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लेख@ क्या लोकतंत्र में जवाबदेही मर रही है?

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सत्ता,प्रशासन,न्यायपालिका और मीडिया के बीच भरोसे का संकट आखिर क्यों गहराता जा रहा है?
क्या जनता सिर्फ वोट बैंक बनकर रह गई है या लोकतंत्र की असली मालिक होने का सम्मान अब भी बचा है?

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है,इस लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत न संसद है,न सरकार,न न्यायपालिका और न ही मीडिया,इसकी सबसे बड़ी ताकत है—जनता का विश्वास,यदि यह विश्वास कमजोर पड़ने लगे,तो लोकतंत्र की इमारत बाहर से चाहे जितनी मजबूत दिखाई दे,भीतर से खोखली होने लगती है।
आज देश के अनेक हिस्सों में एक सवाल बार-बार सुनाई देता है क्या लोकतंत्र में बैठे लोग बेशर्म हो चुके हैं? यह सवाल कठोर है,लेकिन इसे केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया कहकर खारिज नहीं किया जा सकता,जब आम नागरिक अपनी छोटी-सी समस्या लेकर महीनों सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटता है,जब किसानों की फसल बर्बाद हो जाती है और मुआवजा नहीं मिलता,जब गरीब इलाज के अभाव में दम तोड़ देता है, जब भ्रष्टाचार की खबरें रोज सुर्खियां बनती हैं और कार्रवाई वर्षों तक फाइलों में कैद रहती है,तब यह सवाल स्वतः पैदा होता है।
क्या सत्ता सेवा का माध्यम है या विशेषाधिकार का लाइसेंस?
लोकतंत्र में जनता अपने प्रतिनिधियों को राजा बनाने के लिए नहीं,बल्कि सेवक बनाने के लिए चुनती है,संविधान में कहीं नहीं लिखा कि चुनाव जीतने के बाद पांच वर्षों तक जनता केवल तमाशा देखे और सत्ता में बैठे लोग मनमानी करें,लेकिन आज कई बार ऐसा महसूस होता है कि चुनाव जीतने के बाद जवाबदेही का स्थान अहंकार ले लेता है,जनता की शिकायतें फाइल में,जनप्रतिनिधि कार्य क्रमों में और अधिकारी मीटिंगों में व्यस्त दिखाई देते हैं,ऐसा लगता है कि व्यवस्था का मौन संदेश यही है की पांच साल के लिए जनादेश मिला है, अब पांच साल तक जो करना है करेंगे, क्या लोकतंत्र का अर्थ यही रह गया है?
क्या पैसा और पावर ही नया संविधान बन गए हैं?
एक फिल्म का प्रसिद्ध संवाद है अगर इस देश में रहना है तो आदमी के पास या तो बेहिसाब पैसा होना चाहिए या फिर पावर,यह संवाद फिल्मों के लिए लिखा गया था,लेकिन जब आम नागरिक अपनी वास्तविक जिंदगी में भी ऐसा महसूस करने लगे,तब चिंता स्वाभाविक है,क्या बिना सिफारिश के काम होना मुश्किल हो गया है? क्या बिना प्रभावशाली पहचान के न्याय मिलना कठिन होता जा रहा है? क्या गरीब और साधारण नागरिक की आवाज़ उतनी प्रभावशाली नहीं रही जितनी संविधान ने उसे दी थी? यदि इन प्रश्नों के उत्तर समाज में बड़ी संख्या में लोग हाँ में देने लगें,तो यह लोकतंत्र के लिए खतरे की घंटी है।
राजनीति की भाषा ही बदल गई है…
कभी राजनीति सेवा,संघर्ष और विचारधारा का माध्यम मानी जाती थी,आज राजनीति का बड़ा हिस्सा चुनावी गणित,सोशल मीडिया प्रबंधन, जातीय समीकरण,प्रचार और सत्ता प्रबंधन तक सीमित दिखाई देता है, जनता अब विकास से पहले प्रचार देखती है,काम से पहले विज्ञापन दिखाई देता है,घोषणाएं पहले होती हैं, क्रियान्वयन बाद में,और कई बार क्रियान्वयन कभी होता ही नहीं।
प्रशासन क्या जनता का है या फाइलों का?
सरकारी दफ्तरों का उद्देश्य नागरिकों की समस्याओं का समाधान करना है, लेकिन आम आदमी का अनुभव अक्सर इसके विपरीत होता है,एक प्रमाण पत्र के लिए कई चक्कर,एक
