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सूरजपुर@30 ह्यूम पाइप पड़े कम? पहली बारिश में बहा 15 लाख का रपटा, अब डिजाइन और गुणवत्ता दोनों सवालों के घेरे में…

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  • 15 लाख का रपटा पहली बारिश में बहा, अब उठा सवाल-क्या पानी के निकास का सही आकलन हुआ था?
  • क्या 10 ह्यूम पाइपों की कमी ले डूबी 15 लाख का रपटा?
  • गोबरी नदी का बहाव भारी या डिजाइन में चूक? 15 लाख का रपटा पहली बारिश में ध्वस्त
  • गोबरी नदी के चौड़े पाट पर छोटा पड़ा रपटा, पहली ही बारिश में टूटी वैकल्पिक व्यवस्था
  • पहली बारिश में ध्वस्त हुआ रपटा,अब सवाल-क्या पानी के निकास की क्षमता कम रखी गई थी?
  • नदी का बहाव नहीं झेल पाया रपटा,क्या निर्माण में पर्याप्त ह्यूम पाइप नहीं लगाए गए?
  • ग्रामीणों का दावा गोबरी नदी के चौड़े पाट पर अधिक ह्यूम पाइप लगाए जाते तो पानी का निकास बेहतर होता, तकनीकी जांच से ही स्पष्ट होगी वास्तविक वजह

-ओंकार पांडेय-
सूरजपुर,20 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
सूरजपुर जिले के भैयाथान विकासखंड के ग्राम डबरीपारा-खुटरापारा में गोबरी नदी पर लगभग 15 लाख रुपये की लागत से निर्मित वैकल्पिक रपटा पुल पहली ही तेज बारिश में बह जाने के बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश और चिंता का माहौल है,यह केवल एक निर्माण कार्य के क्षतिग्रस्त होने की घटना नहीं है,बल्कि एक वर्ष से अधिक समय से वैकल्पिक व्यवस्था का इंतजार कर रहे हजारों ग्रामीणों की उम्मीदों के टूटने की कहानी भी है।
करीब एक वर्ष पहले गोबरी नदी पर बना मुख्य पुल टूट गया था,इसके बाद क्षेत्र के लोग स्थायी पुल निर्माण की मांग करते रहे, लंबे इंतजार के बाद विभाग ने वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में रपटा का निर्माण कराया। लेकिन ग्रामीणों के अनुसार रपटा तैयार होने के लगभग पंद्रह दिन बाद ही हुई लगातार बारिश में यह बह गया और एक बार फिर 12 से अधिक गांवों का जिला मुख्यालय से संपर्क टूट गया,अब इस पूरे मामले में निर्माण गुणवत्ता,तकनीकी निगरानी, विभागीय जवाबदेही और सार्वजनिक धन के उपयोग को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, ग्रामीणों ने पूरे मामले की उच्च स्तरीय तकनीकी जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की मांग की है।
क्या ह्यूम पाइप कम पड़ गए?- स्थानीय ग्रामीणों और कुछ जानकारों का कहना है कि गोबरी नदी का पाट काफी चौड़ा है और बरसात के समय इसमें पानी का दबाव अत्यधिक रहता है, उनका दावा है कि यदि रपटा निर्माण में 30 ह्यूम पाइपों के स्थान पर लगभग 40 ह्यूम पाइप लगाए गए होते, तो पानी के निकास के लिए अधिक स्थान मिलता और तेज बहाव का दबाव कम पड़ता, उनका मानना है कि पानी का पर्याप्त निकास नहीं होने से बहाव का दबाव सीधे रपटा पर पड़ा, जिससे उसका अंतिम हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया, ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि निर्माण के दौरान लागत कम करने के उद्देश्य से पर्याप्त संख्या में ह्यूम पाइप नहीं लगाए गए,हालांकि इस दावे की पुष्टि संबंधित विभाग की तकनीकी जांच के बाद ही हो सकेगी, यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं,तो यह निर्माण की डिजाइन,गुणवत्ता और तकनीकी स्वीकृति से जुड़े गंभीर सवाल खड़े करेगा।
एक वर्ष तक इंतजार, फिर मिली अस्थायी व्यवस्था-30 जून 2025 को गोबरी नदी पर बना मुख्य पुल अचानक धराशायी हो गया था,यह पुल राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-43 से सूरजपुर और कोरिया जिले के कई गांवों को जोड़ने वाला प्रमुख संपर्क मार्ग था। पुल टूटते ही हजारों लोगों का आवागमन प्रभावित हो गया,किसान,विद्यार्थी,व्यापारी और मरीज सभी को लंबा वैकल्पिक मार्ग अपनाना पड़ा,उस समय प्रशासन ने स्थायी पुल निर्माण का आश्वासन दिया था,हालांकि बरसात, तकनीकी स्वीकृतियों और अन्य प्रक्रियाओं के बीच एक वर्ष बीत गया और नया पुल शुरू नहीं हो सका। अंततः लोगों की परेशानी कम करने के लिए लगभग 15 लाख रुपये की लागत से रपटा का निर्माण कराया गया, ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें उम्मीद थी कि कम से कम इस बरसात में आवागमन सामान्य रहेगा, लेकिन पहली ही तेज बारिश ने उस उम्मीद को भी बहा दिया।
