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संपादकीय@जब अफसर की सख्ती से खाने की थाली तक बदलने लगे रंग

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तुकाराम मुंढे का ‘FDA मॉडल’ बना चर्चा का विषय,लेकिन असली चुनौती कार्रवाई से आगे जाकर व्यवस्था को स्थायी रूप से बदलने की खाना हमारी जिंदगी की सबसे बुनियादी जरूरत है। लेकिन जिस चीज के बिना जीवन संभव नहीं, उसी भोजन की गुणवत्ता को लेकर हमारा समाज अक्सर सबसे ज्यादा लापरवाह दिखाई देता है। चमचमाते होटल हों या सड़क किनारे का ठेला,बड़े ब्रांड हों या छोटी दुकान—ग्राहक के सामने परोसी गई थाली के पीछे क्या कहानी है,यह सवाल अक्सर प्लेट आने के बाद नहीं, बीमारी होने के बाद पूछा जाता है।
यही वह जगह है जहां महाराष्ट्र के फूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन के कमिश्नर तुकाराम मुंढे की कार्यशैली ने एक अलग बहस खड़ी कर दी है। पद संभालने के बाद उनकी कार्रवाई ने यह संदेश जरूर दिया है कि खाद्य सुरक्षा कोई कागजी खानापूर्ति नहीं,बल्कि सीधे नागरिकों के स्वास्थ्य से जुड़ा विषय है। महाराष्ट्र FDA की आधिकारिक जानकारी के अनुसार मुंढे वर्तमान में विभाग के कमिश्नर हैं और विभाग का घोषित उद्देश्य खाद्य पदार्थों,दवाओं और कॉस्मेटिक्स की सुरक्षा एवं गुणवत्ता सुनिश्चित करना है।
लेकिन इस कहानी का सबसे दिलचस्प हिस्सा केवल छापे और कार्रवाई नहीं हैं। दिलचस्प यह है कि कार्रवाई का असर रसोई से लेकर बाजार और स्कूल की कैंटीन तक दिखाई देने लगा है।
मुंबई के कई स्कूलों में वड़ा-पाव और समोसे जैसे तले हुए खाद्य पदार्थों की जगह इडली, डोसा, पोहा और उपमा जैसे विकल्प आने लगे हैं। एयरेटेड ड्रिंक्स को भी हटाया गया है। यह बदलाव स्नष्ठ्र की स्कूलों में जंक फूड के खिलाफ कार्रवाई के बाद सामने आया है।
यानी सरकारी आदेश का असर केवल फाइल में नहीं,बच्चों की प्लेट में दिखाई दे रहा है।
यही किसी प्रशासनिक कार्रवाई की सबसे बड़ी सफलता हो सकती है।
डर का असर या जिम्मेदारी का एहसास?
खाद्य कारोबार में निरीक्षण का उद्देश्य केवल दुकानदार को डराना नहीं होना चाहिए। असली उद्देश्य यह होना चाहिए कि व्यापारी निरीक्षक के आने का इंतजार न करे,बल्कि उसके आने की जरूरत ही न पड़े। अगर किसी होटल की रसोई केवल निरीक्षण की खबर सुनकर साफ हो जाती है,तो सवाल यह भी है कि वह पहले साफ क्यों नहीं थी?
अगर इस्तेमाल होने वाला तेल बार-बार गर्म करने की आदत कार्रवाई के बाद बदलती है,तो स्वास्थ्य के प्रति जिम्मेदारी पहले क्यों नहीं आई?
अगर स्कूल कैंटीन में बच्चों के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर मेन्यू बदला जा सकता है,तो यह बदलाव किसी आदेश के बाद ही क्यों हुआ?
इसलिए तुकाराम मुंढे की सख्ती का सबसे बड़ा मूल्यांकन इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितने छापे पड़े और कितने लाइसेंस निलंबित हुए। असली सवाल यह होना चाहिए कि कितने खाद्य कारोबारियों ने अपनी कार्यसंस्कृति बदली?
