

- इरशाद अहमद की सफाई से नहीं थमे सवाल,शब्बीर आलम और राजहंस कनेक्शन पर जांच की निगाहें…
- ‘साजिश’ बताकर बचाव,लेकिन जवाब नहीं मिला…शब्बीर आलम प्रकरण में नए सवाल खड़े…
- राजहंस को बदनाम करने की साजिश या सच से बचने की कोशिश? इरशाद अहमद के बयान पर उठा नया प्रश्न
- 15 दिन बाद आई सफाई,लेकिन शहर पूछ रहा…आखिर शब्बीर आलम का नाम बार-बार क्यों जुड़ा?
- इरशाद अहमद ने मीडिया पर उठाए सवाल,लेकिन शब्बीर आलम प्रकरण में खुद कई सवालों के जवाब अधूरे…
- शब्बीर आलम से कोई रिश्ता नहीं…फिर वर्षों तक शहर में क्यों होती रही चर्चा?
- राजहंस,बैतूल और शब्बीर आलम… सफाई आई,लेकिन संदेह अभी भी कायम
- घटना हुई, एफआईआर हुई,आरोपी फरार हुए…फिर मीडिया ने आखिर क्या गलत लिखा?
- सिर्फ सफाई नहीं,जवाब चाहिए…शब्बीर आलम प्रकरण में इरशाद अहमद के बयान से बढ़े सवाल
- 15 दिन बाद सामने आए इरशाद अहमद…बोले ‘साजिश’,लेकिन शब्बीर आलम,बैतूल और राजहंस कनेक्शन पर उठते सवालों का जवाब अब भी बाकी
-संवाददाता-
अंबिकापुर,16 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। झारखंड के धनबाद स्थित चर्चित वासेपुर दोहरे हत्याकांड में आजीवन कारावास की सजा प्राप्त फरार गैंगस्टर शब्बीर उर्फ साबिर आलम के अंबिकापुर में वर्षों तक कथित रूप से रहने और बाद में झारखंड पुलिस की कार्रवाई के दौरान फरार हो जाने के मामले ने पूरे सरगुजा संभाग की कानून-व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं,इस मामले में राजहंस बस से जुड़े बैतूल खान के विरुद्ध अपराध दर्ज हो चुका है और वे भी फरार बताए जा रहे हैं,इसी बीच घटना के लगभग 15 दिन बाद ट्रांसपोर्ट कंपनी से जुड़े संचालक इरशाद अहमद पहली बार मीडिया के सामने आए और उन्होंने पूरे मामले को लेकर अपना पक्ष रखा।
इरशाद अहमद ने अपने बयान में राजहंस बस, बैतूल खान और अपनी कंपनी को निर्दोष बताते हुए पूरे घटनाक्रम को कुछ प्रतिस्पर्धी बस संचालकों की साजिश करार दिया, उन्होंने कहा कि उनकी कंपनी में शब्बीर आलम का एक रुपये का भी निवेश नहीं है और यदि ऐसा साबित हो जाए तो वे किसी भी जांच का सामना करने को तैयार हैं,लेकिन उनके बयान के बाद जितने सवाल खत्म होने चाहिए थे, उससे कहीं अधिक नए सवाल खड़े हो गए हैं।
15 दिन तक चुप्पी क्यों, अब सफाई क्यों?- घटना 29 जून की है, झारखंड पुलिस अंबिकापुर पहुंची, गैंगस्टर को पकड़ने का प्रयास हुआ, विवाद हुआ, आरोपी फरार हुआ, बाद में एफआईआर दर्ज हुई, बैतूल खान फरार बताए गए और मामला पूरे प्रदेश में चर्चा का विषय बन गया, इन सभी घटनाओं के बाद करीब 15 दिन तक कोई सार्वजनिक पक्ष सामने नहीं आया, अब जबकि पुलिस जांच आगे बढ़ रही है और पूरे मामले की चर्चा प्रदेशभर में हो रही है,तब इरशाद अहमद मीडिया के सामने आए, यही पहला प्रश्न लोगों के मन में है कि यदि शुरुआत से ही सारी बातें गलत थीं तो तत्काल सामने आकर उनका खंडन क्यों नहीं किया गया? आखिर 15 दिन बाद ही सफाई देने की आवश्यकता क्यों महसूस हुई?
