
- मौत के बाद केसीसी ऋण, शिकायत के बाद रकम जमा! सोनपुर समिति में सहकारिता का कैसा हिसाब-किताब?
- मृत किसान के नाम पर ऋण का खेल? शिकायत के बाद रु. 1.29 लाख…फिर रु. 69,175 जमा
- पहले शिकायत,फिर रकम जमा,दोबारा शिकायत तो फिर भुगतान! सोनपुर समिति के हिसाब पर सवाल
- मृत्यु के बाद ऋ ण स्वीकृति, भुगतान के दस्तावेज और शिकायत वापसी पर सवाल-सोनपुर समिति में आखिर चल क्या रहा है?
- किसान की मौत के बाद केसीसी ऋण,दो बार शिकायत और दो बार रकम जमा—सहकारिता विभाग की जांच कहां है?
- खाते में पैसा जमा,पर सवाल बरकरार! मृत किसान के केसीसी ऋण और शिकायत वापसी के हस्ताक्षरों पर संदेह
- सोनपुर समिति का अजब हिसाब,मृत किसान के नाम पर ऋ ण,शिकायत के बाद भुगतान,अब हस्ताक्षरों की जांच की मांग
- शिकायत से पहले कार्रवाई क्यों नहीं? मृत किसान के ऋ ण मामले में दो बार रकम जमा होने पर उठे सवाल
- मृत किसान के नाम पर ऋ ण से लेकर शिकायत वापसी तक सवाल ही सवाल—सोनपुर समिति की निष्पक्ष जांच की मांग…
- क्या रकम जमा होते ही खत्म हो जाती है वित्तीय अनियमितता?सोनपुर समिति प्रकरण ने खड़े किए गंभीर सवाल
-ओेंकार पाण्डेय-
सूरजपुर/भैयाथान,25 अक्टूबर 2026 (घटती-घटना)। सहकारिता विभाग की व्यवस्था में यदि सब कुछ नियमों के मुताबिक चल रहा है,तो फिर एक मृत किसान के नाम पर दर्ज ऋ ण का हिसाब शिकायतों के साथ बार-बार क्यों बदलता दिखाई दे रहा है? यदि ऋ ण सही था,तो शिकायतकर्ता को बकाया जमा करने के नोटिस के बाद आपत्ति क्यों उठानी पड़ी? और यदि शिकायतकर्ता का आरोप गलत था तो शिकायत के बाद ऋ ण खाते में बड़ी रकम जमा करने की जरूरत क्यों पड़ी? यही वे सवाल हैं,जिनका जवाब आदिम जाति सेवा सहकारी समिति मर्यादित सोनपुर,पंजीयन क्रमांक 580 और जिला सहकारी केंद्रीय बैंक की भैयाथान शाखा से जुड़े प्रकरण में तलाशा जाना चाहिए।
मामला स्वर्गीय हरिप्रसाद के नाम पर कथित रूप से स्वीकृत किसान क्रेडिट कार्ड KCC ) ऋ ण से जुड़ा है,उनके पुत्र देवी प्रसाद का आरोप है कि पिता की मृत्यु के बाद उनके नाम पर ऋ ण स्वीकृत हुआ और राशि का भुगतान भी दर्ज किया गया,वर्षों बाद जब समिति की ओर से बकाया ऋ ण जमा करने का नोटिस मिला, तब उन्हें कथित ऋ ण की जानकारी हुई,उन्होंने 22 जुलाई 2024 को कलेक्टर सूरजपुर के जनदर्शन में शिकायत की,शिकायतकर्ता के अनुसार, इसके बाद 26 जुलाई 2024 को 1,29,000 जमा किए गए और शिकायत वापसी का दस्तावेज सामने आया,कहानी का दूसरा अध्याय अक्टूबर 2026 में सामने आया, शिकायतकर्ता ने 15 अक्टूबर को दोबारा शिकायत की। उनका आरोप है कि इसके बाद उन्हें भैयाथान बैंक शाखा ले जाकर ऋ ण जमा पर्ची पर हस्ताक्षर कराने का दबाव बनाया गया, फिर 17 अक्टूबर को 69,175 जमा होने का दस्तावेज सामने आया और 21 अक्टूबर को उच्च कार्यालय को शिकायत वापसी का पत्र भेजे जाने की जानकारी मिली, शिकायतकर्ता अब उस पत्र और जमा पर्ची पर दर्ज हस्ताक्षरों की प्रामाणिकता पर सवाल उठा रहे हैं, यानी एक शिकायत,फिर रकम जमा; दोबारा शिकायत,फिर रकम जमा,अब प्रश्न यह है कि क्या सहकारिता व्यवस्था में शिकायत का समाधान जांच से होता है या खाते में रकम जमा कर देने से फाइल को राहत मिल जाती है? यह व्यंग्यात्मक सवाल जरूर है,लेकिन इसका वास्तविक उत्तर दस्तावेजों और निष्पक्ष जांच से ही मिल सकता है।
10 मई को किसान की मृत्यु, जून में फण स्वीकृति-तारीखों का हिसाब कौन समझाएगा?
शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार,स्वर्गीय हरिप्रसाद की मृत्यु 10 मई 2021 को हुई थी,वहीं, शिकायत में 1 जून 2021 को 75,000 और 11 जून 2021 को ?54,000 के KCC ऋ ण स्वीकृत होने का उल्लेख है,इस तरह कुल 1,29,000 की ऋ ण राशि का मामला सामने आता है,शिकायतकर्ता के मुताबिक,75,000 में से 3 जून 2021 को 49,000 और 4 जून को 26,000 का भुगतान दर्ज है। दूसरी ओर,54,000 में से 17 जून को 49,000 और 21 जून को 5,000 का भुगतान दर्ज होने की बात कही गई है,इन तारीखों को मृत्यु प्रमाणपत्र और बैंक के मूल अभिलेखों के साथ मिलाकर देखना जरूरी है, यदि मृत्यु प्रमाणपत्र में दर्ज तारीख और ऋ ण स्वीकृति की तारीखें सही हैं, तो सवाल सीधा है—ऋण आवेदन किसने प्रस्तुत किया? किसान की पहचान और जीवित होने का सत्यापन किसने किया? ऋण स्वीकृति किस अधिकारी ने दी? भुगतान किसके खाते में या किस माध्यम से हुआ? और बैंक के रिकॉर्ड में दर्ज लेनदेन का वास्तविक आधार क्या था? सहकारिता की व्यवस्था में कागजों का अपना महत्व है, लेकिन कागज पर दर्ज तारीखें जब एक-दूसरे से गंभीर सवाल पूछने लगें,तो केवल फाइल बंद कर देना पर्याप्त नहीं होता,ऐसे में जरूरी है कि संबंधित ऋण आवेदन,स्वीकृति आदेश,बैंक लेजर,भुगतान वाउचर,हस्ताक्षर और सत्यापन दस्तावेजों की जांच की जाए। केवल शिकायतकर्ता के आरोप के आधार पर दोष तय नहीं हो सकता,मगर दस्तावेजों में दिख रहे समयक्रम की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए।
बकाया ऋण का नोटिस आया तो खुला कथित ऋण का मामला
शिकायतकर्ता का कहना है कि वर्ष 2024 में उन्हें समिति की ओर से उनके दिवंगत पिता के नाम पर 1,72,860 का बकाया ऋ ण जमा करने का नोटिस मिला,उनका दावा है कि इसी नोटिस के बाद उन्हें पता चला कि पिता के नाम पर KCC ऋ ण दर्ज है,जबकि उनके अनुसार पिता ने ऐसा ऋ ण नहीं लिया था,इसके बाद 22 जुलाई 2024 को कलेक्टर के जनदर्शन में शिकायत की गई,शिकायतकर्ता के प्रस्तुत विवरण के मुताबिक,26 जुलाई 2024 को 1,29,000 ऋ ण खाते में जमा हुए,इसके बाद शिकायत वापस लिए जाने का पत्र भी सामने आया,शिकायतकर्ता का आरोप है कि उस समय उन्हें यह कहकर शिकायत वापस लेने के लिए तैयार किया गया कि उनके पिता ने मृत्यु से पहले ऋण लिया था,यहीं से मामले में एक और सवाल पैदा होता है,यदि शिकायतकर्ता ने बाद में अपना पक्ष बदला था,तो क्या उस बदलाव की स्वतंत्र पुष्टि हुई? क्या शिकायतकर्ता का बयान दर्ज किया गया? क्या मृत्यु प्रमाणपत्र और ऋ ण स्वीकृति की तारीखों का मिलान किया गया? क्या यह जांचा गया कि शिकायत वापसी स्वेच्छा से हुई थी? शिकायत वापसी का पत्र किसी शिकायतकर्ता के पहले आरोप को अपने आप झूठा साबित नहीं करता। उसी तरह, शिकायतकर्ता का बाद में आरोप लगाना भी अपने आप पहले पत्र को फर्जी साबित नहीं करता। दोनों दस्तावेजों की प्रामाणिकता और परिस्थितियों की जांच जरूरी है,आखिर प्रशासनिक व्यवस्था का काम केवल कागज पर सहमति दर्ज कर लेना नहीं,बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि सहमति वास्तविक और स्वैच्छिक थी।
2026 में दोबारा नोटिस,दोबारा शिकायत और फिर रु.69,175 जमा
