- गृह निर्माण मंडल अध्यक्ष के भतीजे से मारपीट-लूट और आईपीएस के बेटे की बेल्ट-कड़े से पिटाई ने उठाए कानून-व्यवस्था पर गंभीर सवाल
- आरोपियों के कथित ‘हम यहां के दादा हैं’और ‘तेरा बाप पुलिस ऑफिसर है तो हमारा क्या कर लेगा’ जैसे बोल पुलिस की साख को चुनौती
-संवाददाता-
अंबिकापुर,09 सितम्बर 2026 (घटती-घटना)। शहर में अपराधियों के हौसले को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि इस बार कथित तौर पर मारपीट और धमकी का शिकार कोई सामान्य व्यक्ति ही नहीं,बल्कि सत्ता और पुलिस व्यवस्था से जुड़े परिवारों के सदस्य हैं। एक ओर छत्तीसगढ़ गृह निर्माण मंडल के अध्यक्ष अनुराग सिंहदेव के भतीजे अभिरत सिंहदेव से रास्ता रोककर मारपीट,2500 रुपये लूटने और चाकू से हत्या की धमकी देने का मामला सामने आया है,तो दूसरी ओर एक आईपीएस अधिकारी के बेटे लेखांश कांत कुर्रे के साथ आधा दर्जन से अधिक युवकों द्वारा कथित तौर पर बेल्ट,कड़े और हाथ-मुक्कों से मारपीट करने की शिकायत सामने आई है।
दोनों घटनाएं 7 सितंबर की बताई जा रही हैं और दोनों में एक समान बात दिखाई देती है…आरोपियों में पुलिस और कानून का डर दिखाई नहीं दिया।
समलाया मंदिर के पास हुई घटना में अभिरत सिंहदेव ने पुलिस को दी शिकायत में आरोप लगाया है कि गोलू पठान और राज बंगाला सहित अन्य युवकों ने उसका रास्ता रोककर पैसे मांगे। पैसे देने से इनकार करने पर कथित तौर पर उसकी जेब से 2500 रुपये निकाल लिए गए और उसके साथ मारपीट की गई। आरोप है कि इस दौरान उसके चश्मे को भी तोड़ दिया गया और रिपोर्ट दर्ज कराने पर चाकू मारकर हत्या करने की धमकी दी गई। आरोपियों द्वारा कथित रूप से यह कहना कि ‘हम यहां के दादा हैं,पूरे घटनाक्रम को महज मारपीट नहीं बल्कि शहर में पनप रही कथित दादागिरी की मानसिकता का संकेत बनाता है। मामले में कोतवाली पुलिस ने छह आरोपियों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में अपराध दर्ज कर जांच शुरू की है।
दूसरी घटना बौरीपारा तालाब के पास की है। शिकायत के अनुसार आईपीएस अधिकारी के बेटे लेखांश कांत कुर्रे अपने दोस्तों के साथ वहां पहुंचे थे। मोबाइल पर बातचीत के दौरान गोलू गणेश का नाम लेने को लेकर विवाद हुआ। आरोप है कि इसके बाद गोलू गणेश,रतन गुप्ता,कोया डॉन,आशुतोष गुप्ता सहित अन्य युवकों ने उनके साथ मारपीट की। शिकायत में बेल्ट और कड़े से हमला करने तथा गला दबाने का भी आरोप लगाया गया है। सबसे गंभीर आरोप वह कथित टिप्पणी है जिसमें आरोपियों ने कहा कि ‘तेरा बाप पुलिस ऑफिसर है तो हमारा क्या कर लेगा?’
अगर शिकायत में लगाए गए ये आरोप जांच में सही साबित होते हैं तो यह केवल दो युवकों से मारपीट का मामला नहीं रहेगा। यह सवाल बनेगा कि आखिर अपराधियों में कानून का भय किस स्तर तक खत्म हो चुका है?
