प्रिंस सिंह की मौत ने आदिवासी आश्रमों की सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर खड़े किए गंभीर सवाल…कलेक्टर ने एसडीएम सोनहत को सौंपी विस्तृत जांच…
-रवि सिंह-
सोनहत/कोरिया,09 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। आदिवासी बालक आश्रम मझारटोला में रहकर पढ़ाई कर रहे कक्षा 4 वीं के छात्र प्रिंस सिंह की आश्रम से लापता होने के बाद पानी में डूबने से हुई मौत ने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया है,एक नाबालिग छात्र का आश्रम से बाहर निकल जाना और उसके अनुपस्थित होने की सूचना समय पर उच्चाधिकारियों तक नहीं पहुंचना अब पूरे मामले का सबसे बड़ा सवाल बन गया है,घटना के बाद जिला प्रशासन ने प्रथमदृष्टया लापरवाही मानते हुए आश्रम अधीक्षक अशोक एक्का को निलंबित कर दिया है,वहीं,मामले की वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदारी तय करने के लिए एसडीएम सोनहत को विस्तृत जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई है। प्रिंस सिंह,पिता बिजेन्द्र सिंह,आदिवासी बालक आश्रम मझारटोला में रहकर कक्षा 4वीं में अध्ययनरत था,उपलब्ध जानकारी के अनुसार 8 सितंबर 2026 की सुबह करीब 7 बजे से छात्र आश्रम से अनुपस्थित था,इसके बाद उसकी तलाश शुरू हुई और बाद में उसके पानी में डूबने से मौत की जानकारी सामने आई, घटना की खबर मिलते ही परिजनों,ग्रामीणों और क्षेत्रवासियों में शोक के साथ-साथ आक्रोश की स्थिति निर्मित हो गई,मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि आश्रम में रहने वाले बच्चे अपने परिवार से दूर रहकर शासकीय व्यवस्था की निगरानी और जिम्मेदारी में रहते हैं,ऐसे में किसी बच्चे की उपस्थिति,अनुपस्थिति और उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी आश्रम प्रबंधन की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मानी जाती है।
सुबह से छात्र था गायब,सूचना में देरी पर सवाल-घटना का सबसे संवेदनशील पहलू छात्र के आश्रम से अनुपस्थित होने के बाद की व्यवस्था है,प्रशासन के अनुसार आश्रम अधीक्षक अशोक एक्का ने छात्र के आश्रम से अनुपस्थित होने की सूचना तत्काल उच्चाधिकारियों को नहीं दी,यही चूक अब प्रशासनिक कार्रवाई का आधार बनी है, सवाल यह है कि यदि सुबह करीब 7 बजे से छात्र आश्रम में मौजूद नहीं था,तो उसकी अनुपस्थिति का पता कब चला? उसकी तलाश किस स्तर पर शुरू हुई? आश्रम के कर्मचारियों ने छात्र को खोजने के लिए क्या कदम उठाए? उच्चा धिकारियों को सूचना देने में कितना समय लगा? और यदि सूचना समय पर दी जाती तो क्या छात्र की तलाश और व्यापक स्तर पर तत्काल शुरू की जा सकती थी? इन सवालों का जवाब फिलहाल जांच के बाद ही सामने आएगा,प्रशासन ने प्रथमदृष्टया सूचना देने में हुई देरी को गंभीरता से लेते हुए अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई की है,इससे यह संकेत भी मिलता है कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़े मामलों में केवल घटना होना ही नहीं,बल्कि घटना से पहले और बाद में जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा उठाए गए कदम भी जांच के दायरे में रहेंगे।
