यूपी, 07 अक्टूबर 2022। वाराणसी की जिला कोर्ट ने ज्ञानवापी मस्जिद परिसर मे मिले कथित शिवलिग की कार्बन डेटिग पर फैसला टाल दिया है. अब इस मामले मे कोर्ट 11 अक्टूबर को फैसला सुनाएगी. ज्ञानवापी सर्वे के दौरान वजूखाने मे शिवलिग की तरह की आकृति मिली थी जिसके हिदू पक्ष ने विश्वेश्वर शिवलिग होने का दावा किया था. कोर्ट की कार्यवाही से पहले भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया था. इस दौरान कोर्ट मे दोनो पक्ष के लोग मौजूद थे. हिदू पक्ष की ओर से ज्ञानवापी-श्रृगार गौरी मामले मे चारो वादी महिलाए और उनके वकील विष्णु शकर जैन और हरिशकर जैन कोर्ट मे पहुचे थे. इसके अलावा सराकरी वकील महेद्र प्रसाद पाडेय भी जिला जज के न्यायालय मे मौजूद थे.
जिला कोर्ट के फैसले से पहले हिदू पक्ष के वकील विष्णु जैन ने कहा कि हमने कार्बन डेटिग की माग शिवलिग के लिए नही की है. हमने माग की है कि ्रस्ढ्ढ की एक्सपर्ट कमेटी से इसकी जाच की जाए. यह शिवलिग कितना पुराना है, यह शिवलिग है या फव्वारा है. शिवलिग के आसपास अगर कुछ कार्बन के पार्टिकल्स मिले तो उसकी जाच की जा सकती है, लेकिन हमारी माग सिर्फ एक विशेषज्ञ कमेटी बनाकर इसकी जाच करने की है।
ज्ञानवापी को लेकर विवाद क्या है?
जिस तरह से अयोध्या मे राम मदिर और बाबरी मस्जिद का विवाद था, ठीक वैसा ही ज्ञानवापी मस्जिद और काशी विश्वनाथ मदिर का विवाद भी है. स्कद पुराण मे उल्लेखित 12 ज्योतिर्लिगो मे से काशी विश्वनाथ को सबसे अहम माना जाता है.
1991 मे काशी विश्वनाथ मदिर के पुरोहितो के वशज पडित सोमनाथ व्यास, सस्कृत प्रोफेसर डॉ. रामरग शर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता हरिहर पाडे ने वाराणसी सिविल कोर्ट मे याचिका दायर की.
याचिका मे दावा किया कि काशी विश्वनाथ का जो मूल मदिर था, उसे 2050 साल पहले राजा विक्रमादित्य ने बनाया था. 1669 मे औरगजेब ने इसे तोड़ दिया और इसकी जगह ज्ञानवापी मस्जिद बनवा दी. इस मस्जिद को बनाने मे मदिर के अवशेषो का ही इस्तेमाल किया गया.
हिदू पक्ष की माग है कि यहा से ज्ञानवापी मस्जिद को हटाया जाए और पूरी जमीन हिदुओ को सौपी जाए।
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