
- दैनिक घटती-घटना’ की चेतावनी साबित हुई सही,पहली ही बरसात में खुल गई निर्माण गुणवत्ता की पोल
- ‘दैनिक घटती-घटना’ ने 7 जुलाई को ही जताई थी आशंका और 18 जुलाई की रात बह गया 15 लाख का रपटा
- एक साल इंतजार,एक महीने की राहत…तीन दिन की बारिश में खत्म हुआ 15 लाख का रपटा
- 15 लाख का रपटा पानी में समाया, अब जवाबदेही किसकी?
- जिस रपटा को बताया गया था राहत, वही पहली बारिश में बन गया आफत
- गोबरी नदी की पहली परीक्षा में फेल हुई वैकल्पिक व्यवस्था,हजारों ग्रामीणों का संपर्क फिर
- 15 लाख का रपटा तीन दिन में ‘स्वाहा’! रपटा के साथ विभाग की ‘नाक’ भी बह गई?
-ओंकार पांडेय-
सूरजपुर 19 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। 30 जून 2025 को गोबरी नदी पर बना करोड़ों रुपये की लागत वाला स्थायी पुल धराशायी हुआ था, उस दिन हजारों ग्रामीणों का राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक-43 से सीधा संपर्क टूट गया था, प्रशासन ने भरोसा दिया कि जल्द नया पुल बनेगा और तब तक वैकल्पिक व्यवस्था की जाएगी, लेकिन एक साल बीत गया,नया पुल नहीं बना, आखिरकार लगभग एक माह पहले करीब 15 लाख रुपये की लागत से वैकल्पिक रपटा पुल तैयार किया गया, ताकि बरसात में ग्रामीणों का आवागमन बाधित न हो। लेकिन प्रकृति ने इस वैकल्पिक व्यवस्था की परीक्षा लेने में ज्यादा समय नहीं लगाया,लगातार तीन दिन की बारिश हुई और वह रपटा,जिसे बनने में लगभग एक वर्ष लग गया था,तेज बहाव के सामने टिक नहीं सका,रपटा बह गया और एक बार फिर हजारों ग्रामीणों का संपर्क टूट गया,सबसे दिलचस्प बात यह है कि दैनिक घटती-घटना ने 7 जुलाई 2026 को ही अपने समाचार में आशंका जताई थी कि गोबरी नदी के तेज बहाव के सामने यह रपटा पहली बरसात में ही असली परीक्षा देगा, आज जब रपटा बह गया है तो ग्रामीण कह रहे हैं कि अखबार ने जो आशंका जताई थी, वही हकीकत बन गई।
15 लाख का सवाल अब जनता पूछ रही है…
क्या निर्माण से पहले नदी के वास्तविक जलस्तर और बहाव का अध्ययन किया गया था?
क्या तकनीकी मानकों का पालन हुआ?
क्या निर्माण कार्य की गुणवत्ता की जांच की गई?
क्या निर्माण पूरा होने के बाद उसका निरीक्षण हुआ?
यदि सब कुछ मानकों के अनुसार था तो रपटा इतनी जल्दी कैसे बह गया?
पहले पुल टूटा…फिर रपटा बहा…अब भरोसा किस पर?- पिछले वर्ष स्थायी पुल टूट गया, लोगों ने सोचा कि वैकल्पिक व्यवस्था राहत देगी,अब वैकल्पिक व्यवस्था भी बह गई, ग्रामीणों का कहना है कि अब उन्हें केवल आश्वासन नहीं,स्थायी समाधान चाहिए।
तीन दिन की बारिश ने खोल दी पूरी कहानी-जिस रपटा को बनने में महीनों लगे, उसे बहने में केवल तीन दिन लगे,यह तीन दिन केवल बारिश के नहीं थे,यह तीन दिन निर्माण गुणवत्ता,विभागीय निगरानी और तकनीकी तैयारी की भी परीक्षा थे,और यदि परिणाम केवल रपटा के बह जाने तक सीमित नहीं रहा,तो निश्चित रूप से यह पूरे निर्माण तंत्र के लिए गंभीर आत्ममंथन का विषय है।
अब कौन देगा जवाब?-अब लोगों की नजरें संबंधित विभाग पर हैं, क्या विभाग इसकी तकनीकी जांच कराएगा? क्या निर्माण एजेंसी से जवाब मांगा जाएगा? क्या गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच होगी? क्या जिम्मेदारी तय होगी? या फिर यह मामला भी बारिश के पानी के साथ बह जाएगा?