जब ‘दादा’ खुलेआम कानून को चुनौती देने लगें
अंबिकापुर में अपराध और पुलिस कार्रवाई की खबरें लगातार सामने आती रही हैं। कभी मामूली विवाद तलवारबाजी तक पहुंच जाता है,कभी सार्वजनिक स्थानों पर मारपीट और धमकी के मामले सामने आते हैं,तो कभी संगठित तरीके से चोरी और लूट की वारदातें पुलिस के सामने चुनौती बनती हैं। हाल ही में पुलिस डॉग की मदद से दो लाख रुपये की चोरी का खुलासा हुआ, जबकि सीतापुर में करीब एक करोड़ रुपये के आभूषणों की उठाईगिरी के मामले में भी पुलिस ने आरोपियों तक पहुंच बनाई।
पुलिस ने अपराध नियंत्रण के लिए सत्यापन अभियान भी चलाया है। जुलाई में अंबिकापुर में 125 स्थानों पर जांच कर 450 लोगों का सत्यापन किया गया था। वहीं मैनपाट में बाइकर्स गैंग और यातायात नियमों के उल्लंघन के खिलाफ 158 दोपहिया वाहनों पर कार्रवाई की गई थी।
इसके बावजूद यदि शहर के बीचोंबीच कथित रूप से युवकों का समूह किसी व्यक्ति को रोककर पैसे छीनने,मारपीट करने और पुलिस में शिकायत करने पर हत्या की धमकी देने का दुस्साहस करता है,तो सवाल केवल आरोपियों पर कार्रवाई का नहीं, पुलिस की अपराध-निरोधक व्यवस्था की प्रभावशीलता का भी है।
पुलिस की सख्ती का असली इम्तिहान
सरगुजा पुलिस के अधिकारी अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था को लेकर लगातार सख्ती की बात करते रहे हैं। व्यापारिक संस्थानों की सुरक्षा को लेकर पुलिस और व्यापारियों की बैठकें हुई हैं, सत्यापन अभियान चलाए गए हैं और अलग-अलग मामलों में त्वरित गिरफ्तारी भी हुई है।लेकिन कानून-व्यवस्था का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि घटना के बाद कितनी गिरफ्तारियां हुईं। असली सवाल यह है कि घटना होने से पहले अपराधी पुलिस से कितना डरता है।
क्योंकि यदि किसी आरोपी को यह भरोसा हो जाए कि वह सड़क पर किसी को रोक सकता है,मार सकता है, पैसे छीन सकता है और पुलिस में जाने पर जान से मारने की धमकी दे सकता है,तो फिर पुलिस की पूरी व्यवस्था के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है।
‘बाप पुलिस ऑफिसर है तो क्या कर लेगा’—यह वाक्य क्यों खतरनाक है?
आईपीएस अधिकारी के बेटे से मारपीट के मामले में सामने आया कथित संवाद…‘तेरा बाप पुलिस ऑफिसर है तो हमारा क्या कर लेगा?’…व्यंग्य नहीं,बल्कि कानून के प्रति कथित दुस्साहस का प्रतीक है।
और दूसरी घटना में कथित तौर पर ‘हम यहां के दादा हैं’ कहना इसी मानसिकता का दूसरा रूप है।
इन दोनों वाक्यों को अगर आरोपों के रूप में ही देखा जाए,तब भी वे पुलिस के लिए चेतावनी हैं। क्योंकि अपराधी यदि पुलिस अधिकारी के परिवार को भी डराने की भाषा बोलने लगे तो सामान्य नागरिक की स्थिति का अंदाजा लगाया जा सकता है।
वीआईपी के परिजन नहीं,हर नागरिक की सुरक्षा जरूरी
इन घटनाओं की सबसे बड़ी चिंता यह नहीं होनी चाहिए कि पीडि़त कौन है…गृह निर्माण मंडल अध्यक्ष का भतीजा या आईपीएस अधिकारी का बेटा। असली चिंता यह है कि यदि शहर में किसी आम युवक को इसी तरह रोका जाए,पीटा जाए,पैसे छीने जाएं और पुलिस में जाने पर हत्या की धमकी दी जाए,तो क्या उसे भी इतनी ही गंभीरता से सुरक्षा और न्याय मिलेगा?
यही पुलिस और प्रशासन के सामने सबसे बड़ा सवाल है…
अपराधियों के लिए कानून का डर समान होना चाहिए। कानून की ताकत का प्रदर्शन केवल किसी घटना के बाद गिरफ्तारी तक सीमित नहीं रहना चाहिए,बल्कि शहर में ऐसा वातावरण बनना चाहिए जहां कोई युवक खुद को ‘दादा’ बताकर सड़क पर कानून की जगह अपना फरमान चलाने की हिम्मत न करे।
अंबिकापुर की जनता को ‘दादा’ नहीं,कानून का राज चाहिए…
और इस समय पुलिस के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है…सत्ता के करीबियों और पुलिस परिवारों के सदस्यों के साथ हुई घटनाएं इसलिए महत्वपूर्ण नहीं हैं कि वे रसूखदार परिवारों से हैं,बल्कि इसलिए महत्वपूर्ण हैं कि इन घटनाओं ने शहर की कानून-व्यवस्था पर वह सवाल खड़ा कर दिया है जिसका जवाब अब केवल एफआईआर से नहीं,प्रभावी कार्रवाई से देना होगा।यह मसौदा राजनीतिक व्यंग्य और पुलिस-व्यवस्था की आलोचना को तीखा रखता है,लेकिन किसी आरोपी को अदालत से पहले दोषी घोषित नहीं करता। हाल के सार्वजनिक रिपोर्टों में भी अंबिकापुर में मारपीट,धमकी और अन्य अपराधों के कई मामले सामने आए हैं।
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