका आदेश कहां है? अगर वह केवल वैकल्पिक व्यवस्था में थे तो उस व्यवस्था की अवधि कितनी थी? और यदि वह व्यवस्था समाप्त हो चुकी थी तो क्या पुराने वैकल्पिक कर्मचारी को बिना नई चयन प्रक्रिया के फिर से उसी संस्था में रखा जा सकता है? इन सवालों का जवाब नियुक्ति से जुड़े मूल अभिलेखों से ही मिल सकता है।
विज्ञापन नहीं तो आवेदन कहां से आया,आवेदन नहीं तो चयन किसका हुआ?-17 अगस्त 2026 को प्रस्तुत शिकायत में विवेक कुमार चौरसिया की नियुक्ति को लेकर कई गंभीर सवाल उठाए गए हैं,शिकायत में दावा किया गया है कि समिति अथवा उच्च कार्यालय द्वारा लिपिक सह कंप्यूटर ऑपरेटर पद पर नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी नहीं किया गया,समिति कार्यक्षेत्र के किसी अभ्यर्थी से आवेदन नहीं लिया गया और स्थानीय शिक्षित बेरोजगारों को प्राथमिकता नहीं दी गई,शिकायतकर्ता का आरोप है कि इसके बावजूद समिति कार्यक्षेत्र के बाहर के व्यक्ति विवेक कुमार चौरसिया को नियुक्त किया गया,यदि शिकायत में लगाए गए ये आरोप रिकॉर्ड से प्रमाणित होते हैं तो यह जांच का विषय होगा कि नियुक्ति की पूरी प्रक्रिया किस नियम के तहत हुई,और अगर आरोप गलत हैं तो समिति को केवल एक काम करना है—विज्ञापन दिखाइए,आवेदन दिखाइए,चयन प्रक्रिया दिखाइए और नियुक्ति आदेश दिखाइए, फाइल साफ होगी तो सवाल भी साफ हो जाएंगे।
सात महीने पुराना आदेश अचानक इतना ‘जिंदा’ कैसे हो गया?-मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू समय का है, उपलब्ध दस्तावेजों में नवंबर 2025 में उपायुक्त सहकारिता सूरजपुर की ओर से विवेक कुमार चौरसिया को उनके मूल पद पर रखे जाने से संबंधित कार्रवाई का उल्लेख मिलता है, इसके बाद जनवरी 2026 में भी इस प्रकरण में पत्राचार हुआ,29 जनवरी 2026 के समिति के जवाब में यह बताया गया कि विवेक कुमार चौरसिया की अनुपस्थिति और नियुक्ति से संबंधित मामले में संस्था की ओर से जवाब प्रस्तुत किया गया था,इसी क्रम में 2 जनवरी 2026 के उपायुक्त सहकारिता कार्यालय के पत्र में भी विवेक कुमार चौरसिया के प्रकरण को नस्तीबद्ध किए जाने का उल्लेख दिखाई देता है,अब शिकायतकर्ताओं का सवाल है कि यदि जनवरी 2026 में प्रकरण नस्तीबद्ध हो गया था,तो फिर बाद में उसी पुराने मामले को किस आधार पर पुनर्जीवित किया गया? और यदि नवंबर 2025 का आदेश प्रभावी था तो उसका पालन तत्काल क्यों नहीं कराया गया? यही वह सवाल है जिस पर पूरी फाइल की टाइमलाइन सामने आना जरूरी है।
प्राधिकृत अधिकारी बदले और पुराने आदेश की ‘याद’ भी लौट आई?