रायपुर,18 जुलाई 2026। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की नवीनतम रिपोर्ट ने छत्तीसगढ़ की पंचायती राज व्यवस्था और स्थानीय स्वशासन की वित्तीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। कैग की यह रिपोर्ट राज्य में जमीनी स्तर पर विकास कार्यों के क्रियान्वयन, प्रशासनिक दक्षता और वित्तीय अनुशासन की पोल खोलती है। रिपोर्ट के अनुसार,पंचायतों में भारी कर्मचारी कमी,समय पर फंड न मिलना और निगरानी तंत्र का पूरी तरह विफल होना राज्य के विकास में सबसे बड़ी बाधा बन गया है। यह रिपोर्ट प्रशासनिक गलियारों में हलचल पैदा करने के साथ ही भविष्य के लिए एक कड़ी चेतावनी भी है।
61′ रिक्त पदों से ठपप पड़ा प्रशासनिक कामकाज…
कैग की रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला पहलू पंचायतों में व्याप्त प्रशासनिक शून्यता है। रिपोर्ट के आंकड़ों के अनुसार,प्रदेश की पंचायतों में स्वीकृत कुल पदों में से 61 प्रतिशत पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इन रिक्तियों के कारण पंचायत कार्यालयों में रोजमर्रा का काम ठप होने की स्थिति में है। जब पदों पर उपयुक्त कर्मचारी ही नहीं होंगे, तो सरकारी योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक कैसे पहुंचेगा? यह स्थिति न केवल योजनाओं की गति को धीमा कर रही है, बल्कि जवाबदेही तय करने में भी बड़ी बाधा उत्पन्न कर रही है। रिपोर्ट ने सरकार को स्पष्ट निर्देश दिया है कि इन पदों को जल्द भरा जाए ताकि कामकाज पटरी पर आ सके।
वित्तीय अनियमितताएं और फंड की भारी कमी…
वित्तीय प्रबंधन के मोर्चे पर भी छत्तीसगढ़ की स्थिति चिंताजनक बताई गई है। रिपोर्ट के अनुसार,स्थानीय निकायों को राज्य और केंद्र से मिलने वाली तय राशि के मुकाबले करीब 3,243 करोड़ रुपये कम फंड जारी किए गए। फंड की इस भारी कटौती ने कई महत्वपूर्ण विकास परियोजनाओं को अधर में लटका दिया है। विकास कार्यों के लिए राशि उपलब्ध न होना ग्रामीण विकास की नींव को कमजोर करने वाला है। कैग ने सिफारिश की है कि स्थानीय निकायों को समयबद्ध तरीके से फंड उपलब्ध कराया जाए ताकि ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास न रुके। सरकार ने पंचायतों में डिजिटल पारदर्शिता लाने के उद्देश्य से ‘ई-ग्राम स्वराज’ पोर्टल लागू किया था,लेकिन रिपोर्ट में यह उजागर हुआ है कि जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
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