विशेष रिपोर्ट
अंबिकापुर/रायपुर,19 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका केवल सरकारी प्रेस विज्ञप्तियां प्रकाशित करना नहीं है,बल्कि जनहित से जुड़े मामलों में सवाल पूछना भी है,विशेषकर तब, जब मामला सरकारी नियुक्तियों,वरिष्ठता,पदोन्नति और प्रशासनिक पारदर्शिता से जुड़ा हो,खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग में वर्ष 2015 की सीधी भर्ती, वर्ष 2016 की नियुक्तियों,वरिष्ठता सूची और पदोन्नति को लेकर प्रकाशित समाचारों के बाद दैनिक घटती-घटना के संपादक को 25 जून 2026 को 50 लाख रुपये की मानहानि का कानूनी नोटिस भेजा गया है,नोटिस में समाचारों को मानहानिकारक बताते हुए उन्हें हटाने, सार्वजनिक माफी प्रकाशित करने और 50 लाख रुपये क्षतिपूर्ति देने की मांग की गई है,लेकिन यह नोटिस जितना पढ़ा जाता है,उससे कहीं अधिक नए प्रश्न सामने आते हैं,ये प्रश्न केवल नोटिस तक सीमित नहीं हैं,बल्कि पूरी नियुक्ति प्रक्रिया, शिकायतों,जांच,विभागीय पारदर्शिता और पत्रकारिता की संवैधानिक भूमिका से जुड़े हैं।
पहला सवाल-क्या खबर किसी व्यक्ति पर थी या पूरी नियुक्ति प्रक्रिया पर?
सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि प्रकाशित समाचारों का विषय किसी अधिकारी का निजी जीवन नहीं था,समाचारों में प्रश्न उस नियुक्ति प्रक्रिया पर उठाए गए थे जिसके आधार पर विभाग में नियुक्ति हुई,बाद में वरिष्ठता तय हुई और फिर पदोन्नति दी गई,समाचारों में प्रकाशित नाम किसी निजी स्रोत से प्राप्त नहीं थे,बल्कि उसी विभागीय सूची का हिस्सा थे जिस पर सवाल उठाए गए थे,ऐसे में प्रश्न यह उठता है कि यदि पूरी सूची पर सवाल था,तो उसे केवल दो अधिकारियों की व्यक्तिगत मानहानि के रूप में क्यों प्रस्तुत किया गया? क्या पूरी भर्ती प्रक्रिया पर सवाल उठाना और उसमें शामिल नामों का उल्लेख करना स्वतः किसी व्यक्ति को बदनाम करना माना जाएगा, या यह सार्वजनिक अभिलेखों पर आधारित रिपोर्टिंग का हिस्सा हो सकता है?
दूसरा सवाल – क्या नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर शिकायतें हुई थी?-
यह पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है, क्या वर्ष 2015 की भर्ती और वर्ष 2016 की नियुक्तियों को लेकर विभाग के समक्ष शिकायतें प्रस्तुत की गई थी? यदि शिकायतें हुई थीं, तो उन्हें किस अधिकारी ने प्राप्त किया? क्या उन शिकायतों पर कोई प्रारंभिक जांच हुई? क्या किसी सक्षम अधिकारी ने तथ्य परीक्षण कराया? यदि जांच हुई तो उसका निष्कर्ष क्या रहा? यदि शिकायतें पूरी तरह निराधार थीं,तो क्या विभाग ने कभी सार्वजनिक रूप से यह कहा कि सभी नियुक्ति नियमों के अनुरूप हैं? यदि जांच अभी भी लंबित है, तो उसका वर्तमान स्वरूप क्या है? इन प्रश्नों का उत्तर नोटिस में नहीं मिलता।
तीसरा सवाल – यदि जांच हुई तो उसकी रिपोर्ट कहां है?
प्रशासनिक व्यवस्था में किसी भर्ती की नियुक्ति पर शिकायत होने के बाद सामान्यतः तथ्य परीक्षण या जांच की प्रक्रिया अपनाई जाती है, यदि इस मामले में भी ऐसा हुआ, तो जांच अधिकारी कौन थे? किस स्तर पर जांच हुई? क्या संबंधित अभिलेखों का परीक्षण हुआ? क्या सभी उम्मीदवारों के दस्तावेज पुनः देखे गए? क्या कोई जांच प्रतिवेदन तैयार हुआ? यदि हुआ, तो क्या वह सार्वजनिक किया गया? यदि जांच में सब कुछ सही पाया गया, तो वही रिपोर्ट सबसे मजबूत उत्तर हो सकती थी, फिर सवाल उठता है कि जांच रिपोर्ट के बजाय सीधे मानहानि का नोटिस क्यों?
चौथा सवाल – क्या अधिवक्ता ने मूल अभिलेखों का परीक्षण किया?
नोटिस में विस्तार से लिखा गया है कि संबंधित अधिकारी वर्ष 2015 की सीधी भर्ती परीक्षा से चयनित हुए,विस्तृत दस्तावेज सत्यापन के बाद वर्ष 2016 में नियुक्ति मिली और बाद में नियमों के अनुसार पदोन्नति प्राप्त हुई,लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि क्या अधिवक्ता ने स्वयं मूल चयन सूची, आवेदन पत्र,पात्रता प्रमाणपत्र,दस्तावेज सत्यापन रिकॉर्ड,नियुक्ति फाइल,विभागीय टिप्पणियां देखें? या यह विवरण केवल मुवक्किल से प्राप्त जानकारी के आधार पर नोटिस में शामिल किया गया? यदि दस्तावेज इतने स्पष्ट हैं, तो उन्हें सार्वजनिक करने में संकोच क्यों?