– शिकायत में सबसे गंभीर सवाल यह उठाया गया है कि जिस समय विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रखने की कार्रवाई हुई,उस समय समिति की प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हो चुका था,शाखा प्रबंधक भैयाथान श्यामलाल सिंह को प्राधिकृत अधिकारी का प्रभार मिलने के बाद संचालक मंडल की बैठक आयोजित कर विवेक कुमार चौरसिया को कार्य में रखने की कार्रवाई किए जाने का आरोप है,यहीं से सवाल उठता है की अगर सात महीने पहले आदेश जारी हो चुका था तो सात महीने तक उसका पालन क्यों नहीं हुआ? अगर आदेश का पालन जरूरी था तो तत्काल क्यों नहीं कराया गया? और यदि उस आदेश में कोई कमी थी तो नया स्पष्ट आदेश क्यों नहीं निकाला गया? प्राधिकृत अधिकारी बदलने के बाद उसी पुराने आदेश के आधार पर कार्रवाई क्यों की गई? ये सवाल इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि प्रशासनिक आदेशों का पालन केवल सुविधा के अनुसार नहीं होना चाहिए।
‘कार्यवाहक’ की कुर्सी से स्थायी कर्मचारी की वापसी?-यही मामला व्यंग्य का सबसे बड़ा विषय बन जाता है,जिस व्यक्ति को समिति में कार्यवाहक सचिव की जिम्मेदारी दी गई,यदि उसके हस्ताक्षर से ऐसे व्यक्ति को वापस कार्य पर रखने की कार्रवाई हुई जिसकी नियमित नियुक्ति ही विवादित है,तो सवाल उठना स्वाभाविक है,क्या एक दिन की कुर्सी इतनी ताकतवर हो गई कि उससे महीनों पुराने नियुक्ति विवाद का समाधान हो गया? या फिर उस कार्रवाई के पीछे कोई स्पष्ट वैधानिक आधार मौजूद था? यदि आधार मौजूद है तो उसे सामने रखने में विभाग को कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।
‘नियुक्ति आदेश दिखाइए’…यही पूरे मामले की मास्टर चाबी-विवेक कुमार चौरसिया की नियुक्ति विवाद में शायद सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज सिर्फ एक है—मूल नियुक्ति आदेश,यदि यह आदेश मौजूद है तो विवाद का बड़ा हिस्सा समाप्त हो सकता है, उसमें देखा जा सकता है की पद कौन सा था? पद स्वीकृत था या नहीं? नियुक्ति किस तारीख को हुई? नियुक्ति किस अधिकारी ने की? क्या विज्ञापन जारी हुआ? क्या चयन समिति बनी? क्या आवेदन लिए गए? क्या नियुक्ति अस्थायी थी या नियमित? नियुक्ति की अवधि क्या थी? वेतन किस मद से दिया गया? क्या सक्षम संस्था ने अनुमोदन दिया? लेकिन शिकायत कर्ताओं का दावा है कि ऐसा मूल नियुक्ति आदेश सामने नहीं आया है,इसलिए अब पूरा मामला ‘कागज दिखाओ,विवाद मिटाओ’ के सिद्धांत पर आकर टिक गया है।
उच्च कार्यालय के पत्र और समिति के जवाब में अंतर क्यों?
-दस्तावेजों में एक तरफ उच्च कार्यालय द्वारा विवेक कुमार चौरसिया को उनके मूल पद पर रखने संबंधी निर्देश का उल्लेख है,दूसरी तरफ समिति की ओर से दिए गए जवाब में उनकी पूर्व स्थिति को वैकल्पिक व्यवस्था बताया गया है,यहीं एक और महत्वपूर्ण जांच की आवश्यकता है,क्या उच्च कार्यालय को यह बताया गया था कि उनकी नियमित नियुक्ति का आदेश उपलब्ध नहीं है? क्या उच्च कार्यालय के सामने समिति की ओर से पूर्व नियुक्ति की पूरी फाइल रखी गई? क्या नियुक्ति आदेश,पद स्वीकृति और चयन प्रक्रिया की जांच हुई? क्या 2 जनवरी 2026 को प्रकरण नस्तीबद्ध किए जाने के बाद कोई नया आदेश हुआ? अगर हुआ तो वह कहां है? यदि नहीं हुआ तो फिर बाद में बहाली की प्रक्रिया किस आधार पर आगे बढ़ी?