शिकायत पर महीनों इंतजार,एक आवेदन पर अंतहीन प्रक्रिया, दूसरी ओर प्रभावशाली व्यक्ति का काम कुछ घंटों में पूरा हो जाता है, यदि कानून और व्यवस्था सभी के लिए समान नहीं दिखती, तो लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।
न्याय में देरी,न्याय से दूरी…
भारत की न्यायपालिका लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ मानी जाती है, लेकिन लाखों लंबित मुकदमे,वर्षों तक चलने वाली सुनवाई और न्याय पाने की लंबी प्रक्रिया आम नागरिक को निराश करती है,लोकतंत्र में न्याय केवल होना नहीं चाहिए,बल्कि समय पर होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए,जब न्याय बहुत देर से मिलता है,तो कई लोगों के लिए उसका महत्व कम हो जाता है।
मीडिया भी सवालों के घेरे में…
लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया है, उसका काम सत्ता की प्रशंसा नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है,मीडिया का उद्देश्य विपक्ष बनना भी नहीं है, बल्कि जनता की आवाज़ बनना है, लेकिन आज मीडिया पर भी पक्षपात, व्यावसायिक दबाव,राजनीतिक प्रभाव और टीआरपी आधारित पत्रकारिता के आरोप लगते हैं,हालांकि यह भी उतना ही सच है कि आज भी देश में हजारों पत्रकार अपनी जान जोखिम में डालकर जनहित की पत्रकारिता कर रहे हैं, कुछ लोगों की गलतियां पूरे मीडिया की पहचान नहीं हो सकतीं।
क्या जनता भी पूरी तरह निर्दोष है?
हर गलती केवल सरकार,प्रशासन या नेताओं की नहीं होती,जनता भी कई बार अपनी जिम्मेदारियों से पीछे हट जाती है, चुनाव में जाति,धर्म,लालच या व्यक्ति गत लाभ के आधार पर मतदान, सड़क पर गंदगी फैलाना,भ्रष्टाचार को सुविधा शुल्क कहकर स्वीकार करना, गलत को देखकर चुप रहना,लोकतंत्र केवल अधिकारों से नहीं चलता, कर्तव्यों से भी चलता है।
भरोसे का संकट सबसे बड़ा संकट
आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती आर्थिक नहीं है,सबसे बड़ा संकट भरोसे का है,जनता को प्रशासन पर भरोसा कम हो रहा है, प्रशासन को जनता पर भरोसा कम हो रहा है,राजनीति पर भरोसा घट रहा है,मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं, संस्थाओं पर अविश्वास बढ़ रहा है, जब समाज में भरोसा कमजोर होता है,तब केवल कानून व्यवस्था नहीं,पूरी लोकतांत्रिक संस्कृति प्रभावित होती है।
समाधान क्या है?
समाधान केवल सरकार बदलने में नहीं है,समाधान व्यवस्था बदलने में भी नहीं है,सबसे पहले सोच बदलनी होगी,सत्ता को सेवा मानना होगा, प्रशासन को संवेदनशील बनना होगा, न्याय समयबद्ध होना चाहिए,मीडिया को निष्पक्षता बचानी होगी,जनता को जागरूक और जिम्मेदार बनना होगा, राजनीतिक दलों को चुनावी घोषणाओं के साथ जवाबदेही भी स्वीकार करनी होगी।
लोकतंत्र का अंतिम मालिक कौन?
संविधान की शुरुआत होती है हम भारत के लोग…यहीं लोकतंत्र का सबसे बड़ा संदेश छिपा है,इस देश का मालिक कोई प्रधानमंत्री,मुख्य मंत्री,सांसद,विधायक,अधिकारी, न्यायाधीश या पत्रकार नहीं है,असली मालिक भारत की जनता है,जिस दिन सत्ता में बैठे लोग यह भूल जाते हैं कि वे जनता के सेवक हैं,और जिस दिन जनता यह भूल जाती है कि वही लोकतंत्र की असली शक्ति है—उसी दिन लोकतंत्र कमजोर होने लगता है, लोकतंत्र को बचाने के लिए केवल संविधान की रक्षा करना पर्याप्त नहीं,संवेदनशीलता,ईमानदारी, जवाबदेही और जनता के विश्वास की रक्षा करना भी उतना ही आवश्यक है,क्योंकि लोकतंत्र की असली ताकत सत्ता नहीं,जनता का विश्वास है—और यदि यही विश्वास टूट गया,तो कोई भी व्यवस्था लंबे समय तक मजबूत नहीं रह सकती।
रवि सिंह
कोरिया,छत्तीसगढ़


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