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सोनहत/कोरिया@ तालाब तो बह गया…अब जवाबदेही भी बहेगी या तय होगी? सोनहत वन विभाग के निर्माण पर उठे बड़े सवाल

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  • पहली ही बारिश में ढहा जल संरक्षण का दावा, गुणवत्ता,निगरानी और सरकारी धन के उपयोग पर उठे गंभीर प्रश्न
  • कोरिया वन मंडल में संरक्षण पीछे, निर्माण आगे?
  • चंदन चोरी से ‘कागजी तालाब’ तक लगातार उठते सवाल,पहली ही बारिश में बहा तालाब तो विभागीय कार्यप्रणाली कठघरे में…आखिर जिम्मेदारी किसकी?
  • दैनिक घटती-घटना की सिलसिलेवार खबरों ने खोली वन विभाग की कई परतें, अब जनता पूछ रही—क्या जंगल, वन्यजीव और वन संपदा की सुरक्षा से ज्यादा प्राथमिकता निर्माण कार्यों को?

-राजन पाण्डेय-
सोनहत/कोरिया,22 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
जल संरक्षण के उद्देश्य से सरकारी धन से तैयार किए गए तालाब का पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त हो जाना अब केवल एक निर्माण कार्य की विफलता का मामला नहीं रह गया है, इस घटना ने वन विभाग की कार्यप्रणाली,निर्माण गुणवत्ता,तकनीकी निगरानी और जवाबदेही को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि सार्वजनिक धन से बनाए गए निर्माण पहली ही बारिश नहीं झेल पाते, तो स्वाभाविक रूप से पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच और जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है, इस मामले को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि 17 जुलाई को दैनिक घटती-घटना ने ‘कागजों में बने तालाब, जमीन पर गड्ढे!’ शीर्षक से निर्माण कार्यों में कथित अनियमितताओं, गुणवत्ता पर सवाल और मशीनों के उपयोग सहित कई मुद्दों को प्रमुखता से प्रकाशित किया था, स्थानीय लोगों का कहना है कि खबर प्रकाशित होने के बाद उसी रात हुई बारिश में संबंधित तालाब की मेड़ टूट गई और निर्माण की वास्तविक स्थिति सामने आ गई, इसके बाद पहले लगाए जा रहे आरोपों और सवालों को लेकर चर्चा और तेज हो गई है। बता दे की वन विभाग का मूल दायित्व जंगलों की सुरक्षा,वन्यजीवों का संरक्षण, पौधों एवं वृक्षों की रक्षा,अवैध कटाई और तस्करी पर रोक तथा प्राकृतिक संसाधनों का संवर्धन है,सरकार हर वर्ष वन संरक्षण, जैव विविधता,जल संरक्षण और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए करोड़ों रुपये खर्च करती है,लेकिन यदि किसी वन मंडल में बार-बार ऐसे मामले सामने आने लगें,जिनमें कभी सरकारी नर्सरी से बेशकीमती चंदन के पेड़ गायब हो जाएं, कभी जल संरक्षण के नाम पर बने तालाब पहली ही बारिश में बह जाएं,कभी निर्माण कार्यों की गुणवत्ता पर गंभीर आरोप लगें और विभागीय जवाबदेही स्पष्ट न हो,तो स्वाभाविक रूप से पूरे तंत्र पर सवाल उठना लाजिमी है, कोरिया वन मंडल में बीते कुछ महीनों के दौरान सामने आए घटनाक्रमों ने यही तस्वीर प्रस्तुत की है, दैनिक घटती-घटना ने सिलसिलेवार प्रकाशित अपनी खबरों के माध्यम से कई ऐसे मुद्दों को सामने रखा,जिन्होंने वन विभाग की कार्यशैली,निर्माण कार्यों की गुणवत्ता,तकनीकी निगरानी,पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर बहस छेड़ दी है।
निरीक्षण व्यवस्था पर भी उठे सवाल- सरकारी निर्माण कार्यों में योजना स्वीकृति से लेकर अंतिम भुगतान तक कई स्तरों पर निरीक्षण और गुणवत्ता परीक्षण की व्यवस्था रहती है, ऐसे में यदि निर्माण पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त हो जाता है तो यह प्रश्न भी उठना स्वाभाविक है कि क्या निर्माण के दौरान नियमित निरीक्षण हुआ? क्या तकनीकी अधिकारियों ने स्थल का भौतिक सत्यापन किया? क्या माप पुस्तिका और गुणवत्ता परीक्षण के आधार पर भुगतान किया गया? यदि सभी प्रक्रियाएं नियमानुसार पूरी हुई थीं तो फिर निर्माण इतनी जल्दी क्यों क्षतिग्रस्त हुआ?
