आज देश में सबसे चर्चित विषय महिला आरक्षण है और इसका महत्व देश के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदीजी के लेख से और अधिक हो गया है ।इसलिए यह ज़रूरी है कि इस आरक्षण के लिये हमारी तैयारी पर भी बात होना चाहिए ।
बात 1993-94 की है, जब मध्य प्रदेश में ७३वें संविधान संशोधन के बाद पहली बार पंचायती राज संस्थाओं के चुनावों की घोषणा हुई। चूँकि ये चुनाव किसी राजनीतिक दल के चुनाव चिन्ह पर नहीं होने थे, इसलिए सभी नेता अपने-अपने समर्थित उम्मीदवारों को मैदान में उतारने की तैयारी में थे।
मैंने व भोपाल सेंट्रल कोऑपरेटिव बैंक के अध्यक्ष, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अनिरूध प्रसाद शास्त्री जी ने यह निर्णय लिया कि हम भोपाल जिले की सभी पंचायतों व अन्य स्थानों में अपने प्रत्याशी खड़े करेंगे।
चुनाव की तैयारी के प्रथम चरण में जब महिला प्रत्याशियों की तलाश शुरू की तो हमें भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा क्योंकि संशोधन के कारण ३३ प्रतिशत पद महिलाओं के लिये आरक्षित तो थे ही मगर उसमें भी पिछड़ा वर्ग, अनुसूचित जाति तथा अनुसूचित जनजाति के लिए भी आरक्षण निर्धारित था। इसके चलते योग्य और इच्छुक महिला उम्मीदवारों का मिलना कठिन था।
जनपद सदस्य के लिये एक वार्ड अनुसूचित जाति की महिला के लिए आरक्षित था। जब हमने उस वार्ड के लिए मतदाता सूची में महिला प्रत्याशी की तलाश शुरू की तो समझ आया कि चयन बहुत सीमित मतदाताओं में से ही करना पड़ेगा । तब हमें अपने एक समर्थक के खेत में काम करने वाली आठवीं पास युवा महिला—आशा मिली ।
जब हमने उस युवती के सामने चुनाव लड़ने का प्रस्ताव रखा उसने आश्चर्य के साथ बस इतना ही कहा जैसा भैय्या बोलें मगर उसका अगला सवाल था – रोज़ी रोटी का क्या होगा और करना क्या पड़ेगा ? हमने उसे बताया कि चुनाव में लोगों से वोट मांगना होगा और जीतने के बाद जनपद सदस्य के रूप में जनता के लिए काम करना होगा। वहीं मेरे समर्थक ने उसे नौकरी चलते रहे का आश्वासन दिया । अपने पति से बातचीत कर वह चुनाव के लिए तैयार हो गई । उसके नामांकन के बाद चुनाव प्रचार के दौरान मैंने उसे वोट माँगते समय उसमें आ रहे बदलाव को क़रीब से महसूस किया और इस बदलाव की छलक एक छोटी-सी आम सभा में देखी । हम सभी का मानना था कि वह भाषण नहीं देगी मगर उसने सबको ग़लत साबित करते हुऐ भाषण दिया और ऐसा बोला कि देर तक तालियाँ बजती रहीं । उसने बहुत ही सरल, लेकिन आत्मविश्वास से भरे शब्दों में कहा— मैं इसी गाँव की बेटी हूँ। जब मैं यहाँ से निकलती थी, तो मेरे पैर मिट्टी में सन जाते थे। अगर मैं चुनाव जीती तो मेरी कोशिश होगी कि अब गाँव में किसी भी बेटी के पैर मिट्टी में नहीं सने।ज्ज् उसके ये शब्द वहाँ उपस्थित हर व्यक्ति के मन में गहराई तक उतर गए थे । मैंने उस कम शिक्षित, मजदूर आशा को आशा देवी बनने की यात्रा को क़रीब से देखा । मैं एक साधारण महिला को राजनेता बनते देख रहा था और यह इसलिए हो रहा था क्योंकि मुक़ाबले में महिलायें ही थी। वह चुनाव तो हार गई मगर चुनाव लड़ने से उसमें जो आत्मविश्वास पैदा हुआ उसने एक महिला नेत्री को जन्म दिया ।वह इससे आगे के चुनाव लड़ने की ख्वाहिश होने के बावजूद भी पिछड़ गई, मैं आज जब पूरे हालात का विश्लेषण करता हूँ तो मुझे लगता है कि यदि उसे पुरुष नेताओं के साथ संघर्ष नहीं करना होता तो शायद वह आज कम से कम जिला स्तर पर तो काम कर रही होती ।
यह एक महिला के नेता बनने और फिर गुमनाम होने की कहानी नहीं है बल्कि प्रतिभा, संकल्प और उर्जा से भरीं लाखों महिलाओं की बात है । पिछले तीस-पैंतीस सालों में जब से महिला सशक्तिकरण के लिये लोकसभा-विधानसभा में महिला आरक्षण की माँग उठी है तब लेकर अब तक सार्वजनिक क्षेत्र की कई संस्थायें जैसे स्थानीय निकायों, पंचायती राज संस्थाओं, सहकारिता , कारपोरेट, कानूनी संस्थाएं और अन्य संगठनों में महिलाओं को जो आरक्षण मिला, उसने देश की राजनीति में महिलाओं की भागीदारी को एक नई दिशा दी है।