राजहंस को बदनाम करने की साजिश या सवालों से बचने की कोशिश?– इरशाद अहमद ने अपने पूरे बयान में सबसे अधिक जोर इस बात पर दिया कि कुछ बस ऑपरेटर उनकी कंपनी को बदनाम करने का षड्यंत्र रच रहे हैं,उन्होंने कहा कि स्वस्थ प्रतिस्पर्धा करने के बजाय कुछ लोग मीडिया के माध्यम से उनकी छवि खराब कर रहे हैं,लेकिन लोगों का कहना है कि यदि केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा ही कारण है, तो फिर झारखंड पुलिस की कार्रवाई, एफआईआर और पूरे घटनाक्रम को कैसे नजरअंदाज किया जा सकता है? सवाल यह भी है कि यदि सब कुछ केवल साजिश है, तो पुलिस ने अपराध दर्ज क्यों किया?
सबसे बड़ा सवाल—शब्बीर आलम का नाम आखिर राजहंस से जुड़ा कैसे?- इस पूरे मामले का सबसे अहम प्रश्न आज भी यही बना हुआ है,यदि शब्बीर आलम का बैतूल खान,राजहंस बस या ट्रांसपोर्ट कंपनी से कोई संबंध नहीं था,तो वर्षों से शहर में उसका नाम राजहंस बस के साथ क्यों जोड़ा जाता रहा? बस स्टैंड पर,परिवहन व्यवसाय से जुड़े लोगों के बीच,स्थानीय मोहल्लों में और आम नागरिकों के बीच यह चर्चा क्यों होती रही कि शब्बीर आलम राजहंस बस के संचालन और देखरेख में सक्रिय रहता था? क्या यह केवल अफवाह थी? यदि हां, तो वर्षों तक इसका खंडन क्यों नहीं किया गया?
बैतूल घटना के समय छत्तीसगढ़ में नहीं थे—क्या जांच इसका जवाब देगी?- इरशाद अहमद ने दावा किया कि घटना के दिन बैतूल खान छत्तीसगढ़ में ही नहीं थे और मोबाइल लोकेशन इसकी पुष्टि कर देगी,उन्होंने कहा कि पुलिस इसकी जांच कर रही है और जांच के बाद सच्चाई सामने आ जाएगी,लेकिन दूसरी ओर यह भी तथ्य है कि पुलिस ने बैतूल खान के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की है और उसके बाद से वे फरार बताए जा रहे हैं,अब सवाल यह है कि यदि बैतूल घटना से पूरी तरह अनभिज्ञ थे तो फिर उनके विरुद्ध अपराध दर्ज क्यों हुआ?
सिर्फ निवेश का सवाल नहीं,संबंधों का भी है-इरशाद अहमद ने कहा कि यदि शब्बीर आलम का उनकी कंपनी में एक रुपये का भी निवेश साबित हो जाए तो वे कार्रवाई के लिए तैयार हैं,लेकिन पूरे मामले में केवल निवेश ही मुद्दा नहीं है,लोग यह भी जानना चाहते हैं क्या व्यक्तिगत संबंध थे? क्या नियमित संपर्क था? क्या आने-जाने का सिलसिला था? क्या कोई व्यावसायिक या सामाजिक संबंध थे? इन सवालों पर इरशाद अहमद ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया।
कंपनी की छवि बचाने की कोशिश या सच्चाई रखने का प्रयास?- उनके पूरे बयान को सुनने वाले कई लोगों का मानना है कि उनका अधिकतर ध्यान राजहंस बस और कंपनी की प्रतिष्ठा बचाने पर था,उन्होंने बार-बार कहा कि कंपनी को बदनाम किया जा रहा है,लेकिन उन्होंने यह नहीं बताया कि यदि संबंध नहीं थे तो शहर में इतने वर्षों से यह चर्चा क्यों थी?