शिकायतकर्ता का आरोप…दस्तावेजों की जांच किए बिना हुई कार्रवाई-17 अगस्त 2026 की शिकायत में यह आरोप लगाया गया है कि विवेक कुमार चौरसिया की पूर्व नियुक्ति से संबंधित दस्तावेज,स्वीकृत पद, चयन प्रक्रिया,जारी नियुक्ति आदेश तथा सक्षम निकाय की स्वीकृति आदि का विधिवत परीक्षण किए बिना उन्हें पुनः कार्य पर रखा गया, शिकायतकर्ता ने पूरे मामले की तत्काल जांच, कथित नियम विरुद्ध आदेशों एवं प्रस्ताव-ठहराव पर रोक तथा दोषी पाए जाने वाले व्यक्तियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है, अब यह संबंधित विभाग की जिम्मेदारी है कि वह जांच में यह स्पष्ट करे कि शिकायत में लगाए गए आरोपों में कितनी सच्चाई है।
पुरानी फाइल,नया प्राधिकृत अधिकारी और फिर नई कार्यवाही…संयोग या प्रक्रिया?-इस पूरे घटनाक्रम की सबसे महत्वपूर्ण चीज टाइमलाइन है, पहले विवेक कुमार चौरसिया को वैकल्पिक व्यवस्था में रखा गया,फिर उनकी सेवा/कार्य व्यवस्था समाप्त हुई, इसके बाद शिकायत हुई,उच्च कार्यालयों से पत्राचार हुआ, जनवरी 2026 में प्रकरण नस्तीबद्ध किए जाने का पत्र सामने आया,फिर प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव हुआ, शाखा प्रबंधक श्यामलाल सिंह को प्राधिकृत अधिकारी का प्रभार मिला, इसके बाद संचालक मंडल की बैठक हुई,और फिर पुराने आदेश का हवाला देते हुए विवेक कुमार चौरसिया को कार्य पर रखने की कार्रवाई हुई,अब सवाल यह है कि इन सभी घटनाओं के बीच फाइल में कौन-सा नया दस्तावेज जुड़ा,जिसने पूर्व स्थिति बदल दी? अगर कोई नया दस्तावेज नहीं जुड़ा तो फिर पुराने विवाद का समाधान कैसे हुआ?
सवाल केवल विवेक की वापसी का नहीं,व्यवस्था की विश्वसनीयता का है- यह मामला किसी व्यक्ति विशेष के खिलाफ फैसला सुनाने का नहीं है, किसी व्यक्ति की नियुक्ति वैध है या अवैध…यह सक्षम प्राधिकारी और जांच के बाद ही तय होगा,लेकिन सहकारी संस्था में नियुक्ति की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए,यदि पद है तो पद स्वीकृति होनी चाहिए, यदि नियुक्ति है तो नियुक्ति आदेश होना चाहिए,यदि चयन हुआ है तो चयन प्रक्रिया होनी चाहिए,यदि बहाली हुई है तो बहाली का सक्षम आदेश होना चाहिए,और यदि पुराने आदेश का पालन किया गया है तो यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उसका पालन सात महीने बाद क्यों हुआ।
विवेक से इतनी ‘हमदर्दी’ क्यों?- शिकायतकर्ताओं ने एक और राजनीतिक-प्रशासनिक सवाल खड़ा किया है की यदि विवेक कुमार चौरसिया को संस्था में रखना ही है तो उन्हें नियमसम्मत तरीके से नई नियुक्ति क्यों नहीं दी जाती? यदि पद स्वीकृत है, रिक्त है और विवेक उस पद की योग्यता पूरी करते हैं तो विज्ञापन जारी हो,क्षेत्र के पात्र बेरोजगारों से आवेदन लिया जाए,चयन प्रक्रिया हो,सक्षम निकाय से अनुमोदन लिया जाए,फिर जो योग्य हो उसे नियुक्त किया जाए,ऐसी प्रक्रिया में विवाद की गुंजाइश ही कम हो जाती है, लेकिन जब नियमित नियुक्ति के मूल दस्तावेज सामने नहीं आते और पुरानी वैकल्पिक व्यवस्था को आधार बनाकर वापसी कराई जाती है,तब बेरोजगार युवाओं का सवाल उठना स्वाभाविक है।
