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अंबिकापुर/रायपुर@ पदोन्नति से पोस्टिंग और विवाद से कोर्ट तक मिश्रा जी का विभागीय नेटवर्क कितना गहरा?

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  • विभाग में मिश्रा जी की ‘पहुंच’ की चर्चा…कर्मचारी बोले…विवाद भी इनके…समाधान भी इनका…
  • ‘फूट डालो,फिर जोड़ो’ की रणनीति? खाद्य विभाग में तिवारी जी की भूमिका पर गंभीर सवाल…
  • कर्मचारियों की बातचीत से कोर्ट की पैरवी तक…मिश्रा जी के कथित नेटवर्क की पड़ताल…
  • मिश्रा जी का ‘खेल’ः ट्रांसफर-पोस्टिंग, विभागीय विवाद और कोर्ट…कहां-कहां है कनेक्शन?
  • किसका ट्रांसफर,किसका विवाद और कौन जाएगा कोर्ट—हर सवाल पर मिश्रा जी की ‘सलाह’!
  • खाद्य विभाग में ‘तिवारी तंत्र’ की चर्चा,अधिकारी-कर्मचारी से कोर्ट तक पहुंची कहानी…
  • विभाग के हितैषी या ‘दीमक’? मिश्रा जी की भूमिका पर उठ रहे सवालों का चक्रव्यूह
  • खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में एक नाम को लेकर तरह-तरह के आरोप, कर्मचारी कहते हैं…पहले संपर्क,फिर विवाद, फिर सलाह और आखिर में कानूनी रास्ता… आखिर इस नेटवर्क की हकीकत क्या है?


-न्यूज डेस्क-
अंबिकापुर/रायपुर,22 अगस्त 2026 (घटती-घटना)।
 कहते हैं सरकारी दफ्तर में काम करने के कई रास्ते होते हैं,कोई फाइल के रास्ते चलता है, कोई नियम-कायदे के रास्ते और कोई ऐसा भी होता है जो फाइल,नियम,अधिकारी, मंत्री और कर्मचारी—सभी के बीच अपना रास्ता बना लेता है,औषधि एवं खाद्य प्रशासन विभाग में इन दिनों ऐसी ही चर्चाओं के केंद्र में हैं ‘मिश्रा जी’, विभाग में तिवारी जी को लेकर तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं,कुछ लोग उन्हें विभाग का बड़ा ‘हितैषी’ बताते हैं तो कुछ कर्मचारी आरोप लगाते हैं कि विभाग के भीतर होने वाले विवादों में उनकी भूमिका जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहती है, दावा तो यहां तक किया जा रहा है कि पदोन्नति की चर्चा हो तो ‘मिश्रा जी’,विवाद हो तो तिवारी जी और विवाद के बाद कोर्ट जाने की सलाह चाहिए तो भी ‘मिश्रा जी’! अब यह संयोग है या विभागीय‘मैनेजमेंट स्किल’, इसका फैसला तो जांच के बाद ही हो सकता है,सरकारी दफ्तरों में व्यवस्था नियमों से चलती है—कम से कम किताबों में तो यही लिखा है, लेकिन जब किसी विभाग में एक व्यक्ति का नाम पदोन्नति से लेकर ट्रांसफर-पोस्टिंग, विवाद से लेकर न्यायालय और अधिकारियों से लेकर कर्मचारियों तक हर जगह सुनाई देने लगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर यह महज संयोग है या किसी विशेष ‘नेटवर्क मैनेजमेंट’ का परिणाम?
