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बैकुंठपुर@ कोरिया कलेक्टरेट का ‘फेविकोल मॉडल’! क्या स्टेनो टूकलेक्टर का पद अब आजीवन प्रतिनियुक्ति का पर्याय बन गया है?

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  • कई खुलासे…फिर भी शासन मौन! खबरें गलत थीं तो खंडन क्यों नहीं? सही थीं तो कार्रवाई क्यों नहीं?
  • स्टेनो प्रकरण में लगातार उठते सवालों के बीच प्रशासन की चुप्पी बनी सबसे बड़ा रहस्य
  • 24 साल की प्रतिनियुक्ति पर 12 खुलासे…फिर भी नहीं टूटी प्रशासन की चुप्पी
  • सवालों से नहीं,चुप्पी से घिरा स्टेनो प्रकरण! आखिर शासन क्या छिपाना चाहता है?
  • दस्तावेज बोलते रहे…शासन चुप रहा! क्या मौन से बढ़ रहा संरक्षण का संदेह?
  • कोरिया का स्टेनो प्रकरण,जवाब नहीं, सिर्फ सन्नाटा! आखिर किसके लिए है यह खामोशी?
  • चुप्पी क्या साबित करती है? खबरें गलत हैं या जवाब देने की हिम्मत नहीं?
  • खबरों के बाद भी न खंडन,न जांच, न जवाब…आखिर किस बात का इंतजार?
  • स्टेनो प्रकरण में शासन की चुप्पी सबसे बड़ा सवाल, क्या जवाबदेही से बचना ही नया प्रशासनिक मॉडल है?
  • प्रतिनियुक्ति 3 से 5 साल की या 24 साल की? मत्स्य विभाग का कर्मचारी, राजस्व विभाग की कुर्सी और शासन-प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी ने खड़े किए बड़े सवाल

-रवि सिंह-
बैकुंठपुर,26 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
सरकारी नियमों की किताबें अक्सर धूल खाती रहती हैं,लेकिन जब कोई फाइल वर्षों तक बिना हिले-डुले एक ही टेबल पर टिकी रह जाए,तो लोग मजाक में कहते है…यह फाइल नहीं,सरकारी विरासत है।’कोरिया कलेक्टरेट में स्टेनो टू कलेक्टर का मामला भी कुछ ऐसा ही बनता जा रहा है,फर्क सिर्फ इतना है कि यहां फाइल ही नहीं, प्रतिनियुक्ति भी मानो स्थायी विरासत बन गई हो।
दैनिक घटती-घटना पिछले कई सप्ताह से इस पूरे प्रकरण पर लगातार दस्तावेजों के आधार पर समाचार प्रकाशित कर रहा है, प्रतिनियुक्ति के आदेश,सेवा पुस्तिका, मत्स्य महासंघ के पत्र,राजस्व विभाग में कार्य, वेतन निर्धारण,सेवा निरंतरता और संविलियन के प्रयास जैसे कई पहलू सामने आ चुके हैं,लेकिन जितने दस्तावेज सामने आए,उससे कहीं अधिक गहरी होती चली गई शासन-प्रशासन की चुप्पी,अब सवाल केवल एक कर्मचारी का नहीं, बल्कि पूरे प्रशासनिक तंत्र की कार्यप्रणाली का बन गया है।
12 खबरें,दर्जनों दस्तावेज…फिर भी चुप्पी! आखिर शासन क्या संदेश देना चाहता है?