कलेक्टर ने एसडीएम को सौंपी विस्तृत जांच-घटना की गंभीरता को देखते हुए कलेक्टर एवं जिला दंडाधिकारी रोक्तिमा यादव ने मामले की विस्तृत जांच के निर्देश दिए हैं, जांच की जिम्मेदारी अनुविभागीय अधिकारी राजस्व, सोनहत को सौंपी गई है,जांच का उद्देश्य केवल यह पता लगाना नहीं होगा कि छात्र की मौत पानी में डूबने से हुई,बल्कि यह भी महत्वपूर्ण होगा कि वह आश्रम से बाहर कैसे गया और उसकी अनुपस्थिति के बाद आश्रम प्रबंधन ने निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार क्या कदम उठाए,जांच में आश्रम की निगरानी व्यवस्था,कर्मचारियों की ड्यूटी,छात्र की उपस्थिति,उसके लापता होने की सूचना,तलाश की कार्रवाई तथा उच्चाधिकारियों को जानकारी देने में हुए विलंब जैसे बिंदुओं की जांच की जा सकती है,प्रशासन की ओर से यह भी संकेत दिया गया है कि जांच में यदि अन्य अधिकारी या कर्मचारी जिम्मेदार पाए जाते हैं तो उनके विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
एक अधीक्षक पर कार्रवाई से खत्म होंगे सवाल?-अधीक्षक अशोक एक्का का निलंबन प्रशासन की तत्काल कार्रवाई है, लेकिन घटना ने उससे कहीं बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं,यदि किसी आश्रम में बच्चे की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल अधीक्षक तक सीमित नहीं है और अन्य कर्मचारी भी निगरानी व्यवस्था का हिस्सा हैं,तो जांच में उनकी भूमिका का भी परीक्षण आवश्यक होगा,पूर्व विधायक गुलाब कमरों ने इसी पहलू को उठाते हुए घटना की निष्पक्ष और विस्तृत जांच की मांग की है,उन्होंने आश्रम की सुरक्षा व्यवस्था के साथ-साथ विभागीय स्तर पर निगरानी की भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं,उनका कहना है कि केवल अधीक्षक के खिलाफ कार्रवाई करने से पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट नहीं होगी,यह देखना जरूरी है कि आश्रम में बच्चों की सुरक्षा के लिए निर्धारित व्यवस्था क्या थी और उसका पालन किस स्तर पर हुआ,उन्होंने सहायक आयुक्त आदिवासी विकास,कोरिया श्रीमती ऊषा लकड़ा की भूमिका की भी जांच की मांग की है,हालांकि किसी अधिकारी की जिम्मेदारी या लापरवाही तय करना जांच का विषय है और केवल आरोप या मांग के आधार पर किसी व्यक्ति को दोषी नहीं माना जा सकता।
लीपापोती नहीं,जिम्मेदारी तय हो- पूर्व विधायक गुलाब कमरों ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ी घटना को सामान्य प्रशासनिक चूक मानकर समाप्त नहीं किया जाना चाहिए,यदि किसी स्तर पर लापरवाही हुई है तो उसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए,उनके अनुसार आश्रम और छात्रावास में रहने वाले बच्चे शासन की जिम्मेदारी में होते हैं। ऐसे में उनकी नियमित निगरानी,उपस्थिति और सुरक्षा के लिए मजबूत व्यवस्था होना जरूरी है, उन्होंने जिले के सभी आदिवासी आश्रमों और छात्रावासों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की मांग भी की है, उनका कहना है कि एक घटना के बाद केवल कार्रवाई करने के बजाय ऐसी व्यवस्था बनाई जानी चाहिए जिससे भविष्य में किसी बच्चे के लापता होने की स्थिति में तत्काल अलर्ट जारी हो और परिवार तथा उच्चाधिकारियों को सूचना पहुंच सके।