औषधि एवं खाद्य प्रशासन विभाग में इन दिनों‘मिश्रा जी’को लेकर ऐसी ही चर्चाएं विभागीय गलियारों में सुनाई दे रही हैं,कई कर्मचारियों और विभाग से जुड़े लोगों के दावों के मुताबिक ‘मिश्रा जी’ विभाग के भीतर होने वाले विवादों में जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहते हैं,आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि पदोन्नति की बात हो तो ‘मिश्रा जी’,विवाद हो तो ‘मिश्रा जी’,ट्रांसफर-पोस्टिंग की परेशानी हो तो तिवारी जी और विवाद के बाद कोर्ट जाना हो तो अधिवक्ता तक पहुंचाने की सलाह भी तिवारी जी! हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है और संबंधित अधिकारी का पक्ष भी सामने आना चाहिए,लेकिन यदि विभाग के भीतर से सामने आ रही चर्चाओं में तथ्यात्मक आधार है,तो मामला एक व्यक्ति की सक्रियता से आगे बढ़कर विभागीय पारदर्शिता और प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
जिसने तबादला नहीं मांगा,उसके पास पहुंच कौन रहा है?-इस पूरे मामले का सबसे दिलचस्प पहलू यही है,यदि कोई कर्मचारी अपने तबादले को लेकर परेशान नहीं है,उसने किसी से मदद नहीं मांगी है और फिर भी कोई व्यक्ति उसके पास जाकर कहता है कि‘बात करूं क्या?’,तो सवाल उठता है कि तबादला सूची की जानकारी और कर्मचारी की व्यक्तिगत स्थिति उस व्यक्ति तक पहुंच कैसे रही है? यदि यह महज मदद है तो पारदर्शी तरीके से होनी चाहिए,लेकिन यदि इसमें किसी प्रकार का आर्थिक लेन-देन, प्रभाव का दावा या दबाव शामिल है तो मामला गंभीर हो जाता है।
कोर्ट के मामलों में भी भूमिका होने के आरोप-विभाग से जुड़े न्यायालयीन मामलों को लेकर भी तिवारी जी का नाम चर्चाओं में बताया जाता है,कुछ कर्मचारियों का दावा है कि विभागीय विवाद बढ़ने के बाद उन्हें न्यायालय जाने की सलाह दी जाती है,इसके बाद अधिवक्ता तक पहुंचाने या कानूनी रास्ता सुझाने की बात सामने आती है,व्यंग्य का सवाल फिर वही…विभागीय विवाद का समाधान विभाग में होगा या सीधे कोर्ट की सीढि़यों पर? यदि कोई व्यक्ति पहले विवाद के दोनों पक्षों से संपर्क रखता है, फिर किसी एक पक्ष को कानूनी रास्ता सुझाता है और बाद में दोनों पक्षों के बीच संपर्क बनाए रखता है, तो उसकी भूमिका की निष्पक्षता पर सवाल उठना स्वाभाविक है,यह आरोप भी लगाए जा रहे हैं कि विभाग के कुछ विवादों में दोनों पक्षों से अच्छे संबंध बनाए रखने की कोशिश होती है, एक पक्ष को लगता है कि मदद उसकी हो रही है, दूसरे पक्ष को भी यही भरोसा रहता है। नतीजा यह कि विवाद खत्म होने के बजाय लंबा खिंचता है।
‘दोनों तरफ अच्छे’ बनने की रणनीति?-विभागीय चर्चाओं में तिवारी जी की एक कथित खासियत यह भी बताई जाती है कि वे किसी एक पक्ष के साथ पूरी तरह खड़े नजर नहीं आते, दोनों पक्षों से संवाद बनाए रखना उनकी रणनीति का हिस्सा बताया जाता है, व्यंग्य में इसे कुछ यूं कहा जा सकता है…लड़ाई आपकी,सलाह उनकी,वकील उनकी पसंद का और फैसला अदालत का! हालांकि यह केवल आरोप और चर्चाएं हैं, इनकी पुष्टि के लिए संबंधित न्यायालयीन मामलों, कर्मचारियों के बयान और दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी।