लोकतांत्रिक व्यवस्था में यदि किसी समाचार पत्र द्वारा किसी मामले पर एक-दो नहीं बल्कि लगातार 12 बार दस्तावेजों के साथ समाचार प्रकाशित किए जाएं, गंभीर प्रशासनिक सवाल उठाए जाएं और उसके बावजूद शासन-प्रशासन की ओर से न कोई आधिकारिक खंडन आए, न कोई तथ्यात्मक स्पष्टीकरण और न ही किसी जांच की सार्वजनिक जानकारी मिले, तो स्वाभाविक रूप से सवाल उठना लाजिमी है,यदि प्रकाशित खबरें गलत थीं, तो सबसे पहले संबंधित विभाग का दायित्व था कि वह रिकॉर्ड के साथ उनका खंडन करता,तथ्यों को सार्वजनिक करता और भ्रम दूर करता,लेकिन यदि ऐसा नहीं हुआ,तो दूसरी ओर यह भी जरूरी नहीं कि केवल चुप्पी को खबरों की पुष्टि मान लिया जाए,फिर भी लगातार बनी रहने वाली यह चुप्पी स्वयं एक सार्वजनिक प्रश्न बन जाती है,अब लोग पूछने लगे हैं कि आखिर शासन इस चुप्पी से क्या संदेश देना चाहता है? क्या यह संदेश पारदर्शिता का है, या फिर यह संकेत देता है कि ऐसे मामलों को नजरअंदाज कर दिया जाएगा? क्या शासन यह बताना चाहता है कि दस्तावेजों के साथ उठाए गए सवाल भी प्रशासनिक प्राथमिकताओं में शामिल नहीं हैं? या फिर यह चुप्पी अनजाने में ऐसी धारणा को जन्म दे रही है कि प्रभावशाली लोगों के मामलों में जवाबदेही की अपेक्षा कम हो जाती है? शासन की सबसे बड़ी ताकत उसकी पारदर्शिता,जवाबदेही और समय पर प्रतिक्रिया होती है,जब गंभीर सवालों पर कोई स्पष्ट उत्तर नहीं आता,तब खाली स्थान को अफवाहें,चर्चाएं और अटकलें भरने लगती हैं, यही कारण है कि अब प्रशासनिक गलियारों में यह चर्चा भी सुनाई देने लगी है कि ‘क्या यह चुप्पी किसी संरक्षण का संकेत मानी जाए, या केवल प्रशासनिक उदासीनता?’ इन चर्चाओं का उत्तर केवल एक निष्पक्ष और तथ्यात्मक प्रशासनिक प्रतिक्रिया ही दे सकती है,क्योंकि लोकतंत्र में सवालों को अनदेखा करने से वे समाप्त नहीं होते, बल्कि समय के साथ और बड़े होते जाते हैं,यदि शासन के पास इस पूरे मामले का स्पष्ट और नियमसम्मत उत्तर है,तो उसे सार्वजनिक करना सबसे प्रभावी तरीका होगा,इससे न केवल भ्रम दूर होगा,बल्कि शासन की विश्वसनीयता और जवाबदेही भी मजबूत होगी।
कलेक्टर बदलते रहे…लेकिन कुर्सी ने शायद कैलेंडर देखना छोड़ दिया- कोरिया जिले में वर्षों के दौरान अनेक कलेक्टर आए और गए। शासन बदला,सरकारें बदलीं,प्रशासनिक प्राथमिकताएं बदलीं,लेकिन इस व्यवस्था को देखकर कर्मचारी अब व्यंग्य में कहते हैं—‘कलेक्टर का तबादला सरकारी प्रक्रिया है,लेकिन स्टेनो की कुर्सी शायद प्राकृतिक धरोहर घोषित हो चुकी है,’ यह टिप्पणी तथ्य नहीं,बल्कि प्रशासनिक गलियारों में चल रही चर्चा का व्यंग्य है, लेकिन ऐसी चर्चाएं तब जन्म लेती हैं, जब लंबे समय तक किसी व्यवस्था पर सवाल उठें और उनका स्पष्ट उत्तर सामने न आए।
कार्य विभाजन में सबका नाम…लेकिन इस व्यवस्था पर सन्नाटा- हाल ही में कलेक्टर कार्यालय में कार्य विभाजन के आदेश जारी हुए, विभिन्न शाखाओं और अधिकारियों की जिम्मेदारियां निर्धारित की गईं,लेकिन इस पूरे विवाद के केंद्र में रहे प्रतिनियुक्ति संबंधी प्रश्नों पर कोई सार्वजनिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया,अब कर्मचारी पूछ रहे हैं क्या यह विषय इतना संवेदनशील है कि उस पर बोलना भी वर्जित हो गया?
वेतन का सवाल—निर्धारण किसने किया?-पूरे प्रकरण का एक और महत्वपूर्ण पहलू वेतन है, यदि उपलब्ध जानकारी सही है और संबंधित कर्मचारी को लगभग 1.46 लाख प्रतिमाह वेतन-भत्ते मिल रहे हैं, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि वेतन निर्धारण किस नियम से हुआ? मूल विभाग ने किया या राजस्व विभाग ने? वार्षिक वेतनवृद्धि किस सेवा नियम के अंतर्गत स्वीकृत हुई? पदोन्नति किस विभाग ने दी? यदि सब कुछ नियमों के अनुरूप हुआ है, तो रिकॉर्ड सार्वजनिक करने में संकोच कैसा?
सेवा पुस्तिका ने फिर खोल दी पुरानी फाइल– जब मत्स्य महासंघ ने सेवा पुस्तिका और निरंतरता प्रमाण-पत्र की मांग की, तब वर्षों पुरानी फाइलें फिर चर्चा में आ गईं, यहीं से एक और प्रश्न पैदा हुआ यदि कर्मचारी वर्षों से राजस्व विभाग में कार्यरत था, तो सेवा पुस्तिका मूल विभाग के पास क्यों नहीं थी? और यदि थी, तो उसका नियमित सत्यापन किसने किया?