वर्ष 2026 में यह मामला फिर चर्चा में आया, शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में 7 अक्टूबर 2026 का बकाया ऋण जमा करने संबंधी नोटिस दिखाई देता है, इसके बाद देवी प्रसाद ने 15 अक्टूबर को दोबारा शिकायत प्रस्तुत की,शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने फिर वही सवाल उठाया—जब उनके पिता की मृत्यु 10 मई 2021 को हो गई थी,तो उनके नाम पर ऋ ण स्वीकृति और भुगतान कैसे दर्ज हुआ? शिकायतकर्ता के अनुसार, इस शिकायत के बाद 17 अक्टूबर 2026 को 69,175 जमा किए गए,उपलब्ध कराई गई जमा पर्ची पर यह राशि दर्ज है,लेकिन इस रकम का पूरा हिसाब स्पष्ट होना चाहिए,क्या यह मूलधन था,ब्याज था या बकाया की किसी अन्य मद का समायोजन? क्या राशि संबंधित ऋण खाते में जमा हुई? इसे किसने जमा किया? किसके निर्देश पर जमा किया गया? और जमा होने के बाद खाते की स्थिति क्या रही? इन सवालों का जवाब बैंक की प्रमाणित प्रविष्टियों और ऋ ण खाते के पूर्ण विवरण से मिलना चाहिए,क्योंकि राशि जमा होने का दस्तावेज केवल जमा की घटना बताता है, वह अपने आप यह नहीं बताता कि मूल ऋ ण वैध था या नहीं, भुगतान नियमानुसार हुआ था या नहीं और शिकायत में उठाए गए आरोपों की जांच हुई या नहीं,व्यंग्य की भाषा में कहें तो इस मामले में शिकायत की तारीखें और जमा राशि की तारीखें साथ-साथ चलती दिख रही हैं,लेकिन प्रशासनिक जांच का काम इस संयोग पर टिप्पणी करके रुक जाना नहीं है, उसे यह पता लगाना होगा कि हर भुगतान के पीछे वास्तविक प्रक्रिया क्या थी।
बैंक शाखा में ले जाने और हस्ताक्षर कराने के दबाव का आरोप
देवी प्रसाद ने आरोप लगाया है कि 15 अक्टूबर 2026 की शिकायत के बाद,16 अक्टूबर को उन्हें सोनपुर समिति के तत्कालीन प्रभारी समिति प्रबंधक जीवतेश श्रीवास्तव द्वारा भैयाथान बैंक शाखा ले जाया गया, शिकायतकर्ता का कहना है कि उनसे ऋ ण जमा पर्ची पर हस्ताक्षर करने को कहा गया और यह आश्वासन दिया गया कि रकम जमा कर दी जाएगी,उनका दावा है कि वे वहां से मौका देखकर निकल गए,यह आरोप गंभीर है और इसकी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है,जांच में यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि शिकायतकर्ता बैंक शाखा में किस उद्देश्य से पहुंचे थे,क्या उनसे कोई सहमति ली गई,पर्ची किसने तैयार की और राशि जमा कराने का निर्णय किसने लिया, शिकायतकर्ता का यह भी आरोप है कि 17 अक्टूबर को उनकी जानकारी और सहमति के बिना उनके नाम से हस्ताक्षर कर 69,175 जमा किए गए,इसके बाद 21 अक्टूबर को उच्च कार्यालय को उनकी ओर से शिकायत वापसी का पत्र भेजे जाने की जानकारी सामने आई, यदि शिकायतकर्ता उस पत्र को अपना मानने से इनकार करते हैं, तो उसकी प्रामाणिकता की जांच कराना आवश्यक है,किसी भी विवाद में शिकायतकर्ता की सहमति को केवल कागज पर दर्ज हस्ताक्षर से अंतिम नहीं माना जा सकता, खासकर जब वही व्यक्ति हस्ताक्षर को लेकर सवाल उठा रहा हो। यहां जांच का विषय यह है कि हस्ताक्षर वास्तविक हैं या नहीं, पत्र किसने तैयार किया,किसने जमा किया और उसे कार्यालय तक किस माध्यम से भेजा गया।
शिकायत पर हस्ताक्षर अलग,जमा पर्ची पर अलग,वापसी पत्र पर अलग?