घटना हुई या नहीं हुई?
इरशाद अहमद ने मीडिया की खबरों को कठघरे में खड़ा करते हुए कहा कि मीडिया ने गलत लिखा,लेकिन यहां भी कई प्रश्न खड़े होते हैं,क्या झारखंड पुलिस वास्तव में अंबिकापुर नहीं आई थी? क्या शब्बीर आलम को पकड़ने की कार्रवाई नहीं हुई? क्या पुलिस के सामने विवाद नहीं हुआ? क्या आरोपी फरार नहीं हुआ? यदि यह सब हुआ,तो फिर मीडिया ने ऐसा क्या गलत लिखा जिसके कारण पूरे घटनाक्रम को गलत बताया जा रहा है?
यदि मीडिया गलत थी तो जानकारी आई कहां से….?
घटना के तुरंत बाद स्थानीय लोगों,प्रत्यक्षदर्शियों और पुलिस सूत्रों के माध्यम से जो जानकारी सामने आई, वही विभिन्न समाचार माध्यमों में प्रकाशित हुई,बाद में पुलिस ने स्वयं भी अपराध दर्ज किया,ऐसे में यह प्रश्न भी उठता है कि यदि मीडिया पूरी तरह गलत थी,तो फिर मीडिया तक वही जानकारी कैसे पहुंची? क्या प्रत्यक्षदर्शियों ने झूठ बोला? क्या पूरे मोहल्ले ने गलत अफवाह फैलाई? क्या झारखंड पुलिस ने गलत जानकारी दी? या फिर वास्तविक घटनाक्रम वही था जिसकी चर्चा पूरे शहर में हुई?
क्या केवल प्रतिस्पर्धी बस संचालक ही सवाल उठा रहे हैं?
इरशाद अहमद ने कहा कि कुछ बस संचालक उनकी सफलता से परेशान हैं,लेकिन सवाल यह भी है कि क्या केवल वही लोग सवाल उठा रहे हैं? या फिर आम नागरिक,स्थानीय निवासी,मोहल्ले के लोग और पुलिस कार्रवाई देखने वाले प्रत्यक्षदर्शी भी यही प्रश्न पूछ रहे हैं? यदि पूरा शहर एक जैसी चर्चा कर रहा है तो क्या उसे केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा कहकर खारिज किया जा सकता है?
अब जवाब केवल जांच दे सकती है…
फिलहाल पूरे मामले की जांच जारी है, झारखंड पुलिस और सरगुजा पुलिस दोनों अपने-अपने स्तर पर घटनाक्रम की कडि़यां जोड़ रही हैं,बैतूल खान फरार बताए जा रहे हैं,शब्बीर आलम अब भी पुलिस की गिरफ्त से बाहर है और उसके नेटवर्क की जांच चल रही है,ऐसी स्थिति में इरशाद अहमद का बयान जांच का स्थान नहीं ले सकता,ठीक वैसे ही मीडिया में प्रकाशित आरोप भी अंतिम सत्य नहीं माने जा सकते, अब यह देखना होगा कि पुलिस तकनीकी साक्ष्यों,मोबाइल लोकेशन, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान,दस्तावेजों और उपलब्ध अन्य प्रमाणों के आधार पर किन निष्कर्षों तक पहुंचती है,लेकिन इतना तय है कि यह मामला अब केवल एक फरार गैंगस्टर का नहीं रह गया है। यह अंबिकापुर की सुरक्षा व्यवस्था,पुलिस की कार्यप्रणाली, स्थानीय नेटवर्क,ट्रांसपोर्ट कारोबार और सार्वजनिक विश्वास से जुड़ा मामला बन चुका है। जब तक इन सभी प्रश्नों के स्पष्ट उत्तर जांच के माध्यम से सामने नहीं आते, तब तक यह पूरा प्रकरण चर्चा और विवाद के केंद्र में बना रहेगा।
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