पहली ही बारिश में ध्वस्त हुई वैकल्पिक व्यवस्था-लगातार हुई बारिश के बाद गोबरी नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ा, तेज बहाव के बीच रपटा पुल क्षतिग्रस्त हो गया और बाद में बह गया,इसके साथ ही फिर से क्षेत्र के गांवों का संपर्क टूट गया,ग्रामीणों का कहना है कि जिस संरचना को बरसात के दौरान राहत देने के उद्देश्य से बनाया गया था,वह पहली ही बड़ी परीक्षा में असफल साबित हुई।
’दैनिक घटती-घटना’ ने पहले ही जताई थी आशंका- रपटा निर्माण पूरा होने के बाद दैनिक घटती-घटना ने अपने समाचार में यह प्रश्न कई बार उठाया था कि गोबरी नदी के तेज बहाव को देखते हुए इस वैकल्पिक व्यवस्था की वास्तविक परीक्षा पहली ही बरसात में होगी,समाचार में यह भी उल्लेख किया गया था कि नदी का जलग्रहण क्षेत्र पहाड़ी है, जहां बारिश के समय तेज प्रवाह आता है,ऐसे में निर्माण की गुणवत्ता सबसे महत्वपूर्ण होगी,अब रपटा बहने के बाद ग्रामीणों का कहना है कि अखबार द्वारा उठाए गए सवाल निराधार नहीं थे।
निरीक्षण हुए,लेकिन क्या गुणवत्ता भी देखी गई?- पिछले एक वर्ष के दौरान इस स्थल का कई बार निरीक्षण हुआ,स्थानीय विधायक एवं कैबिनेट मंत्री लक्ष्मी राजवाड़े, उनके प्रतिनिधि,स्थानीय जनप्रतिनिधि तथा विभिन्न प्रशासनिक अधिकारियों ने समय-समय पर स्थल का दौरा किया,ग्रामीणों का आरोप है कि निरीक्षण अधिक हुए,लेकिन निर्माण गुणवत्ता पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया,उनका कहना है कि यदि निर्माण के दौरान तकनीकी निगरानी प्रभावी होती,तो शायद आज यह स्थिति नहीं बनती, हालांकि इस संबंध में संबंधित विभाग और जनप्रतिनिधियों की आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने आना अभी शेष है।
जांच में पुराने पाइप मिलने का दावा- रपटा बहने के बाद तहसीलदार और नायब तहसीलदार द्वारा मौके का निरीक्षण किए जाने की जानकारी सामने आई है,स्थानीय ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का दावा है कि निरीक्षण के दौरान तैयार पंचनामा में यह उल्लेख किया गया कि रपटा में लगाए गए 30 ह्यूम पाइपों में से अधिकांश पुराने थे,यदि जांच में यह तथ्य आधिकारिक रूप से प्रमाणित होते हैं, तो निर्माण सामग्री के चयन और गुणवत्ता नियंत्रण पर गंभीर प्रश्न खड़े होंगे,हालांकि इस संबंध में अंतिम तकनीकी जांच रिपोर्ट अभी सार्वजनिक नहीं हुई है।
बारह से अधिक गांव फिर अलग-थलग– रपटा बहने के बाद खुटरापारा, डबरीपारा,गंगौटी,शिवप्रसादनगर,सोनपुर, करौंदामुंडा,टेगनी,बिलारो, बंजा,बड़सरा,केवरा, कुसमूसी,बस्कर और पंडोपारा सहित अनेक गांव प्रभावित हुए हैं,ग्रामीणों के अनुसार सबसे अधिक परेशानी विद्यार्थियों,मरीजों,किसानों और दैनिक आवागमन करने वालों को हो रही है, बरसात के मौसम में यह स्थिति और गंभीर हो सकती है।
ग्रामीणों की प्रमुख मांगें- आक्रोशित ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि है पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए,यदि किसी प्रकार की अनियमितता या लापरवाही पाई जाती है तो जिम्मेदार अधिकारियों एवं संबंधित एजेंसी के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई की जाए, सार्वजनिक धन के उपयोग की जवाबदेही तय की जाए,प्रभावित गांवों के लिए तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध कराया जाए,स्थायी पुल निर्माण कार्य को प्राथमिकता देकर शीघ्र शुरू किया जाए।
सबसे बड़ा सवाल—जिम्मेदार कौन? यह घटना कई महत्वपूर्ण प्रश्न छोड़ गई है…
यदि रपटा तकनीकी मानकों के अनुरूप बनाया गया था तो वह पहली ही तेज बारिश में क्यों बह गया?