सिर्फ निलंबन नहीं,व्यवस्था की समीक्षा जरूरी-प्रिंस सिंह की मौत एक परिवार के लिए अपूरणीय क्षति है,लेकिन इस घटना ने प्रशासन के सामने एक व्यापक चुनौती भी खड़ी कर दी है,आदिवासी आश्रमों में रहने वाले बच्चे अपने घर से दूर रहते हैं,इसलिए उनके लिए आश्रम केवल पढ़ाई का स्थान नहीं, बल्कि अस्थायी रूप से उनका घर भी होता है, ऐसी स्थिति में बच्चों की सुरक्षा व्यवस्था में छोटी-सी चूक भी गंभीर परिणाम पैदा कर सकती है,इसलिए जरूरी है कि जिले के सभी आश्रमों में बच्चों की दैनिक उपस्थिति,आने-जाने की निगरानी, कर्मचारियों की जिम्मेदारी, आपातकालीन सूचना प्रणाली और परिजनों से तत्काल संपर्क की व्यवस्था की समीक्षा की जाए, यदि किसी बच्चे की अनुपस्थिति का पता चलते ही संबंधित अधिकारियों को सूचना देने की स्पष्ट व्यवस्था हो और उसका पालन अनिवार्य रूप से कराया जाए तो ऐसे मामलों में शुरुआती स्तर पर ही व्यापक खोज अभियान शुरू किया जा सकता है।
अब जांच रिपोर्ट पर टिकी नजर- फिलहाल प्रशासन ने आश्रम अधीक्षक अशोक एक्का को निलंबित कर दिया है और एसडीएम सोनहत को जांच की जिम्मेदारी दी गई है,यह कार्रवाई मामले की शुरुआत है, अंतिम निष्कर्ष नहीं,अब सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि जांच रिपोर्ट में घटना की पूरी कड़ी किस तरह सामने आती है, छात्र आश्रम से कैसे निकला,उसकी अनुपस्थिति की जानकारी कब हुई, सूचना देने में देरी क्यों हुई और क्या केवल अधीक्षक ही जिम्मेदार थे या निगरानी व्यवस्था में अन्य स्तरों पर भी चूक हुई।
इन सभी प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर सामने आना जरूरी है,प्रिंस सिंह की मौत ने सिर्फ एक आश्रम की व्यवस्था पर सवाल नहीं खड़ा किया है,बल्कि उन सभी व्यवस्थाओं की समीक्षा की जरूरत सामने रखी है जहां नाबालिग बच्चे शासन की निगरानी में रहकर शिक्षा प्राप्त करते हैं,अब क्षेत्रवासियों और परिजनों की नजर जांच रिपोर्ट पर है,उम्मीद यही है कि जांच केवल कागजी कार्रवाई तक सीमित न रहे, बल्कि घटना की वास्तविक परिस्थितियों और जिम्मेदारी को स्पष्ट करे,ताकि भविष्य में किसी और मासूम की सुरक्षा व्यवस्था ऐसी लापरवाही की भेंट न चढ़े।
डूबने से मौत ने बढ़ाई चिंता…
आश्रम से लापता होने के बाद प्रिंस का शव पानी में डूबे हुए अवस्था में मिलने की घटना ने सुरक्षा व्यवस्था की गंभीरता को और बढ़ा दिया है,नाबालिग बच्चा आश्रम परिसर से बाहर किस परिस्थिति में गया,वह किस रास्ते से गया और पानी तक कैसे पहुंचा…ये सभी प्रश्न अब जांच के महत्वपूर्ण हिस्से हैं,यह भी पता लगाया जाना जरूरी है कि आश्रम में बच्चों की नियमित उपस्थिति दर्ज करने की व्यवस्था क्या थी और उसका पालन किस तरह किया जा रहा था,क्या सुबह बच्चों की उपस्थिति ली गई थी? क्या किसी कर्मचारी ने प्रिंस की अनुपस्थिति को तत्काल नोटिस किया? यदि किया तो उसके बाद क्या कार्रवाई की गई? इन तमाम बिंदुओं का जवाब जांच में सामने आने की उम्मीद है।
जांच के केंद्र में होंगे ये सवाल,प्रिंस सिंह की मौत के बाद कई सवालों का जवाब जांच से मिलना जरूरी है…
छात्र सुबह करीब 7 बजे आश्रम से कब और कैसे बाहर गया?
उसकी अनुपस्थिति सबसे पहले किस कर्मचारी के संज्ञान में आई?
क्या उस दिन आश्रम में नियमित उपस्थिति दर्ज की गई थी?
छात्र के गायब होने की सूचना उच्चाधिकारियों को तत्काल क्यों नहीं दी गई?
छात्र की तलाश कब शुरू की गई और किन स्थानों पर की गई?
आश्रम परिसर से बाहर बच्चों की निगरानी की क्या व्यवस्था थी?
आश्रम के कर्मचारियों की ड्यूटी और जिम्मेदारियां क्या निर्धारित थीं?
घटना के बाद परिजनों को सूचना कब दी गई?
क्या अन्य आश्रमों में भी सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था की समीक्षा की जाएगी?
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