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सूरजपुर/शिवप्रसादनगर@शोहराब-साधना-हदीस की तिकड़ी से पनपता धान घोटाला

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  • शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र बना संगठित लूट का अड्डा….
  • तीन नाम,एक खेलः शिवप्रसाद नगर में धान घोटाले की तिकड़ी बेनकाब
  • धान नहीं,सिर्फ एंट्री! शोहराब-साधना-हदीस की तिकड़ी पर गंभीर आरोप
  • कागजों में 70 हजार क्विंटल,केंद्र में आधा भी नहीं—कौन बचा रहा तिकड़ी को?
  • किसान लाइन में,माफिया मलाई मेंः शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र पर बड़ा सवाल
  • एफआईआर, खबरें, सबूत… फिर भी खामोश प्रशासन, क्यों नहीं टूट रही तिकड़ी?
  • शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में संगठित भ्रष्टाचार,तिकड़ी चला रहा पूरा सिस्टम


-शमरोज खान-
सूरजपुर/शिवप्रसादनगर,09 जनवरी 2026 (घटती-घटना)।
जिला सूरजपुर शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र एक बार फिर गंभीर आरोपों और सवालों के घेरे में है, सवाल सीधा और बेहद गंभीर है जितनी धान की खरीदी हुई है और जितना धान उठ चुका है,उसके बाद क्या उतना धान वास्तव में केंद्र में मौजूद है? सूत्रों और उपलब्ध आंकड़ों पर नजर डालें तो मामला केवल लापरवाही का नहीं,बल्कि व्यवस्थित और संगठित भ्रष्टाचार की ओर इशारा करता है,शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में सामने आ रही अनियमितताएं अब किसी एक व्यक्ति या छोटी लापरवाही तक सीमित नहीं रहीं,सूत्रों और स्थानीय जानकारियों के मुताबिक,यहां शोहराब-साधना-हदीस की तिकड़ी के इर्द-गिर्द ऐसा मजबूत नेटवर्क खड़ा हो चुका है,जिसने पूरे धान खरीदी तंत्र को अपनी गिरफ्त में ले लिया है। यही तिकड़ी तय कर रही है कि कागजों में कितना धान खरीदा जाएगा, गोदाम में कितना दिखेगा और कितना चुपचाप बाजार या मिलों की ओर निकल जाएगा,शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में कथित घोटाले को लेकर जब पूर्व में विस्तृत खबर प्रकाशित की गई थी,तब यह उम्मीद जगी थी कि प्रशासन हरकत में आएगा, भौतिक सत्यापन होगा और सच्चाई सामने लाई जाएगी, लेकिन समय बीतता गया और प्रशासन की चुप्पी अब संदेह को और गहरा कर रही है, सवाल यह नहीं रह गया कि घोटाला है या नहीं,बल्कि सवाल यह है कि इतने स्पष्ट संकेतों के बावजूद प्रशासन क्यों सोया हुआ है? वर्षों से विवादों में रहे इस केंद्र को लेकर इस बार मामला केवल अनियमितता का नहीं, बल्कि हजारों क्विंटल धान के संभावित घोटाले का बनता जा रहा है,सवाल बेहद सीधा है जितनी धान की खरीदी कागजों में दिखाई जा रही है और जितना धान उठ चुका है,उसके बाद क्या उतनी मात्रा में धान वास्तव में केंद्र में मौजूद है? शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र का मामला अब स्पष्ट रूप से संगठित धान घोटाले का रूप ले चुका है,जब तक स्वतंत्र एजेंसी से स्थल-आधारित,बोरियों की गिनती सहित जांच नहीं होगी,तब तक सच सामने नहीं आएगा,यदि अब भी प्रशासन नहीं जागा,तो यह तय है कि धान माफिया बेखौफ होकर शासन की जेब काटता रहेगा और किसान यूं ही लुटता रहेगा।
आंकड़ों ने खोली पोल : उपलब्ध जानकारी और सूत्रों के अनुसार, शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र में अब तक लगभग 70,000 क्विंटल धान की खरीदी दर्शाई जा चुकी है, इसमें से 7 से 8 हजार क्विंटल धान का उठाव हो चुका है,इस स्थिति में केंद्र परिसर में करीब 60,000 क्विंटल धान का भौतिक रूप से मौजूद होना अनिवार्य है, लेकिन जमीनी सच्चाई इससे बिल्कुल अलग बताई जा रही है,सूत्रों का दावा है कि केंद्र में वास्तविक रूप से केवल 30,000 से 40,000 क्विंटल धान ही मौजूद है, यानी 20,000 से 30,000 क्विंटल धान का अंतर,जो किसी भी दृष्टि से सामान्य नहीं कहा जा सकता,इस पुरे मामले में जो धान के बोरियों के चटा को देख कर अंदाजा लगया जा सकता है।