पारदर्शिता को लेकर भी उठ रहे प्रश्न- स्थानीय लोगों का कहना है कि निर्माण स्थल पर योजना से संबंधित जानकारी स्पष्ट रूप से प्रदर्शित नहीं थी,आमतौर पर ऐसे कार्यों में योजना का नाम,स्वीकृत राशि,निर्माण एजेंसी, कार्य अवधि और संबंधित अधिकारियों की जानकारी प्रदर्शित करने का प्रावधान रहता है, यदि यह जानकारी उपलब्ध नहीं थी तो इससे पारदर्शिता को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।
मशीनों के उपयोग को लेकर भी चर्चा– ग्रामीणों का आरोप है कि निर्माण कार्य में स्थानीय मजदूरों की अपेक्षा मशीनों का अधिक उपयोग किया गया,यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो यह भी देखा जाना आवश्यक होगा कि कार्य निर्धारित दिशा-निर्देशों और स्वीकृत प्रक्रिया के अनुरूप हुआ था या नहीं, यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऐसी योजनाओं का उद्देश्य स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध कराना भी माना जाता है।
क्या खबर ने पोल खोली या महज संयोग था?- तालाब बहने के बाद पूरे क्षेत्र में एक ही चर्चा होने लगी क्या दैनिक घटती-घटना द्वारा उठाए गए सवाल सही साबित हुए? या यह केवल प्राकृतिक कारणों से हुआ हादसा था? यद्यपि इसका अंतिम निष्कर्ष किसी सक्षम जांच से ही निकल सकता है, लेकिन तालाब बहने के बाद निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल और तेज हो गए।
पुराने मामलों की भी होने लगी चर्चा- तालाब बहने के बाद लोगों ने वन विभाग से जुड़े पुराने मामलों को भी जोड़ना शुरू कर दिया,ग्रामीणों के बीच चर्चा है कि क्या जंगलों में लगी भीषण आग के मामलों में क्या कार्रवाई हुई? चंदन चोरी के दोषी कौन हैं? क्या निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की कभी स्वतंत्र जांच हुई? क्या किसी अधिकारी की जवाबदेही तय हुई? इन सवालों ने पूरे विभाग की कार्यशैली पर व्यापक चर्चा शुरू कर दी है।
सरकारी योजनाएं केवल निर्माण नहीं,जनता के विश्वास की भी परियोजना होती हैं- सरकारी योजनाओं का उद्देश्य केवल बजट खर्च करना नहीं होता,इनका उद्देश्य जनता का विश्वास मजबूत करना,प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना और सार्वजनिक हित सुनिश्चित करना होता है,यदि करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद भी निर्माण पहली बारिश में बह जाए, सरकारी नर्सरी से चंदन गायब हो जाए और लगातार सवाल उठते रहें,तो यह केवल एक विभाग का मामला नहीं रह जाता, बल्कि शासन की जवाबदेही का विषय बन जाता है।
अब निगाहें जांच और जवाबदेही पर- दैनिक घटती-घटना द्वारा लगातार प्रकाशित खबरों ने जिन सवालों को उठाया,वे अब सार्वजनिक बहस का हिस्सा बन चुके हैं, हालांकि किसी भी अनियमितता या जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच और आधिकारिक निष्कर्षों के आधार पर ही होगा। लेकिन यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि यदि निर्माण गुणवत्ता,तकनीकी प्रक्रिया या विभागीय निगरानी में किसी स्तर पर कमी पाई जाती है, तो जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित न रहे, अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है क्या इस बार केवल बह चुके तालाब की मरम्मत होगी, या फिर उस व्यवस्था की भी,जिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं? क्या चंदन चोरी से लेकर तालाब निर्माण तक के मामलों में जवाबदेही तय होगी,या ये मुद्दे भी समय के साथ फाइलों में दब जाएंगे? कोरिया वन मंडल से जुड़े इन घटनाक्रमों ने इतना तो स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब केवल निर्माण नहीं,बल्कि पारदर्शिता,गुणवत्ता और जवाबदेही भी चाहती है,अब यह विभाग और शासन पर निर्भर करेगा कि वह इन सवालों का उत्तर तथ्यों, जांच और कार्रवाई के माध्यम से देता है या नहीं।