जनता का दर्द फिर वहीं लौट आया- रपटा बनने के बाद किसानों को उम्मीद थी कि वे आसानी से अपनी उपज बाजार तक पहुंचा सकेंगे,विद्यार्थियों को लगा था कि अब स्कूल और कॉलेज पहुंचना आसान होगा,मरीजों को भरोसा था कि एम्बुलेंस समय पर अस्पताल तक पहुंच जाएगी,लेकिन अब फिर वही पुरानी परेशानी सामने है, लंबा चक्कर…अतिरिक्त खर्च…समय की बर्बादी…और बरसात में बढ़ती मुश्किलें।
व्यंग्यः नदी ने टेंडर नहीं पढ़ा-ग्रामीण हंसते हुए कहते हैं की गोबरी नदी ने शायद टेंडर की शर्तें नहीं पढ़ीं… उसे तो सिर्फ बहाव पता था, नदी ने यह नहीं देखा कि रपटा 15 लाख का है या 15 करोड़ का,उसने केवल उसकी मजबूती की परीक्षा ली,और परीक्षा का परिणाम सबके सामने है।
अब स्थायी पुल ही एकमात्र समाधान- अब स्पष्ट हो चुका है कि अस्थायी व्यवस्था लंबे समय का समाधान नहीं हो सकती, यदि हजारों लोगों को हर बरसात में राहत देनी है तो स्थायी पुल का निर्माण सर्वोच्च प्राथमिकता होना चाहिए,वैकल्पिक रपटा केवल आपातकालीन व्यवस्था हो सकता है, स्थायी समाधान नहीं।
दैनिक घटती-घटना का सवाल- दैनिक घटती-घटना ने पुल टूटने से लेकर रपटा बनने तक लगातार जनहित का मुद्दा उठाया, अखबार ने पहले पुल की जर्जर स्थिति दिखाई, और उसके टूटने की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की,वैकल्पिक व्यवस्था की मांग उठाई, रपटा बनने के बाद एप्रोच रोड की बदहाली दिखाई और अंत में यह आशंका भी जताई कि पहली बरसात है रपटा की वास्तविक परीक्षा होगी, आज जब रपटा बह चुका है,तो अखबार का सवाल पहले से भी बड़ा हो गया है की क्या सार्वजनिक धन से बनने वाले निर्माण केवल पहली बारिश तक ही सीमित रहेंगे,या अब गुणवत्ता, जवाबदेही और तकनीकी मानकों को भी गंभीरता से लिया जाएगा? क्योंकि इस बार गोबरी नदी सिर्फ 15 लाख रुपये का रपटा नहीं बहाकर ले गई, बल्कि निर्माण गुणवत्ता पर किए गए दावों और विभाग की साख को भी कटघरे में खड़ा कर गई,अब लोगों की निगाहें इस बात पर हैं कि इस विफलता की जिम्मेदारी तय होती है या फिर अगली बरसात तक एक और नया रपटा बनाने की तैयारी शुरू होगी।
एक साल की तैयारी…तीन दिन में खत्म– 30 जून 2025 को पुल टूटने के बाद प्रशासन ने पहले लोगों को आश्वासन दिया,फिर सर्वे हुए,निरीक्षण हुए, प्रस्ताव बने और आखिरकार एक वर्ष बाद रपटा तैयार हुआ,लोगों को लगा कि अब कम से कम इस बरसात में राहत मिलेगी,लेकिन बरसात ने जैसे ही रफ्तार पकड़ी,तीन दिन की लगातार बारिश ने पूरी व्यवस्था की पोल खोल दी,जिस रपटा को जनता की जीवन रेखा बताया जा रहा था,वह तेज बहाव के सामने टिक नहीं सका, अब लोग पूछ रहे हैं—यदि वैकल्पिक व्यवस्था तीन दिन की बारिश नहीं झेल सकी तो आखिर इसे बनाया किस मानक पर गया था?
दैनिक घटती-घटना ने पहले ही जता दी थी आशंका– जब रपटा बनकर तैयार हुआ था तब भी दैनिक घटती-घटना ने केवल उद्घाटन की खबर नहीं छपी थी, अखबार ने सवाल उठाया था कि यह गोबरी नदी सामान्य नदी नहीं है, क्षेत्र के पहाड़ों से उतरने वाला पानी, गोबरी जलाशय का अतिरिक्त प्रवाह और बरसात के समय तेज धारा इस नदी को बेहद उग्र बना देती है, इसी कारण अखबार ने लिखा था कि ‘इस बरसात में रपटा की सबसे बड़ी परीक्षा होगी, आज वही परीक्षा हुई और परिणाम सबके सामने है।
व्यंग्यः रपटा के साथ बह गई विभाग की ‘नाक’– गोबरी नदी इस बार केवल मिट्टी, गिट्टी और सीमेंट नहीं बहाकर ले गई,ग्रामीणों की जुबान पर एक ही तंज है की रपटा के साथ-साथ विभाग की नाक भी बह गई,एक साल तक इंतजार कर जनता को जो वैकल्पिक व्यवस्था दी गई थी, वह तीन दिन की बारिश में ही जवाब दे गई, अब सवाल यह नहीं है कि रपटा बहा या नहीं, सवाल यह है कि क्या निर्माण की गुणवत्ता भी पानी में बह गई?
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