यदि निर्माण सामग्री को लेकर उठ रहे आरोप सही हैं तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
यदि बार-बार निरीक्षण हुए तो गुणवत्ता संबंधी कमियां पहले क्यों नहीं पकड़ी गईं?
क्या इस पूरे मामले में विभागीय जांच होगी?
क्या तकनीकी विशेषज्ञों की स्वतंत्र टीम इसकी समीक्षा करेगी?

स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने लगाए गंभीर आरोप
जनपद सदस्य राजू कुमार गुप्ता सहित अन्य स्थानीय प्रतिनिधियों का आरोप है कि निर्माण में पुराने पाइपों का उपयोग किया गया,उनका कहना है कि यदि यह आरोप सही सिद्ध होते हैं तो पूरे निर्माण कार्य की स्वतंत्र तकनीकी जांच आवश्यक है, इन आरोपों पर संबंधित विभाग की ओर से अभी तक कोई विस्तृत सार्वजनिक स्पष्टीकरण उपलब्ध नहीं है।
तकनीकी दस्तावेजों को लेकर भी उठे सवाल
ग्रामीणों का कहना है कि निर्माण के दौरान हुए एक निरीक्षण में उप अभियंता के पास स्वीकृत एस्टीमेट और तकनीकी ड्राइंग उपलब्ध नहीं थी,यदि जांच में यह तथ्य सही पाए जाते हैं,तो परियोजना के तकनीकी संचालन और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
चंदा आंदोलन से लेकर रपटा बहने तक…
इस पूरे मार्ग का संघर्ष केवल पुल तक सीमित नहीं रहा, रपटा बनने के बाद एप्रोच रोड अधूरी छोड़ दिए जाने से पहली बारिश में पूरा रास्ता दलदल में बदल गया था,तब ग्रामीणों ने स्वयं चंदा एकत्र कर सड़क निर्माण की पहल शुरू की, इस अभियान की व्यापक चर्चा हुई,जिसके बाद विभाग ने सड़क पर डब्ल्यूएमएम का कार्य कराया,लेकिन अब रपटा बहने के बाद लोगों का कहना है कि पूरी मेहनत और उम्मीद पर फिर पानी फिर गया।
विभाग का पक्ष भी महत्वपूर्ण
इस पूरे मामले में संबंधित विभाग का पक्ष भी महत्वपूर्ण होगा,जांच पूरी होने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि रपटा बहने का कारण केवल असामान्य जलप्रवाह था, निर्माण संबंधी तकनीकी कमी थी, या दोनों का संयुक्त प्रभाव,इसी प्रकार पुराने ह्यूम पाइपों और अन्य आरोपों की भी पुष्टि आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
जनहित का मुद्दा, जवाबदेही की प्रतीक्षा
गोबरी नदी पर बहा यह रपटा केवल कंक्रीट और पाइपों का ढांचा नहीं था,बल्कि हजारों ग्रामीणों की रोजमर्रा की जिंदगी का सहारा था,उसके बह जाने से एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया है कि सार्वजनिक निर्माण कार्यों में गुणवत्ता,तकनीकी मानकों और नियमित निगरानी से समझौता नहीं किया जा सकता, अब पूरे क्षेत्र की निगाहें प्रशासन और शासन की कार्रवाई पर हैं, ग्रामीणों की मांग है कि मामले की निष्पक्ष जांच हो, यदि किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो जिम्मेदारी तय की जाए, और सबसे महत्वपूर्ण—स्थायी पुल का निर्माण शीघ्र कराया जाए, ताकि हर बरसात में लोगों को इसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े।


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