‘हर महीने दो हजार’ की चर्चा…सच क्या है?-सबसे गंभीर आरोप खाद्य प्रतिष्ठानों से कथित मासिक रकम वसूली को लेकर हैं, कुछ सूत्रों के हवाले से यह दावा किया जा रहा है कि होटल, फल दुकानों और अन्य खाद्य प्रतिष्ठानों से कथित तौर पर हर महीने दो हजार रुपये की रकम लिए जाने की चर्चा है,इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है,इसलिए इसे तथ्य नहीं बल्कि जांच योग्य आरोप के रूप में ही देखा जाना चाहिए,लेकिन यदि ऐसी कोई व्यवस्था वास्तव में मौजूद है तो सवाल बेहद गंभीर है…क्या खाद्य सुरक्षा अभियान वास्तव में खाद्य गुणवत्ता जांचने के लिए चल रहा है या फिर केवल कागजी आंकड़े पूरे करने के लिए? क्या सभी दुकानों से समान रूप से नमूने लिए जाते हैं? क्या नमूना चयन का रिकॉर्ड उपलब्ध है? कितने नमूने लिए गए, कितने फेल हुए और कितनों पर कार्रवाई हुई? इन सवालों के जवाब निरीक्षण रजिस्टर, नमूना संग्रह रिकॉर्ड और लैब रिपोर्ट से आसानी से सामने आ सकते हैं।
अभियान के आंकड़े बनाम जमीन की हकीकत-सरकारी विभागों में अक्सर सफलता का आंकड़ा बताया जाता है…इतने अभियान, इतने निरीक्षण, इतने नमूने और इतनी कार्रवाई,लेकिन असली सवाल यह है कि किन प्रतिष्ठानों की जांच हुई? यदि कोई प्रतिष्ठान लगातार निरीक्षण से बाहर है तो क्यों? यदि किसी जगह से बार-बार नमूने लिए जाते हैं तो उसका कारण क्या है? और यदि किसी प्रतिष्ठान के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो उसके पीछे गुणवत्ता का प्रमाण है या केवल रिकॉर्ड का अभाव? इन सवालों का जवाब स्वतंत्र ऑडिट से मिल सकता है।
कॉल रिकॉर्डिंग और ‘कर्मचारी का सर्टिफिकेट’-‘मिश्रा जी’ को लेकर एक और गंभीर चर्चा विभागीय कर्मचारियों की बातचीत रिकॉर्ड करने के आरोपों से जुड़ी है,कुछ कर्मचारियों का दावा है कि वे वरिष्ठ, समकक्ष और कनिष्ठ अधिकारियों-कर्मचारियों से बातचीत करते हैं और कथित तौर पर उन बातचीतों को रिकॉर्ड कर लेते हैं,इसके बाद वही बातें दूसरे व्यक्ति को सुनाकर आपसी मतभेद पैदा करने की कोशिश किए जाने का आरोप भी लगाया जा रहा है,यदि यह आरोप सही है तो सवाल केवल व्यक्तिगत गोपनीयता का नहीं, बल्कि पूरे कार्यालयीन वातावरण का है, सरकारी कार्यालय में कर्मचारी का मूल्यांकन उसके काम से होना चाहिए या इस आधार पर कि उसने किस अधिकारी से क्या कहा? अगर कर्मचारियों की बातचीत ही बाद में उनके खिलाफ इस्तेमाल होने लगे तो कार्यालय में विश्वास की जगह भय पैदा होना स्वाभाविक है।
‘मिश्रा जी’ विभाग के हितैषी या ‘विभागीय दीमक’?-अब सबसे बड़ा सवाल यही है,यदि ‘मिश्रा जी’ वास्तव में कर्मचारियों की मदद करते हैं,विवादों का समाधान कराते हैं और अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच समन्वय स्थापित करते हैं तो उनकी भूमिका सकारात्मक मानी जानी चाहिए,लेकिन यदि आरोप सही हैं कि विवादों में अनावश्यक हस्तक्षेप,ट्रांसफर-पोस्टिंग में प्रभाव का दावा,न्यायालयीन विवादों को बढ़ावा देने वाली सलाह, व्यक्तिगत नेटवर्क का इस्तेमाल,कर्मचारियों की बातचीत को आपसी मतभेद के लिए इस्तेमाल करना और जांच व्यवस्था में प्रभाव स्थापित करने की कोशिश उनकी कार्यशैली का हिस्सा है, तो यह गंभीर प्रशासनिक प्रश्न है,क्योंकि सवाल केवल ‘‘मिश्रा जी’ कौन हैं?’का नहीं है,सवाल यह है कि एक व्यक्ति को विभाग में इतना प्रभावशाली बनने का अवसर कौन और कैसे देता है?