इस प्रकरण का एक अहम पहलू हस्ताक्षरों को लेकर उठी आपत्ति है,शिकायतकर्ता का दावा है कि उनकी शिकायत,ऋ ण जमा पर्ची और शिकायत वापसी के पत्र पर दर्ज हस्ताक्षर एक-दूसरे से अलग प्रतीत होते हैं,केवल तस्वीर या सामान्य दृश्य तुलना से किसी हस्ताक्षर को जाली घोषित नहीं किया जा सकता,लेकिन यदि शिकायतकर्ता लिखित रूप में हस्ताक्षर से इनकार कर रहे हैं,तो इस प्रश्न को नजरअंदाज करना भी उचित नहीं होगा,इसलिए तीनों दस्तावेजों की मूल प्रतियां सुरक्षित रखी जानी चाहिए,शिकायतकर्ता के निर्विवाद नमूना हस्ताक्षरों से उनका मिलान कराया जाना चाहिए और आवश्यकता पड़ने पर सक्षम हस्तलेखन विशेषज्ञ से परीक्षण कराया जाना चाहिए, साथ ही,संबंधित कार्यालय यह स्पष्ट करे कि शिकायत वापसी का पत्र किस तारीख को प्राप्त हुआ, किस कर्मचारी ने उसकी प्राप्ति दर्ज की और पत्र भेजने वाले की पहचान की पुष्टि कैसे की गई, यदि हस्ताक्षर वास्तविक पाए जाते हैं,तो उस निष्कर्ष का आधार सामने रखा जाए,यदि हस्ताक्षर संदिग्ध या जाली पाए जाते हैं,तो नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाए,जांच का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी ठहराना नहीं, बल्कि संदेह और तथ्य के बीच स्पष्ट अंतर स्थापित करना होना चाहिए।
सहकारिता विभाग का हिसाबः रकम जमा हुई,लेकिन शिकायत का जवाब कहां है?
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह नहीं कि खाते में कितनी रकम जमा हुई,सवाल यह है कि जिस कथित ऋ ण की वैधता पर विवाद है,उसकी स्वीकृति और भुगतान की प्रक्रिया की जांच कहां तक पहुंची? यदि ऋ ण सही था, तो शिकायतकर्ता को उसकी वैधता और भुगतान प्रक्रिया समझाने के लिए दस्तावेज सामने रखे जाने चाहिए,यदि ऋ ण स्वीकृति या भुगतान में गड़बड़ी की आशंका है, तो केवल बाद में रकम जमा हो जाने से जांच की जरूरत समाप्त नहीं हो जाती,और यदि शिकायत वापसी का पत्र विवादित है,तो उसकी पुष्टि के बिना उसे अंतिम समाधान मान लेना उचित नहीं होगा,कागजों में रकम जमा होना एक बात है; यह साबित होना दूसरी कि ऋ ण की प्रक्रिया सही थी,इसी तरह, शिकायत वापस लेने का पत्र एक दस्तावेज है,यह साबित होना दूसरी बात कि शिकायतकर्ता ने उसे स्वेच्छा से और समझ-बूझकर प्रस्तुत किया था, इन दोनों के बीच का अंतर ही इस प्रकरण की जांच का केंद्र होना चाहिए।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur