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रायपुर@खाद्य एवं औषधि प्रशासन में ‘नियमों का स्वाद’ कुछ ज्यादा ही मीठा!

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  • जिस विभाग को मिलावट पकड़नी है, उसी में ‘नियमों की मिलावट’ पर सवाल!
  • लैब टेक्नीशियन से Food Safety Officer बनने का मामला, B.Sc.-M.Sc. Chemistry की पात्रता पर विवाद
  • एफएसओ पदोन्नति 10 से 25 प्रतिशत हुई,लैब टेक्नीशियन से अधिकारी बनने की कहानी और योग्यता की व्याख्या ने खोल दी विभागीय व्यवस्था की परतें
  • 10 से 25 प्रतिशत का ‘पदोन्नति तड़का’ः खाद्य विभाग में नियमों की रेसिपी पर उठे सवाल…
  • खाद्य विभाग में ‘एफएसओ फॉर्मूला’, पदोन्नति बढ़ी,योग्यता उलझी और पुराने मामलों की फाइलें फिर खुलीं…
  • एफएसओ की कुर्सी तक पहुंचने के रास्ते में कितने नियम? पदोन्नति,योग्यता और पुराने मामलों ने बढ़ाई हलचल…
  • खाद्य विभाग में नियमों की ‘मिलावट’ का सवाल, 25 प्रतिशत पदोन्नति के बाद पुराने प्रकरण भी चर्चा में…
  • लैब से एफएसओ तक और B.Sc. से Chemistry की विशेषज्ञता तक, खाद्य विभाग में पात्रता की नई बहस
  • एक विभाग, अलग-अलग नियमों की कहानीः एफएसओ में 25′, ड्रग इंस्पेक्टर में 10’—आखिर फर्क क्यों?
  • पदोन्नति की मिठास,पात्रता की कड़वाहटः खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने की प्रक्रिया पर सवाल


-न्यूज डेस्क-

रायपुर,06 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ का खाद्य एवं औषधि प्रशासन इन दिनों खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता से ज्यादा अपनी विभागीय पदोन्नति और नियमों की गुणवत्ता को लेकर चर्चा में है,विभाग का काम जनता को मिलावट से बचाना है,लेकिन मुख्यालय में चल रही चर्चाओं को देखकर लगता है कि यहां असली सवाल यह नहीं है कि खाने में मिलावट है या नहीं,बल्कि यह है कि नियमों में कितनी ‘व्याख्या’ मिलाई जा सकती है! ताजा विवाद खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति को लेकर है,विभाग में जहां एक ओर मानव संसाधन की कमी की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर रिक्त पदों पर सीधी भर्ती के बजाय पदोन्नति के रास्ते को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं,ऊपर से पदोन्नति का प्रतिशत 10 से बढ़कर 25 प्रतिशत हो गया—वह भी खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए,अब सवाल पूछने वाले पूछ रहे हैं कि आखिर यह कौन-सा जादुई फार्मूला है,जिसमें नौकरी की जरूरत भी है, रिक्तियां भी हैं और समाधान के नाम पर पदोन्नति भी है? और मजेदार बात यह कि ड्रग इंस्पेक्टर के मामले में वही पुराना 10 प्रतिशत बना हुआ है,यानी खाद्य विभाग में पदोन्नति का स्वाद अचानक इतना पसंद आया कि प्रतिशत 25 हो गया,लेकिन औषधि विभाग ने शायद अभी डाइटिंग जारी रखी है!