जल संरक्षण की योजना या सरकारी धन की औपचारिकता?– सरकार हर वर्ष जल संरक्षण,भू-जल स्तर बढ़ाने और वन्यजीवों के लिए जल उपलब्ध कराने के उद्देश्य से करोड़ों रुपये की योजनाएं संचालित करती है,इन योजनाओं का उद्देश्य केवल निर्माण कराना नहीं, बल्कि लंबे समय तक उपयोगी परिसंपत्तियों का निर्माण करना होता है,लेकिन सोनहत वन परिक्षेत्र में निर्मित तालाब के पहली ही बारिश में बह जाने की घटना ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या योजना का क्रियान्वयन निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप हुआ था या केवल कार्य पूर्ण दिखाकर सरकारी राशि खर्च कर दी गई।
पहली बारिश ने खोल दी निर्माण की हकीकत– स्थानीय लोगों के अनुसार तालाब का निर्माण पूरा होने के कुछ समय बाद ही हुई शुरुआती बारिश में उसकी मेड़ टूट गई और संरचना क्षतिग्रस्त हो गई,ग्रामीणों का कहना है कि यदि निर्माण मजबूत और निर्धारित मानकों के अनुरूप होता तो सामान्य बारिश में इस प्रकार का नुकसान नहीं होना चाहिए था,यदि यह स्थिति सही है तो स्वाभाविक रूप से कई प्रश्न उठते हैं क्या मिट्टी का पर्याप्त संपीड़न किया गया था? क्या मेड़ की चौड़ाई और ऊंचाई तकनीकी मानकों के अनुरूप थी? क्या अतिरिक्त पानी की निकासी की पर्याप्त व्यवस्था की गई थी? क्या निर्माण के दौरान गुणवत्ता परीक्षण किया गया? इन सवालों के जवाब अब केवल विभागीय दावों से नहीं बल्कि तकनीकी जांच से ही सामने आ सकते हैं।
सबसे बड़ा सवाल-जिम्मेदारी किसकी होगी?– सरकारी निर्माण किसी एक कर्मचारी के भरोसे नहीं होता। योजना स्वीकृति,तकनीकी डिजाइन, कार्य निष्पादन, निरीक्षण, माप पुस्तिका, गुणवत्ता परीक्षण और भुगतान जैसी प्रत्येक प्रक्रिया में अलग-अलग स्तर पर अधिकारी और कर्मचारी शामिल होते हैं,ऐसे में यदि निर्माण कार्य शुरुआती बारिश में ही क्षतिग्रस्त हो जाता है तो केवल निर्माण एजेंसी ही नहीं,बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया की भी समीक्षा आवश्यक हो जाती है, क्या निर्माण गुणवत्ता के अनुरूप हुआ था? क्या तकनीकी निरीक्षण वास्तव में किया गया? क्या भुगतान से पहले गुणवत्ता परीक्षण हुआ? क्या जिम्मेदारी केवल निचले स्तर तक सीमित रहेगी या पूरी प्रशासनिक श्रृंखला की जांच होगी?
चंदन चोरी ने पहली बार हिलाई थी व्यवस्था– मामलों की शुरुआत उस समय हुई जब सोनहत स्थित शासकीय नर्सरी से बेशकीमती चंदन के पेड़ों के गायब होने का मामला सामने आया,यह कोई सामान्य चोरी नहीं थी, जिस नर्सरी को वन विभाग की सबसे सुरक्षित परिसंपत्तियों में गिना जाता है,वहीं से वर्षों पुराने चंदन के वृक्ष गायब हो गए,यह घटना केवल चोरी तक सीमित नहीं रही। इसने सुरक्षा व्यवस्था पर कई प्रश्न खड़े कर दिए,यदि विभाग अपने मुख्यालय की नर्सरी की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं कर पा रहा है,तो हजारों हेक्टेयर जंगलों की सुरक्षा का दावा किस आधार पर किया जा रहा है? दैनिक घटती-घटना ने इस मामले को लगातार प्रमुखता से प्रकाशित किया। समाचारों में यह प्रश्न भी उठाया गया कि चोरी के बाद क्या एफआईआर दर्ज हुई? क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई? क्या किसी कर्मचारी पर विभागीय कार्रवाई हुई? क्या चोरी की निष्पक्ष जांच पूरी हुई? इन सवालों के सार्वजनिक उत्तर आज तक स्पष्ट रूप से सामने नहीं आ सके।
जनविश्वास का भी है सवाल– सरकारी परियोजनाएं केवल निर्माण कार्य नहीं होतीं,बल्कि वे जनता के विश्वास का भी प्रतीक होती हैं,यदि सार्वजनिक धन से बनी संरचनाएं पहली ही बारिश में क्षतिग्रस्त हो जाएं तो इससे योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी असर पड़ता है, अब देखना यह होगा कि सोनहत का यह मामला भी केवल मरम्मत तक सीमित रहता है या फिर निर्माण की गुणवत्ता, तकनीकी परीक्षण,प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग की निष्पक्ष जांच कर वास्तविक जिम्मेदारी तय की जाती है, फिलहाल जनता का सबसे बड़ा सवाल यही है क्या इस बार केवल तालाब की मरम्मत होगी, या फिर उस व्यवस्था की भी, जिसने पहली ही बारिश में उसे बह जाने दिया?


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