
- खोजी खबर का असर? 75 साल पुरानी वन भूमि के क्रय-विक्रय पर लगी रोक,अब होगी बड़े खेल की जांच?
- वन भूमि पर करोड़ों के सौदों की चर्चा के बीच प्रशासन हरकत में…एसडीएम ने लगाई खरीद-बिक्री पर रोक
- वन विभाग की कॉलोनी से कथित सौदों तक…14 दिन में बदल गई तस्वीर,अब जांच के घेरे में पूरा मामला
- सरकारी वन भूमि पर सौदों का विवाद गहराया, एसडीएम के आदेश के बाद प्रशासनिक भूमिका पर फिर सवाल
- वन भूमि पर रोक का आदेश,लेकिन सवाल बरकरार—रिकॉर्ड बदला किसने और सौदे हुए कैसे?
- भट्टीपारा वन भूमि प्रकरण में खरीद-बिक्री पर रोक, अब रिकॉर्ड, कब्जे और जिम्मेदारों की होगी पड़ताल?
- वन भूमि पर कथित सौदों मामले में एसडीएम की रोक के बाद अब निष्पक्ष जांच की मांग तेज
- दैनिक घटती-घटना ने उठाए थे वन भूमि,स्टेट रिकॉर्ड और कथित सौदों पर सवाल,एसडीएम ने विवादित भूमि के क्रय-विक्रय पर लगाई रोक, अब निष्पक्ष जांच की मांग तेज
-रवि सिंह-
कोरिया/बैकुंठपुर,20 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। सरकारी भूमि, विशेषकर वन विभाग की भूमि,केवल राजस्व का विषय नहीं होती बल्कि यह सार्वजनिक संपत्ति होती है, जिसकी सुरक्षा और संरक्षण राज्य की जिम्मेदारी होती है,लेकिन जब ऐसी भूमि को लेकर रिकॉर्ड, कब्जा,निर्माण और कथित खरीद-बिक्री जैसे सवाल सामने आने लगें,तब मामला केवल जमीन का नहीं रह जाता,बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही, सरकारी अभिलेखों की विश्वसनीयता और कानून के पालन का विषय बन जाता है। कोरिया जिले के बैकुंठपुर स्थित भट्टीपारा वन विभाग आवासीय कॉलोनी से जुड़ा मामला अब इसी मोड़ पर पहुंच गया है, लगभग दो सप्ताह पहले इस विषय पर प्रकाशित खोजी समाचार में कई सवाल उठाए गए थे, इसके बाद 07 जुलाई 2026 को अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व), बैकुंठपुर ने संबंधित भूमि के क्रय-विक्रय पर रोक लगाने का आदेश जारी कर दिया। यह घटनाक्रम पूरे मामले को और अधिक गंभीर बना रहा है, हालांकि यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि क्रय-विक्रय पर रोक लगाने का आदेश स्वयं किसी भी आरोप को सिद्ध नहीं करता,बल्कि यह दर्शाता है कि प्रशासन ने भूमि को विवादित मानते हुए आगे के लेनदेन पर रोक लगाने का निर्णय लिया है।
23 जून को उठे थे कई सवाल– 23 जून को प्रकाशित खोजी रिपोर्ट में दावा किया गया था कि लगभग 75 वर्ष पुरानी वन विभाग की भूमि और वन विभाग की आवासीय कॉलोनी से जुड़े रिकॉर्ड में गंभीर प्रश्न खड़े हो रहे हैं, रिपोर्ट में यह भी सवाल उठाया गया था कि यदि भूमि सरकारी रिकॉर्ड में वन विभाग की है,तो निजी सौदों की चर्चा कैसे हो रही है तथा कथित रूप से करोड़ों रुपये के लेन-देन की बातें क्यों सामने आ रही हैं,रिपोर्ट में प्रशासनिक अधिकारियों,वन विभाग तथा राजस्व अभिलेखों की भूमिका पर भी कई प्रश्न उठाए गए थे और पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग की गई थी।
14 दिन बाद आया प्रशासनिक आदेश-अब सामने आए एसडीएम कार्यालय के आदेश से पता चलता है कि वनमंडलाधिकारी,कोरिया वन मंडल द्वारा भेजे गए पत्र के आधार पर मामले का परीक्षण किया गया,आदेश में उल्लेख है कि संबंधित भूमि वन विभाग की आवासीय कॉलोनी से जुड़ी है तथा इस संबंध में शिकायत प्राप्त हुई थी,दस्तावेज़ में कथित रूप से कूटरचित तरीके से भूमि विक्रय किए जाने का भी उल्लेख है, इन तथ्यों को देखते हुए एसडीएम ने संबंधित भूमि के क्रय-विक्रय पर रोक लगाने का आदेश जारी किया तथा आवश्यक कार्रवाई के लिए तहसीलदार को निर्देशित किया, यह आदेश यह संकेत अवश्य देता है कि प्रशासन ने मामले को गंभीर मानते हुए तत्काल एहतियाती कदम उठाया।
वन विभाग की शिकायत क्या कहती है?- एसडीएम के आदेश से यह स्पष्ट है कि कार्रवाई की शुरुआत वन विभाग के पत्र के आधार पर हुई, इससे यह प्रश्न भी उठता है कि यदि वन विभाग को पहले से विवाद की जानकारी थी, तो उसने प्रारंभिक स्तर पर क्या कार्रवाई की? क्या पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई? क्या राजस्व विभाग को पहले भी पत्राचार किया गया था? यदि किया गया, तो उन पर क्या कार्रवाई हुई?