नियमों की रसोई में ‘योग्यता’ का सबसे बड़ा सवाल-खाद्य सुरक्षा अधिकारी कोई सामान्य कार्यालयीन पद नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा कानून के क्रियान्वयन से जुड़ा तकनीकी पद है,इसलिए सवाल केवल इतना नहीं कि कर्मचारी सरकारी सेवा में कितने साल रहा, सवाल यह है कि क्या वह उस तकनीकी पद की वैधानिक योग्यता पूरी करता है? यहीं से नमूना सहायक से खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने की चर्चा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है, यदि किसी कर्मचारी की मूल नियुक्ति नमूना सहायक के पद पर हुई और उस पद की शैक्षणिक योग्यता अलग थी,तो खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर पदोन्नति देते समय क्या उसकी योग्यता का अलग से परीक्षण हुआ? अगर हुआ तो फाइल में दर्ज होगा, अगर नहीं हुआ तो सवाल और बड़ा हो जाता है,क्योंकि केवल सरकारी सेवा में होना और तकनीकी वैधानिक पद के लिए पात्र होना—दो अलग-अलग बातें हैं।

‘डिग्री है तो सब चलेगा’ वाला फार्मूला?-शैक्षणिक योग्यता को लेकर भी विभाग में बहस कम नहीं है,किसी पद के लिए यदि विशिष्ट विषय में विशिष्ट डिग्री मांगी गई है, तो फिर सामान्य डिग्री में उस विषय का अध्ययन कर लेने से क्या वही योग्यता पूरी हो जाती है? मसलन,यदि नियम में M.Sc. Chemistry जैसी विशिष्ट योग्यता निर्धारित है और कोई कर्मचारी B.Sc. में Chemistry पढ़े होने को आधार बनाता है,तो सवाल स्वाभाविक है कि दोनों को बराबर कैसे माना गया? वरना कल कोई यह भी कह सकता है…साहब,मैंने 12वीं में Chemistry पढ़ी है,मुझे भी Food Safety Officer बना दीजिए।आखिर Chemistry तो पढ़ी है! व्यंग्य अपनी जगह है, लेकिन सरकारी नियुक्ति में योग्यता का निर्धारण मजाक का विषय नहीं हो सकता, यदि न्यायालय ने किसी मामले में कर्मचारी की पात्रता पर विचार करने का निर्देश दिया है, तो यह भी देखना होगा कि विभाग ने Consider को Qualify’ कैसे पढ़ लिया? यही दस्तावेजों से स्पष्ट होना चाहिए।
संघर्ष कुमार मिश्रा प्रकरणः लैब से खाद्य सुरक्षा तक का सफर-विभाग में सबसे ज्यादा चर्चा जिन पुराने मामलों को लेकर है,उनमें संघर्ष कुमार मिश्रा का नाम भी सामने आता है,दावे के अनुसार उनकी नियुक्ति अनुकंपा आधार पर लैब असिस्टेंट के पद पर हुई थी,बाद में वे लैब टेक्नीशियन बने और फिर खाद्य सुरक्षा अधिकारी के रूप में अधिसूचित किए जाने की प्रक्रिया सामने आई,यहां सवाल उठता है कि लैब टेक्नीशियन से खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनने का वैधानिक रास्ता क्या था? यदि किसी प्रशिक्षण प्रमाण-पत्र को आधार बनाया गया तो उसकी मान्यता क्या थी? प्रशिक्षण देने वाली संस्था अधिकृत थी या नहीं? उस समय लागू कानून और अधिसूचना में उस कर्मचारी को खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनाए जाने का स्पष्ट आधार क्या था? इन प्रश्नों के उत्तर किसी प्रेस नोट से नहीं, बल्कि मूल फाइल और अधिसूचना से निकलेंगे, यदि पूरी प्रक्रिया नियमसम्मत थी तो दस्तावेजों के सामने आने के बाद विवाद खत्म हो जाना चाहिए। और यदि कहीं कोई कमी थी तो वही दस्तावेज जिम्मेदारी भी तय कर सकते हैं।
12 साल पुरानी फाइल और समीक्षा की रहस्यमयी चुप्पी-अब मामला और रोचक हो जाता हैम, बताया जा रहा है कि पुराने प्रकरण में न्यायालयीन आदेश के बाद शासन ने लंबे समय तक समीक्षा या आगे की चुनौती का रास्ता नहीं अपनाया,वहीं दूसरे मामलों में शासन न्यायालयीन राहत को स्वीकार करने के बजाय डबल बेंच तक पहुंच गया,यहीं विभागीय गलियारों में सबसे बड़ा सवाल घूम रहा है…क्या शासन के कानूनी चश्मे के नंबर मामले के हिसाब से बदलते हैं? एक मामले में आदेश पसंद नहीं आया तो डबल बेंच,दूसरे मामले में आदेश आया तो फाइल शांत, तीसरे मामले में योग्यता पर सवाल उठा तो ‘विचार’ को ही पर्याप्त मान लिया गया,यदि सभी मामले तथ्यात्मक रूप से अलग हैं तो शासन को अंतर स्पष्ट करना चाहिए। और यदि समान प्रकृति के हैं तो अलग-अलग कानूनी रुख का कारण भी सामने आना चाहिए,कानून में सबसे महत्वपूर्ण शब्दों में से एक है—समानता।