महिला आरक्षण के कारण लाखों महिलाओं ने विभिन्न पदों पर काम करके प्रशासनिक व चुनावी अनुभव प्राप्त कर लिया है ।आज देश का कोई ऐसा सार्वजनिक मंच नहीं है जहाँ महिलाएँ नेतृत्व नहीं कर रही हो ।
जिस चुनाव का मैंने ज़िक्र किया है उसे बीते लगभग पैंतीस वर्ष बीत चुके हैं मगर आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ विश्वास से भर जाता हूँ कि हमारी आबादी का पचास प्रतिशत अब क़ानून बनाने के लिये पूरी तौर से तैयार है, इसलिए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिये अन्तिम कदम उठाने में देरी करना ठीक नहीं हैं क्योंकि आज देश की महिलाएँ न केवल जागरूक हैं, बल्कि राजनीतिक रूप से परिपक्व भी हो चुकी हैं। ऐसे में यह स्वाभाविक है कि उन्हें देश के सर्वोच्च नीति-निर्माण मंचों पर कानून बनाने का भी समान अवसर मिलना चाहिए।
सालों की लंबी बहस के बाद आखिरकार वह ऐतिहासिक क्षण सितंबर २०२३ में आया जब हमारी संसद ने लम्बी सार्थक बहस के बाद १०६वें संविधान संशोधन को मंज़ूरी देते हुए महिला आरक्षण विधेयक पारित किया । इस कानून के तहत अब लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में ३३ प्रतिशत आरक्षण सुनिश्चित किया गया है।
हम सब जानते है कि आज तक देश में बने क़ानूनों मे पुरुषों की भागीदारी अधिक रही है फलस्वरूप क़ानूनों में पुरुष सोच का वर्चस्व रहा है जो कि स्वाभाविक है। यही कारण रहा कि महिलाओं से जुड़े कई महत्वपूर्ण कानून समय पर नहीं बन सके। इसके चलते हमारे लोकतंत्र में अनेक ऐसी योग्य महिलाओं अवसरों से वंचित रह गई , जो उत्कृष्ट नेतृत्व दे सकती थीं ।
अब यह कानून उस ऐतिहासिक कमी को दूर करने की दिशा में एक निर्णायक कदम है। इसके माध्यम से महिलाओं को यह संवैधानिक अधिकार मिलेगा कि वे उन सीटों से चुनाव लड़ सकें, जो उनके लिए आरक्षित होंगी। इससे न केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ेगी, बल्कि देश के लोकतंत्र में एक नई ऊर्जा और संतुलन स्थापित होगा ।
देश में एनडीए सरकार के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी लगातार इस बात पर बल देते रहे हैं कि महिलाओं को आरक्षण बहुत पहले मिल जाना चाहिए था मगर उनका स्पष्ट मानना है कि इसमें और देरी स्वीकार नहीं है । उन्होंने नारी शक्ति को लोकतंत्र में पूर्ण अवसर देने का संकल्प लेते हुए हर हाल में इस विधेयक को लागू करने की प्रतिबद्धता समय समय पर व्यक्त की है।
यही कारण है कि अब यह विश्वास मजबूत होता जा रहा है कि वर्ष २०२९ के लोकसभा चुनावों में हम ३३ प्रतिशत आरक्षण के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं को संसद में देख सकेंगे।
यह सत्य है कि यह संशोधन जनगणना और परिसीमन की प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है, लेकिन जिस दृढ़ता और प्रतिबद्धता के साथ इस दिशा में प्रयास हो रहे हैं, उससे यह स्पष्ट है कि अब वह दिन दूर नहीं जब भारत की महिलाएँ संसद में बैठकर देश के कानून निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाएँगी।
यह केवल एक राजनीतिक परिवर्तन नहीं होगा, बल्कि यह भारत के लोकतंत्र में समानता, प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय के एक नए युग की शुरुआत होगी । इस में राजनीति देखने वाले लोगों को खुद से यह प्रश्न करना चाहिए कि ऐसा करके वह लोकतंत्र को मजबूत करने की ओर अग्रसर देश की गति को धीमा क्यूँ करना चाहते है ?
बृजमोहन श्रीवास्तव
राष्ट्रीय महासचिव एवं मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी
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