किसान लाइन में, माफिया आराम में- जहां एक ओर किसान धान बेचने के लिए दिन-दिन भर लाइन में खड़े रहते हैं, वहीं दूसरी ओर यह तिकड़ी घर या दुकान में बैठकर तय करती है कि किसका धान खरीदा जाएगा और किसे टरकाया जाएगा, ईमानदार किसानों को नियमों का हवाला देकर लौटाया जाता है, जबकि दलालों और अपने लोगों का धान बिना अड़चन के खरीदा और खपाया जाता है।
पूर्व में खबरें, फिर भी प्रशासन खामोश- इस धान घोटाले को लेकर पहले भी खबरें प्रकाशित हो चुकी हैं। तस्वीरें, आंकड़े और जमीनी सच्चाई सामने आने के बावजूद न कोई गोदाम सील हुआ, न कोई आकस्मिक निरीक्षण हुआ, न ही बोरियों का वास्तविक मिलान प्रशासन की यह चुप्पी अब मिलीभगत की आशंका को और मजबूत कर रही है।
शासन को करोड़ों का चूना- यदि कागजों में दिखाई जा रही खरीदी और वास्तविक भंडारण में इतना बड़ा अंतर है, तो यह तय है कि सरकारी खजाने को करोड़ों रुपये का नुकसान हो रहा है, बिना धान के ही भुगतान दिखाया जा रहा है, जिससे प्रदेश की आर्थिक स्थिति पर सीधा असर पड़ रहा है।हर साल विवाद, फिर भी वही चेहरे- यह पहला मौका नहीं है जब शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र पर सवाल उठे हों, यह केंद्र लगातार सुर्खियों में बना रहता है, पहले भी यहां धान खरीदी में गड़बडç¸यों के आरोप लगे, कर्मचारियों पर एफआईआर तक दर्ज हो चुकी हैं, लेकिन इसके बावजूद उन्हीं लोगों को दोबारा जिम्मेदारी सौंप दी गई, यह स्थिति साफ तौर पर प्रशासनिक लापरवाही या फिर किसी संगठित संरक्षण की ओर इशारा करती है।
भौतिक सत्यापन क्यों नहीं?- सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि इतनी बड़ी मात्रा में धान की कमी के आरोपों के बावजूद अब तक कोई ठोस भौतिक सत्यापन नहीं किया गया, सूत्रों का दावा है कि प्रशासनिक जांच केवल फोन पर पूछताछ तक सीमित है, यह सवाल लाजिमी है कि क्या प्रशासन के पास मौके पर जाकर बोरियों की गिनती करने का समय नहीं है? क्या जांच के लिए पर्याप्त टीम नहीं है? या फिर जानबूझकर आंखें मूंद ली गई हैं?
प्रशासन और विपणन तंत्र पर संदेह- सूत्र यह भी दावा कर रहे हैं कि धान खरीदी केंद्र का पूरा तंत्र प्रशासन और विपणन व्यवस्था के साथ मिलकर काम कर रहा है, इसी वजह से शासन को मजबूरी में कागजों में दिखाई गई धान खरीदी के आधार पर वास्तविक धान की मौजूदगी की पुष्टि किए बिना भुगतान करना पड़ रहा है, इसका सीधा असर प्रदेश की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है। शासन पर अनावश्यक वित्तीय बोझ बढ़ रहा है, जबकि वास्तविक लाभ न तो किसानों को मिल रहा है और न ही व्यवस्था को, शिवप्रसाद नगर धान खरीदी केंद्र का मामला केवल एक केंद्र तक सीमित नहीं है, यह पूरे धान खरीदी तंत्र की पोल खोलने वाला उदाहरण बनता जा रहा है, यदि प्रशासन और शासन वास्तव में किसानों और प्रदेश की भलाई चाहते हैं, तो मजबूर किसानों को परेशान करने के बजाय इन धान खरीदी केंद्रों की सख्त, निष्पक्ष और स्थल पर जाकर जांच कराई जाए, वरना यह साफ है कि धान माफिया, प्रशासनिक संरक्षण में शासन की जेब पर डाका डालता रहेगा, और हर साल यही सवाल यूं ही गूंजते रहेंगे।
तिकड़ी का कामकाज : कौन क्या संभालता है सूत्र बताते हैं कि यह घोटाला सुनियोजित तरीके से चलाया जा रहा है—
शोहराब पर आरोप है कि वह धान की खरीदी, ट्रांसपोर्ट और बाहर जाने वाले धान की दिशा तय करता है।
साधना की भूमिका कागजी प्रबंधन, एंट्री और भुगतान प्रक्रिया में बताई जा रही है।
हदीस पर आरोप है कि वह स्थानीय स्तर पर किसानों, कर्मचारियों और बिचौलियों को मैनेज कर पूरे खेल को बिना शोर-शराबे के चलवाता है तीनों की मिलीभगत से केंद्र का प्रबंधन, समिति और निचला अमला पूरी तरह पंगु हो चुका है।
सवाल जो अब टाले नहीं जा सकते
क्या शोहराब–साधना–हदीस की तिकड़ी को किसी का संरक्षण प्राप्त है?
क्या प्रशासन जानबूझकर आंखें मूंदे बैठा है?
क्या जांच केवल फाइलों तक सीमित रहेगी?


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