अब जांच हो तो फाइलों से निकलेगा सच…
इन आरोपों की सच्चाई जानने का रास्ता बेहद सीधा है,पिछले वर्षों के ट्रांसफर-पोस्टिंग मामलों की जांच हो,विवादित मामलों में सलाह और न्यायालयीन प्रक्रिया से जुड़े तथ्यों की समीक्षा हो, लैब में पदस्थापना और जिम्मेदारियों की पारदर्शी जांच हो,खाद्य प्रतिष्ठानों के निरीक्षण और नमूना संग्रह का रिकॉर्ड देखा जाए,लैब रिपोर्ट और कार्रवाई के आंकड़ों का मिलान किया जाए,और यदि मासिक रकम वसूली के आरोप हैं तो उनकी स्वतंत्र जांच हो,क्योंकि व्यंग्य में कहानी लिखी जा सकती है,लेकिन रिकॉर्ड खुलते ही कहानी या तो आरोप साबित करने की दिशा में जाएगी या आरोपों को खारिज कर देगी,फिलहाल तिवारी जी को लेकर विभाग में चल रही चर्चाएं कई सवाल छोड़ रही हैं, जवाब उनके पास भी है और विभाग के पास भी, आखिर तिवारी जी विभाग के ‘हितैषी’ हैं, विवादों के ‘मध्यस्थ’ हैं या फिर व्यवस्था में पैदा हुआ ऐसा ‘चक्रव्यूह’,जिसमें कर्मचारी एक बार प्रवेश करने के बाद रास्ता तलाशते रह जाते हैं? इसका फैसला आरोप नहीं, निष्पक्ष जांच और दस्तावेज ही कर सकते हैं।
विवाद का समाधान भी,विवाद की शुरुआत भी?
विभागीय सूत्रों के अनुसार तिवारी जी की खासियत विभाग के वरिष्ठ से लेकर कनिष्ठ तक लगातार संपर्क बनाए रखना बताई जाती है, कुछ कर्मचारियों का आरोप है कि वे कर्मचारियों के बीच होने वाले मतभेदों में भी हस्तक्षेप करते हैं, व्यंग्य में कहें तो विभाग में नया ‘मैनेजमेंट मॉडल’ सामने आया है-पहले मतभेद समझिए, फिर दोनों पक्षों से बात कीजिए और उसके बाद दोनों को मिलाने की रणनीति भी खुद बनाइए, सवाल यह है कि यदि दो कर्मचारियों के बीच विवाद है तो उसका समाधान विभागीय स्तर पर नियमों के अनुसार होना चाहिए या किसी तीसरे व्यक्ति के व्यक्तिगत नेटवर्क से?
ट्रांसफर सूची निकलते ही सक्रिय होने की चर्चा…
सबसे ज्यादा चर्चा ट्रांसफर-पोस्टिंग को लेकर है,आरोप है कि किसी कर्मचारी का दूरस्थ स्थान पर तबादला होने के बाद उससे संपर्क कर पहले उसकी परेशानी पूछी जाती है, कथित तौर पर बातचीत कुछ इस अंदाज में शुरू होती है… ‘अरे यार,आपके साथ तो बहुत दिक्कत हो गई, बहुत दूर भेज दिया गया, बात करूं क्या?’ कर्मचारी यदि कह दे कि ‘हां,बात कीजिए’,तो अगला अध्याय शुरू होने की चर्चा है… ‘बात हो गई है, हो जाएगा।’ और यदि कर्मचारी कह दे कि वह अतिरिक्त खर्च नहीं कर सकता या तबादला नहीं रुकवाना चाहता,तो कथित तौर पर उसे यह कहकर दबाव महसूस कराया जाता है कि अब मामला गंभीर है और वरिष्ठ अधिकारी या मंत्री नाराज हो सकते हैं,यदि वास्तव में ऐसा हो रहा है तो यह जांच का विषय है कि ट्रांसफर-पोस्टिंग के मामलों में अनधिकृत रूप से कौन हस्तक्षेप कर रहा है और किस आधार पर कर्मचारियों को ऐसी पेशकश की जा रही है।


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