वेतन भुगतान का अगला सवाल…बहाली हुई तो भुगतान किस आधार पर?-मामला यहीं खत्म नहीं होता, यदि विवेक कुमार चौरसिया को पुनः कार्य पर रख दिया गया है तो अगला सवाल वेतन भुगतान का होगा,वेतन किस आदेश के आधार पर दिया जाएगा? किस पद के विरुद्ध दिया जाएगा? किस अवधि का भुगतान होगा? क्या पिछली अवधि का वेतन भी मांगा जाएगा? यदि पिछली अवधि का वेतन दिया जाता है तो उस अवधि में वे कर्मचारी के रूप में किस आदेश के तहत माने जाएंगे? और यदि संस्था का कहना है कि उनकी नियमित नियुक्ति कभी हुई ही नहीं तो फिर बकाया वेतन की गणना किस सेवा अवधि के आधार पर होगी? यानी नियुक्ति का एक सवाल आगे चलकर आर्थिक सवाल भी बन सकता है।
‘कुर्सी’ का फैसला या नियम का फैसला?-सोनपुर समिति में अब असली सवाल यह नहीं है कि विवेक कुमार चौरसिया वापस आएंगे या नहीं,असली सवाल यह है कि वह किस वैधानिक प्रक्रिया से वापस आए? यदि उनकी नियुक्ति वैध थी तो दस्तावेज सामने रखे जाएं,यदि वह वैकल्पिक कर्मचारी थे तो उस व्यवस्था के नियम बताए जाएं,यदि उन्हें हटाया गया था तो पुनः रखने का आदेश बताया जाए, यदि सात महीने पुराने आदेश का पालन किया गया तो विलंब का कारण बताया जाए, यदि प्राधिकृत अधिकारी बदलने के बाद कार्रवाई हुई तो उसकी प्रशासनिक वजह बताई जाए, और यदि कार्यवाहक सचिव के माध्यम से कार्रवाई हुई तो उसे दिए गए अधिकारों का रिकॉर्ड सामने रखा जाए।
अब विभाग से सीधे सवाल…
क्या विवेक कुमार चौरसिया की नियमित नियुक्ति का मूल आदेश उपलब्ध है?
यदि उपलब्ध है तो वह किस अधिकारी ने जारी किया था?
क्या नियुक्ति के लिए विज्ञापन जारी हुआ था?
क्या समिति कार्यक्षेत्र के अभ्यर्थियों से आवेदन लिए गए थे?
क्या चयन प्रक्रिया हुई थी?
क्या पद स्वीकृत था?
क्या जनवरी 2026 में नस्तीबद्ध किए गए प्रकरण को बाद में पुनः खोला गया?
यदि खोला गया तो किस आदेश से?
सात महीने पुराने आदेश का पालन तत्काल क्यों नहीं हुआ?
प्राधिकृत अधिकारी बदलने के बाद उसी पुराने आदेश पर कार्रवाई क्यों हुई?
क्या पुनः कार्य पर रखने से पहले मूल नियुक्ति दस्तावेजों का परीक्षण किया गया?
क्या कार्यवाहक सचिव को ऐसी कार्रवाई करने का अधिकार था?
यदि विवेक की नियुक्ति वैध थी तो नियुक्ति आदेश सार्वजनिक क्यों नहीं किया जा रहा?
और यदि नियुक्ति वैध नहीं थी तो फिर उन्हें कार्य पर रखने की पूरी प्रक्रिया किस नियम के तहत हुई?
सोनपुर में अब ‘कुर्सी’ नहीं, दस्तावेज बोलेंगे…

सोनपुर समिति का यह मामला अब केवल आरोप-प्रत्यारोप से हल होने वाला नहीं है,यहां नियुक्ति आदेश,प्रस्ताव पुस्तिका,बैठक की कार्यवाही,पद स्वीकृति,चयन प्रक्रिया,उच्च कार्यालयों के पत्र,2 जनवरी 2026 का नस्तीबद्ध प्रकरण,7 अगस्त 2026 की बैठक और उसके बाद जारी कार्यादेश—इन सभी दस्तावेजों को एक साथ रखकर जांच की जरूरत है, क्योंकि यदि पूरी प्रक्रिया नियमसम्मत है तो दस्तावेज उसे साबित कर देंगे,और यदि प्रक्रिया में कहीं नियमों की अनदेखी हुई है तो वही दस्तावेज उसे भी सामने ला देंगे,सोनपुर समिति में अब सवाल यह नहीं कि किसकी ‘पहुंच’ कितनी है,सवाल यह है कि फाइल में किसके पक्ष में कितना नियम है,और व्यंग्य की भाषा में कहें तो कुर्सी चाहे एक दिन की हो या सात महीने पुरानी फाइल की—उस पर बैठकर लिया गया फैसला नियमों से बड़ा नहीं हो सकता।


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