बड़े नाम भी कार्रवाई से बाहर नहीं…
इस अभियान की खासियत यह है कि कार्रवाई केवल छोटे दुकानदारों तक सीमित दिखाई नहीं देती। हालिया रिपोर्टों में बड़े रेस्तरां,होटल,क्विक-कॉमर्स वेयरहाउस और अंतरराष्ट्रीय फूड चेन के आउटलेट तक जांच के दायरे में आए हैं। महाराष्ट्र FDA की कार्रवाई में चार Domino’s और एक Pizza Hut आउटलेट बंद किए जाने की रिपोर्ट सामने आई, जबकि अलग अभियान में 86 प्रतिष्ठानों की जांच के बाद 12 वेयरहाउस के परमिट निलंबित किए गए और 60 सुधार नोटिस जारी किए गए।
यही संदेश महत्वपूर्ण है…
खाद्य सुरक्षा में ब्रांड बड़ा नहीं होता,मानक बड़ा होता है। ग्राहक को यह भरोसा होना चाहिए कि वह पांच सितारा होटल में खा रहा हो या सड़क किनारे के छोटे भोजनालय में,न्यूनतम स्वच्छता और खाद्य सुरक्षा के नियम सब पर समान रूप से लागू होंगे।
स्कूल की कैंटीन से शुरू हुई बड़ी लड़ाई
बच्चों के भोजन को लेकर महाराष्ट्र स्नष्ठ्र का रुख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। विभाग ने स्कूलों में सुरक्षित, स्वच्छ और संतुलित भोजन सुनिश्चित करने के लिए 2020 के खाद्य सुरक्षा नियमों के क्रियान्वयन का राज्यव्यापी आदेश भी जारी किया है।
स्कूल की कैंटीन में क्या बिकता है,यह मामूली मुद्दा नहीं है। बच्चा जिस भोजन को रोज खाता है,वही उसकी आदत बनता है और आदत आगे चलकर स्वास्थ्य को प्रभावित करती है।
इसलिए स्कूल के बाहर बिकने वाले खाद्य पदार्थों तक नियमन का विस्तार भी जरूरी है। रिपोर्टों के मुताबिक स्कूलों के आसपास 50 मीटर के दायरे में कुछ उच्च वसा,नमक और चीनी वाले खाद्य पदार्थों की बिक्री, विज्ञापन और मुफ्त वितरण पर रोक की दिशा में कदम उठाए गए हैं।
लेकिन यहां भी एक सवाल है—नियम बनाना आसान है,उसका पालन कराना कठिन।
हर स्कूल के बाहर खड़े ठेले की निगरानी कौन करेगा? हर दुकान की नियमित जांच कौन करेगा? सीमित कर्मचारियों वाले स्नष्ठ्र के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती है।
सख्ती जरूरी है,लेकिन निष्पक्षता उससे भी जरूरी
तुकाराम मुंढे की कार्रवाई की चर्चा के बीच एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी सामने आई है। बॉम्बे हाईकोर्ट ने एक मामले में स्नष्ठ्र को पुणे की एक मिठाई दुकान को ₹5 लाख मुआवजा देने का आदेश दिया। रिपोर्ट के अनुसार फॉलो-अप निरीक्षण में दुकान ने 36 में से 35 खाद्य सुरक्षा मानकों का अनुपालन किया था,फिर भी लाइसेंस निलंबन जारी रखने पर अदालत ने सवाल उठाया।
यह घटना बताती है कि कठोर प्रशासन और मनमानी प्रशासन में फर्क होता है। नियम तोड़ने वाले के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन कार्रवाई भी कानून,प्रमाण और निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार होनी चाहिए। क्योंकि यदि ईमानदार कारोबारियों को भी अनावश्यक परेशानी होती है, तो सख्त कार्रवाई की विश्वसनीयता कमजोर पड़ सकती है।
इसलिए मुंढे मॉडल की अगली परीक्षा यही है—क्या सख्ती के साथ निष्पक्षता भी उतनी ही मजबूत रहेगी?
क्या यह मॉडल पूरे देश में लागू हो सकता है?
महाराष्ट्र की कहानी देश के बाकी राज्यों के लिए भी एक बड़ा सवाल छोड़ती है।
क्या हर राज्य का खाद्य एवं औषधि प्रशासन इसी तरह सक्रिय हो सकता है?

क्या जिला स्तर पर नियमित निरीक्षण हो सकते हैं?