क्रय-विक्रय पर रोक—अस्थायी राहत या जांच की शुरुआत?– भूमि पर खरीद-बिक्री रोक देने से फिलहाल नए सौदे रुक जाएंगे,लेकिन केवल रोक लगा देना पर्याप्त नहीं माना जा सकता,अब आवश्यकता इस बात की है कि यह भी स्पष्ट किया जाए भूमि का वास्तविक स्वामित्व क्या है? वर्तमान कब्जा किसके पास है? यदि निर्माण हुए हैं,तो किस अनुमति से हुए? यदि विक्रय दस्तावेज बने हैं, तो उनकी वैधानिक स्थिति क्या है?
सबसे बड़ा सवाल,यदि भूमि सरकारी थी तो सौदे कैसे हुए?– अब इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही बन गया है यदि संबंधित भूमि वन विभाग की आवासीय कॉलोनी का हिस्सा थी,तो उसके संबंध में निजी खरीद-बिक्री की स्थिति कैसे बनी? यदि किसी प्रकार का विक्रय हुआ,तो क्या संबंधित प्रक्रिया वैधानिक थी? यदि नहीं,तो संबंधित अभिलेख किस आधार पर तैयार हुए? इन प्रश्नों का उत्तर केवल दस्तावेज़ों की विस्तृत जांच से ही सामने आ सकता है।
क्या बदले गए रिकॉर्ड?– खोजी रिपोर्ट में यह भी प्रश्न उठाया गया था कि क्या किसी स्तर पर रिकॉर्ड में परिवर्तन किया गया था, यदि ऐसा हुआ, तो परिवर्तन किस अधिकारी के आदेश पर हुआ? किस वर्ष हुआ? क्या उसके लिए सक्षम प्राधिकारी की अनुमति थी? क्या संबंधित विभागों की सहमति प्राप्त की गई थी? इन सभी बिंदुओं की जांच आवश्यक मानी जा रही है।
सिर्फ रोक नहीं,जिम्मेदारी भी तय हो…– यदि जांच में यह सामने आता है कि किसी सरकारी भूमि का रिकॉर्ड बदलकर अथवा अन्य तरीके से निजी लेन-देन हुआ,तो यह केवल भूमि विवाद नहीं रहेगा, ऐसी स्थिति में यह भी तय करना होगा कि किस अधिकारी की भूमिका क्या थी? रिकॉर्ड तैयार करने वाला कौन था? सत्यापन किसने किया? पंजीयन के समय किन दस्तावेजों के आधार पर प्रक्रिया पूरी हुई? यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता हुई है, तो संबंधित अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए।
सात बड़े सवाल जिनके जवाब जरूरी,इस पूरे घटनाक्रम के बाद अब कई महत्वपूर्ण प्रश्न सामने हैं…
संबंधित भूमि का मूल रिकॉर्ड क्या कहता है?
. क्या भूमि आज भी वन विभाग के स्वामित्व में दर्ज है?
कथित विक्रय किन दस्तावेजों के आधार पर हुआ?
. यदि रिकॉर्ड बदला गया,तो किसके आदेश से?
. वन विभाग ने पहली बार शिकायत कब दर्ज कराई?
राजस्व विभाग ने उस समय क्या कार्रवाई की?
क्या पूरे मामले की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराई जाएगी?
जांच निष्पक्ष हो…तभी दूर होंगे संदेह…– भूमि विवादों में अक्सर वर्षों तक मुकदमे चलते रहते हैं, लेकिन जब मामला सरकारी भूमि और सरकारी अभिलेखों से जुड़ा हो, तब जांच केवल औपचारिक नहीं होनी चाहिए, विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में राजस्व रिकॉर्ड, वन विभाग के रिकॉर्ड, पंजीयन अभिलेख, सीमांकन, कब्जे की स्थिति, निर्माण की अनुमति, और सभी संबंधित दस्तावेजों का संयुक्त परीक्षण किया जाना चाहिए।
प्रशासन के सामने अवसर भी और चुनौती भी…– एसडीएम द्वारा खरीद-बिक्री पर रोक लगाने का आदेश यह दर्शाता है कि प्रशासन ने प्रथम दृष्टया मामले को गंभीर माना है,अब अगला चरण सबसे महत्वपूर्ण है,यदि निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक की जाती है, तो इससे सरकारी भूमि की सुरक्षा को लेकर लोगों का विश्वास मजबूत होगा, लेकिन यदि जांच अधूरी रह गई या केवल औपचारिक कार्रवाई तक सीमित रही, तो विवाद और गहरा सकता है।
अब निगाहें जांच पर…– भट्टीपारा वन भूमि प्रकरण अब केवल एक स्थानीय भूमि विवाद नहीं रह गया है, यह मामला सरकारी संपत्ति की सुरक्षा,प्रशासनिक जवाबदेही और सार्वजनिक अभिलेखों की विश्वसनीयता से जुड़ चुका है,क्रय-विक्रय पर रोक लगाने का आदेश पहला महत्वपूर्ण प्रशासनिक कदम है,लेकिन असली परीक्षा अब निष्पक्ष और व्यापक जांच की होगी,यदि जांच में सभी दस्तावेजों,संबंधित विभागों और संभावित जिम्मेदार पक्षों की भूमिका स्पष्ट की जाती है, तभी यह तय हो सकेगा कि यह केवल रिकॉर्ड संबंधी विवाद था या वास्तव में सरकारी भूमि से जुड़ी कोई गंभीर अनियमितता हुई थी।
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