प्रतिनियुक्ति या स्थायी नियुक्ति? नियमों की किताब पूछ रही है…
मुझे पढ़ा भी गया था या नहीं?…सरकारी सेवा नियमों के अनुसार प्रतिनियुक्ति एक अस्थायी प्रशासनिक व्यवस्था होती है,किसी विभाग में तत्काल आवश्यकता होने पर दूसरे विभाग के कर्मचारी की सेवाएं सीमित अवधि के लिए ली जाती हैं,सामान्यतः यह अवधि तीन वर्ष और विशेष परिस्थितियों में अधिकतम पांच वर्ष तक मानी जाती है, लेकिन कोरिया में चर्चा किसी तीन या पांच वर्ष की नहीं,बल्कि लगभग 24 वर्षों की है, यहीं से व्यंग्य जन्म लेता है,लोग पूछ रहे हैं—क्या कोरिया जिले में प्रतिनियुक्ति का नया संस्करण लागू हो चुका है,जिसमें ‘अस्थायी’ का अर्थ ‘आजीवन’ हो गया है?
मत्स्य विभाग का कर्मचारी…लेकिन राजस्व विभाग की पहचान
उपलब्ध दस्तावेजों के अनुसार संबंधित कर्मचारी मूल रूप से मत्स्य महासंघ से संबद्ध रहे,राज्य पुनर्गठन के बाद उन्हें मत्स्य महासंघ में कार्यभार ग्रहण करने संबंधी आदेश भी जारी हुए,बाद के वर्षों में वे कलेक्टर कार्यालय में कार्यरत रहे और स्टेनो टू कलेक्टर के रूप में पहचान बनती गई,यहीं सबसे बड़ा प्रशासनिक प्रश्न उठता है यदि मूल विभाग मत्स्य था, तो राजस्व विभाग में इतनी लंबी अवधि तक कार्य किस नियम के अंतर्गत जारी रहा? यदि संविलियन हुआ था तो उसका स्पष्ट आदेश कहां है? यदि संविलियन नहीं हुआ,तो प्रतिनियुक्ति समाप्त क्यों नहीं हुई?
संविलियन का सपना…लेकिन मंजिल नहीं मिली?
उपलब्ध दस्तावेजों से यह संकेत भी मिलता है कि राजस्व विभाग में संविलियन का प्रयास हुआ था,यदि ऐसा है,तो क्या वह सफल हुआ? यदि नहीं हुआ, तो फिर प्रतिनियुक्ति समाप्त क्यों नहीं हुई? यदि हुआ, तो उसका विधिवत आदेश कहां है? यही वे प्रश्न हैं जिनका उत्तर अब केवल सक्षम प्रशासन ही दे सकता है।
’फेविकोल मॉडल’ की चर्चा क्यों?
जिले में अब लोग मुस्कुराते हुए कहते हैं यह सामान्य प्रतिनियुक्ति नहीं, फेविकोल प्रतिनियुक्ति है,एक बार कुर्सी मिली तो फिर उठने का सवाल ही नहीं, बेशक यह एक व्यंग्यात्मक टिप्पणी है, लेकिन इस प्रकार की चर्चाएं तभी जन्म लेती हैं जब पारदर्शिता का अभाव दिखाई देता है।
क्या व्यवस्था कर्मचारी के लिए है या कर्मचारी व्यवस्था के लिए?
यह पूरा मामला अब केवल एक स्टेनो तक सीमित नहीं है,यह सवाल हर सरकारी कर्मचारी का है, जो नियमों के तहत प्रतिनियुक्ति पर जाता है, समय पूरा होने पर वापस लौटता है और सेवा नियमों का पालन करता है, यदि किसी मामले में अलग व्यवस्था अपनाई गई,तो उसका आधार क्या था? यदि कोई विशेष प्रशासनिक कारण था,तो उसे सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया?
अब जवाब दस्तावेजों से ही आएगा…
इस पूरे प्रकरण में अंतिम निर्णय जांच और आधिकारिक रिकॉर्ड से ही निकलेगा, लेकिन एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि जब दस्तावेजों के आधार पर इतने गंभीर प्रश्न सार्वजनिक रूप से उठाए जाएं, तो संबंधित विभाग समयबद्ध और तथ्यात्मक उत्तर भी दे, अन्यथा, चुप्पी स्वयं एक प्रश्न बन जाती है, और कोरिया में आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है की क्या यह केवल एक कर्मचारी की कहानी है, या फिर ऐसी प्रशासनिक व्यवस्था की, जहां प्रतिनियुक्ति अस्थायी नहीं बल्कि स्थायी परंपरा बन गई?


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