पांचवां सवाल – समाचार का कौन-सा तथ्य गलत था?
नोटिस में समाचारों को मानहानिकारक बताया गया है, लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि समाचार की कौन-सी पंक्ति तथ्यात्मक रूप से गलत थी? क्या किसी दस्तावेज का गलत उल्लेख किया गया? क्या किसी आदेश का गलत उद्धरण दिया गया? क्या किसी न्यायालय के आदेश को गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया? या आपत्ति केवल इस बात पर है कि समाचार में संबंधित अधिकारियों के नाम प्रकाशित हुए? यदि तथ्य गलत हैं, तो उनका बिंदुवार खंडन भी सार्वजनिक होना चाहिए।
छठा सवाल – 9 वर्ष बाद पदोन्नति का उल्लेख स्वयं नोटिस में…
नोटिस में स्वयं उल्लेख है कि संबंधित अधिकारी वर्ष 2016 से सेवा में थे और उन्हें लगभग नौ वर्ष बाद वर्ष 2025 और 2026 में पदोन्नति मिली,साथ ही सेवा नियमों का हवाला दिया गया है कि 5 वर्ष और 7 वर्ष की सेवा पूर्ण होने पर पदोन्नति की पात्रता बनती है,यह प्रश्न भी उठता है कि यदि पात्रता पहले बन गई थी और पदोन्नति बाद में हुई,तो क्या इस विषय पर विभागीय स्तर पर कोई प्रशासनिक कारण दर्ज था? यदि था,तो क्या वह भी सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है?
सातवां सवाल – क्या विभाग ने खबरों का संज्ञान लिया?
जब लगातार समाचार प्रकाशित हुए, तब क्या विभाग ने उनका संज्ञान लिया? क्या विभाग ने कहा कि समाचार गलत हैं? क्या किसी अधिकारी ने प्रेस नोट जारी किया? क्या किसी जांच समिति का गठन हुआ? क्या संबंधित मंत्रालय नियंत्रक कार्यालय ने कोई स्पष्टीकरण जारी किया? यदि नहीं,तो क्यों?
आठवां सवाल – पत्रकार पर लगाए गए गंभीर आरोपों का आधार क्या है?
नोटिस में पत्रकार पर दुर्भावना,पत्रकारिता के नैतिक मानकों के उल्लंघन,यहां तक कि ‘धन-आधारित पत्रकारिता’ और कुछ व्यक्तियों से मिलीभगत जैसे गंभीर आरोप लगाए गए हैं, यदि ऐसे आरोप लगाए गए हैं, तो क्या उनके समर्थन में कोई दस्तावेज, कोई शिकायत, कोई जांच या कोई साक्ष्य भी है? यदि है,तो उसे सार्वजनिक किया जाना चाहिए।
नौवां सवाल – क्या सरकारी अधिकारी व्यक्तिगत रूप से नोटिस भेज सकते हैं?
नोटिस भेजने वाले दोनों व्यक्ति वर्तमान में शासकीय सेवा में कार्यरत अधिकारी हैं,यह प्रश्न भी चर्चा का विषय है कि यह नोटिस पूरी तरह उनकी व्यक्तिगत क्षमता में भेजा गया है या किसी विभागीय अनुमति अथवा विधिक परामर्श की औपचारिक प्रक्रिया के बाद,यदि यह निजी मानहानि का दावा है,तो यह उनका संवैधानिक अधिकार है। यदि इसमें विभागीय अभिलेखों और आधिकारिक पद का व्यापक उपयोग हुआ है,तो उसकी प्रकृति पर भी स्पष्ट आवश्यक है।
दसवां सवाल – पत्रकार सवाल पूछे या नहीं?
यदि किसी सरकारी भर्ती,नियुक्ति,वरिष्ठता या पदोन्नति को लेकर शिकायत होती है…यदि मामला न्यायालय तक पहुंचता है…यदि विभागीय आदेशों और अभिलेखों पर प्रश्न उठते हैं…तो क्या पत्रकार उन पर सवाल पूछे या नहीं? भारतीय संविधान का अनुच्छेद 19(1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। यह स्वतंत्रता निरंकुश नहीं है,लेकिन जनहित से जुड़े मामलों पर तथ्यपरक रिपोर्टिंग और प्रश्न पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। साथ ही, प्रतिष्ठा की रक्षा का अधिकार भी महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में संतुलन का निर्धारण अंततः तथ्यों और कानून के आधार पर होता है।
सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी है…
इस पूरे विवाद का सबसे बड़ा प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है क्या नियुक्ति प्रक्रिया पर उठे सवालों का जवाब दस्तावेजों,जांच रिपोर्ट और तथ्यात्मक स्पष्टीकरण से दिया जाएगा,या केवल मानहानि के नोटिसों के माध्यम से? यदि नियुक्तियां पूरी तरह नियमों के अनुरूप हैं, तो विभागीय रिकॉर्ड,जांच प्रतिवेदन और आधिकारिक स्पष्टीकरण सार्वजनिक होने चाहिए,इससे न केवल संबंधित अधिकारियों की प्रतिष्ठा मजबूत होगी,बल्कि जनसामान्य का विश्वास भी बढ़ेगा, दूसरी ओर,यदि पत्रकारिता ने कोई तथ्यात्मक त्रुटि की है,तो उसका उत्तर भी तथ्यों और दस्तावेजों के माध्यम से सामने आना चाहिए। यही लोकतंत्र विमर्श का स्वस्थ तरीका है।
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