सर्वेश यादव-सिद्धार्थ पांडे बनाम राखी ठाकुरःयहां समीक्षा,वहां क्यों नहीं?- विभागीय मामलों में सर्वेश यादव और सिद्धार्थ पांडे से जुड़े प्रकरण में राखी ठाकुर को न्यायालय से राहत मिलने के बाद शासन द्वारा डबल बेंच में जाने की बात भी चर्चा में है,अब तुलना यही है कि जब शासन एक पदोन्नति मामले में न्यायालय के आदेश के खिलाफ आगे की कानूनी लड़ाई लड़ सकता है,तो पुराने मामलों में ऐसा क्यों नहीं किया गया? फिर वही सवाल कानूनी नीति एक है या केस देखकर बदलती है? यह आरोप लगाने का विषय नहीं, बल्कि रिकॉर्ड से जवाब देने का विषय है, शासन चाहे तो संबंधित मामलों की पूरी कानूनी स्थिति सार्वजनिक कर सकता है। इससे कई सवाल अपने आप खत्म हो जाएंगे।
16 जनवरी 2023 से 26 नवंबर 2025 तक नियमों का सफर-शैक्षणिक योग्यता को लेकर केंद्र सरकार की ओर से 16 जनवरी 2023 को नियमों में बदलाव/ अधिसूचना की चर्चा है,राज्य में संबंधित संशोधन 26 नवंबर 2025 को सामने आया, यहां भी सवाल उठता है कि केंद्रीय स्तर पर बदलाव के बाद राज्य स्तर पर संशोधन में इतना समय क्यों लगा? यदि यह सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया थी तो 2023 से 2025 तक का अंतर समझाया जाना चाहिए,और दूसरी तरफ यदि पदोन्नति प्रतिशत में बदलाव अपेक्षाकृत कम समय में कर दिया गया,तो विभाग से पूछा जा सकता है योग्यता वाले नियम की फाइल पैदल चली और पदोन्नति प्रतिशत वाली फाइल एक्सप्रेस ट्रेन से क्यों पहुंची? बेशक प्रशासनिक प्रक्रियाओं में अलग-अलग स्तर और औपचारिकताएं होती हैं,इसलिए केवल समय-अंतर से अनियमितता साबित नहीं होती। लेकिन यही अंतर सवाल जरूर पैदा करता है।
ड्रग इंस्पेक्टर बोला…मैं 10 प्रतिशत पर ही खुश हूं!- सबसे दिलचस्प तुलना ड्रग इंस्पेक्टर और खाद्य सुरक्षा अधिकारी की है, बताई जा रही व्यवस्था के अनुसार ड्रग इंस्पेक्टर के लिए पदोन्नति का प्रतिशत 10 प्रतिशत ही है,जबकि खाद्य सुरक्षा अधिकारी के लिए इसे 25 प्रतिशत किया गया,अब विभागीय गलियारों की व्यंग्यात्मक चर्चा कुछ यूं है…‘खाद्य विभाग को अतिरिक्त 15 प्रतिशत की भूख लग गई,औषधि विभाग अभी संतोषी बना हुआ है!’ लेकिन असली प्रश्न यह है कि क्या इस बदलाव के पीछे स्पष्ट प्रशासनिक कारण दर्ज है? यदि है तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए,यदि नहीं है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि पदोन्नति का प्रतिशत तय करने का आधार क्या था।
खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनेंगे तो क्या जिले भी ‘शुद्ध’ हो जाएंगे?-पदोन्नति के समर्थक कह सकते हैं कि अनुभवी कर्मचारियों को पदोन्नति मिलने से विभाग की कार्यक्षमता बढ़ेगी, बिल्कुल बढ़नी चाहिए,लेकिन इसके साथ एक और उम्मीद भी है…अब जिलों में होटल, रेस्टोरेंट,खाद्य प्रतिष्ठान और बाजारों की जांच निष्पक्ष हो,नमूने सही तरीके से लिए जाएं, रिपोर्ट समय पर आए,मिलावट पर कार्रवाई हो, किसी व्यापारी को अनावश्यक परेशान न किया जाए,और सबसे महत्वपूर्ण…खाद्य सुरक्षा अधिकारी का पद किसी कर्मचारी की पदोन्नति का पुरस्कार नहीं,बल्कि जनता की खाद्य सुरक्षा की जिम्मेदारी है,अगर पदोन्नति के बाद भी वही पुरानी शिकायतें जारी रहीं तो फिर सवाल उठेगा कि बदला क्या—पद या व्यवस्था?