क्या होटल और रेस्टोरेंट की स्वच्छता रिपोर्ट सार्वजनिक की जा सकती है?
क्या उपभोक्ता आसानी से शिकायत कर सकता है और शिकायत पर समयबद्ध कार्रवाई हो सकती है?
क्या स्कूलों और अस्पतालों की कैंटीन की नियमित जांच हो सकती है?
और क्या कार्रवाई केवल त्योहारों या किसी बड़े हादसे के बाद होने के बजाय पूरे साल चल सकती है?
यदि इन सवालों के जवाब ‘हां’ में मिलते हैं तो तुकाराम मुंढे की कार्यशैली किसी एक अधिकारी की कहानी नहीं रहेगी, बल्कि प्रशासनिक सुधार का उदाहरण बन सकती है।
मुंढे से ज्यादा जरूरी है ‘मुंढे मॉडल’
व्यवस्था किसी एक अधिकारी के भरोसे नहीं चल सकती
आज तुकाराम मुंढे हैं,कल कोई दूसरा अधिकारी होगा। यदि कार्रवाई केवल अधिकारी की व्यक्तिगत सख्ती पर निर्भर है तो उसके तबादले के साथ व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट सकती है।
इसलिए जरूरत है कि व्यक्ति नहीं,व्यवस्था सख्त हो
निरीक्षण की डिजिटल निगरानी हो। खाद्य नमूनों की जांच समयबद्ध हो। दोषी प्रतिष्ठानों की जानकारी सार्वजनिक हो। लाइसेंस निलंबन और बहाली की प्रक्रिया पारदर्शी हो। उपभोक्ताओं की शिकायतों का रिकॉर्ड बने। और अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो।
तभी खाद्य सुरक्षा अभियान स्थायी बदलाव में बदलेगा।
क्योंकि असली सफलता यह नहीं कि दुकानदार अधिकारी से डरने लगे
असली सफलता तब होगी जब दुकानदार ग्राहक के स्वास्थ्य को लेकर खुद जिम्मेदार हो जाए।
आखिर सवाल हमारी थाली का है…
हम हर दिन भोजन खरीदते हैं, लेकिन उसके पीछे की स्वच्छता नहीं खरीद सकते। हम होटल में खाना खाते हैं, लेकिन रसोई की सफाई अपनी आंखों से नहीं देख पाते। हम सड़क किनारे पकवान खाते हैं, लेकिन उसमें इस्तेमाल तेल कितनी बार गर्म हुआ, यह नहीं जान पाते।
इसलिए खाद्य सुरक्षा व्यवस्था का मजबूत होना किसी सरकारी विभाग की औपचारिक जिम्मेदारी नहीं,बल्कि करोड़ों उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य की सुरक्षा है।
तुकाराम मुंढे की सख्ती ने कम से कम यह बहस जरूर छेड़ दी है कि खाने के अधिकार के साथ सुरक्षित भोजन का अधिकार भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
अब जरूरत है कि यह सख्ती कुछ महीनों की सुर्खी बनकर न रह जाए।
होटल साफ रहें…केवल निरीक्षण के दिन नहीं,हर दिन
स्कूल कैंटीन स्वस्थ भोजन दें…केवल आदेश के बाद नहीं,जिम्मेदारी से।
स्ट्रीट फूड सुरक्षित हो—केवल कार्रवाई के डर से नहीं,ग्राहक के स्वास्थ्य के सम्मान में।
और प्रशासन कार्रवाई करे—केवल किसी मुंढे जैसे सख्त अधिकारी के रहते नहीं,बल्कि एक मजबूत और जवाबदेह व्यवस्था के रूप में।
क्योंकि आखिरकार सवाल किसी होटल के लाइसेंस का नहीं है। सवाल हमारी थाली का है, हमारे बच्चों के स्वास्थ्य का है और उस भरोसे का है जिसके साथ हम रोज किसी दुकान, होटल या ठेले से खाना खरीदते हैं।
सख्ती स्वागतयोग्य है लेकिन सख्ती से पैदा हुआ डर नहीं,नियमों से पैदा हुई जिम्मेदारी ही स्थायी समाधान है।


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