अब विभाग को ‘जवाब’ नहीं,पूरी फाइल खोलनी चाहिए-इस पूरे विवाद का सबसे सरल समाधान है की दस्तावेज सार्वजनिक कर दिए जाएं,कौन पात्र था? किस नियम के तहत पात्र था? कौन-सी डिग्री थी? कौन-सा अनुभव था? कौन-सा प्रशिक्षण था? डीपीसी में किसने क्या निर्णय लिया? 25 प्रतिशत पदोन्नति का आधार क्या था? क्या केंद्रीय नियमों का परीक्षण किया गया? पुराने न्यायालयीन मामलों में शासन का रुख क्या था? यदि इन सभी प्रश्नों के उत्तर रिकॉर्ड के साथ सामने आ जाएं तो ‘सेटिंग’,‘पक्षपात’ और‘नियमों की मनमानी’ जैसे शब्द अपने आप कमजोर पड़ जाएंगे।
अंत में सबसे बड़ा सवाल…
खाद्य एवं औषधि प्रशासन का मूल काम जनता को सुरक्षित भोजन और दवा उपलब्ध कराना है, इसलिए विभाग के भीतर होने वाली हर नियुक्ति और पदोन्नति की प्रक्रिया भी उतनी ही पारदर्शी,तकनीकी और नियमसम्मत होनी चाहिए,क्योंकि अगर खाद्य सुरक्षा अधिकारी की कुर्सी तक पहुंचने के लिए नियमों की सीढ़ी के बजाय व्याख्या की लिफ्ट इस्तेमाल होने लगे, तो सवाल उठना तय है,और आज विभाग से जनता यही पूछ रही है…खाद्य सुरक्षा अधिकारी बनाने का नियम क्या है? पदोन्नति का अधिकार किस संवर्ग को है? 25 प्रतिशत क्यों किया गया? और जिन 13 लोगों को पदोन्नति मिली, उनकी नियम 2.1.3 वाली पूरी पात्रता किसने और कैसे जांची?’ इन सवालों के जवाब यदि नियमों और दस्तावेजों के साथ मिल जाएं तो विवाद खत्म,वरना खाद्य विभाग में मिलावट की जांच करने वाले विभाग को पहले अपनी ही व्यवस्था में पारदर्शिता की जांच करनी पड़ेगी,दैनिक घटती-घटना की मुहिम का सवाल जनता के,जवाब विभाग के।
10 प्रतिशत से 25 प्रतिशत
आखिर खाद्य विभाग में ही क्यों?

विभाग के पुराने भर्ती नियमों में खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पदों को लेकर 90 प्रतिशत सीधी भर्ती और 10 प्रतिशत पदोन्नति का प्रावधान बताया जाता है,वहीं अब संशोधन के बाद पदोन्नति का हिस्सा 25 प्रतिशत किए जाने को लेकर चर्चा है, यहीं से सवाल उठता है की जब विभाग में रिक्तियां थीं तो नई नियुक्ति क्यों नहीं? यदि अनुभव की जरूरत थी तो भर्ती नियमों में उसका समाधान क्यों नहीं किया गया? और यदि पदोन्नति जरूरी थी तो केवल खाद्य सुरक्षा अधिकारी के पद पर प्रतिशत 25 करने की जरूरत अचानक क्यों महसूस हुई? नियम बनाना सरकार का अधिकार है,नियम में संशोधन भी विधिवत प्रक्रिया से हो सकता है,लेकिन जब संशोधन के तुरंत बाद उसी संवर्ग के कर्मचारियों की पदोन्नति का रास्ता खुलता दिखाई दे,तो पत्रकार का काम ताली बजाना नहीं,बल्कि सवाल पूछना होता है, क्योंकि सरकारी नियम कोई ऐसा दरवाजा नहीं होना चाहिए जिसे जरूरत के हिसाब से कभी 10 प्रतिशत और कभी 25 प्रतिशत खोल दिया जाए।


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