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रायपुर@नकली दवा पकड़ने से शुरू हुई कहानी निलंबन तक पहुंची,

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  • अब सवाल—जांच की फाइल आगे बढ़ रही है या मामला राजनीतिक चक्रव्यूह में अटका है?
  • संजय नेताम प्रकरण के आठ महीने पूरे: न विभागीय जांच का अंत, न बहाली की खबर


-न्यूज डेस्क-
रायपुर,23 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। नकली दवा प्रकरण में सहायक औषधि नियंत्रक संजय कुमार नेताम के खिलाफ कार्रवाई को करीब आठ महीने का वक्त बीत चुका है,इस दौरान नकली दवा नेटवर्क की जांच आगे बढ़ी,पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार किया और इंदौर से रायपुर,सारंगढ़ और भाटापारा तक फैले नेटवर्क की कडि़यां सामने आईं,लेकिन संजय नेताम की विभागीय स्थिति पर अब भी वही सबसे बड़ा सवाल खड़ा है—क्या विभागीय जांच पूरी हुई? यदि हुई तो उसका निष्कर्ष क्या है? और यदि नहीं हुई तो निलंबन को अनिश्चितकाल तक खींचने की वजह क्या है? यहां एक जरूरी तथ्य यह भी है कि संजय नेताम का औपचारिक निलंबन 10 फरवरी 2026 के शासन आदेश से हुआ था,यानी 20 अगस्त 2026 तक निलंबन अवधि लगभग छह महीने की है। आठ महीने का समय मूल नकली दवा प्रकरण की शुरुआत से गिना जा रहा है,जो दिसंबर 2025 में सामने आया था। उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू होने की बात मिलती है,लेकिन उसके पूर्ण होने या संजय नेताम की बहाली का कोई स्पष्ट सार्वजनिक आदेश अब तक सामने नहीं आया है।
10 दिसंबर 2025 से शुरू हुई कहानी, जिसने पूरे विभाग को सवालों में ला खड़ा किया
इस प्रकरण की शुरुआत दिसंबर 2025 में हुई, जब रायपुर में ट्रांसपोर्ट के जरिए पहुंची संदिग्ध दवाओं की खेप ने खाद्य एवं औषधि प्रशासन को सक्रिय किया, उपलब्ध घटनाक्रम के अनुसार संजय कुमार नेताम ने ट्रांसपोर्ट से संदिग्ध दवाओं की बरामदगी की,इसके बाद मामला सारंगढ़ और भाटापारा तक पहुंचा,सारंगढ़ की सरस्वती मेडिकल स्टोर और भाटापारा की प्रेम प्रकाश एजेंसी से इस खेप के तार जुड़ने की बात सामने आई, शुरुआती कार्रवाई में करीब 2.24 लाख रुपये की दवाइयां जब्त किए जाने की जानकारी सार्वजनिक हुई, बाद की कार्रवाई में बड़ी मात्रा में दवाइयों की जब्ती का मामला सामने आया,दिसंबर की कार्रवाई की रिपोर्टिंग में रायपुर और रायगढ़ के अधिकारियों द्वारा सारंगढ़ में छापेमारी का उल्लेख भी हुआ है,यानी मामला महज किसी एक मेडिकल दुकान का नहीं था,आगे की जांच ने इसे इंदौर से छत्तीसगढ़ तक फैले नेटवर्क के रूप में सामने रखा।
15 दिसंबर की टीम में ईश्वरी नारायण सिंह, नीरज साहू और राजेश सोनी-इस पूरे घटनाक्रम में निरीक्षण दल की भूमिका भी सवालों के घेरे में रही, उपलब्ध जानकारी के अनुसार 15 दिसंबर 2025 के निरीक्षण में ईश्वरी नारायण सिंह, नीरज साहू और राजेश सोनी शामिल थे,यहीं से सवालों की पहली श्रृंखला शुरू होती है—पहली कार्रवाई के बाद जब विभाग संतुष्ट नहीं हुआ तो दोबारा टीम भेजने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या पहली जांच में अपेक्षित परिणाम नहीं मिले थे? और यदि ऐसा था तो जिम्मेदारी किसकी थी?
28 जनवरीः एक मुलाकात ने पूरी दिशा बदल दी- इसके बाद आया 28 जनवरी का घटनाक्रम, संजय कुमार नेताम की सारंगढ़ प्रकरण से जुड़े व्यक्ति से रायपुर के एक रेस्टोरेंट में मुलाकात का वीडियो सामने आया, शासन के निलंबन आदेश के बारे में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार यह मुलाकात कार्यालयीन समय में हुई थी और आरोप है कि नकली दवा प्रकरण से संबंधित फाइल भी दिखाई गई,इसी आधार पर शासन ने इसे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा आचरण नियम,1965 के उल्लंघन के रूप में माना,इसके बाद 10 फरवरी 2026 के आदेश से संजय कुमार नेताम को छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (वर्गीकरण,नियंत्रण तथा अपील) नियम,1966 के नियम 9(1)(क) के तहत तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया। उनका मुख्यालय नियंत्रक,खाद्य एवं औषधि प्रशासन,नया रायपुर अटल नगर निर्धारित किया गया,यानी जिस अधिकारी के खिलाफ बाद में विभागीय कार्रवाई हुई,वही अधिकारी इस पूरे प्रकरण की शुरुआती कार्रवाई में सक्रिय भूमिका में भी था। यही विरोधाभास इस कहानी को सामान्य निलंबन प्रकरण से अलग बनाता है।
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई
अप्रैल में पकड़े गए तीन आरोपी

फरवरी में संजय नेताम के निलंबन के बाद मामला खत्म नहीं हुआ,बल्कि अप्रैल 2026 में पुलिस कार्रवाई ने नकली दवा नेटवर्क को लेकर और गंभीर तस्वीर सामने रखी,14 अप्रैल 2026 की रिपोर्ट के अनुसार रायपुर पुलिस और औषधि विभाग की संयुक्त कार्रवाई में तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया गया,इनमें इंदौर का सप्लायर रोचक अग्रवाल,सारंगढ़ का मेडिकल स्टोर संचालक खेमराम बानी और भाटापारा का संचालक सुरेंद्र कुमार शामिल बताए गए,पुलिस के अनुसार नेटवर्क इंदौर से नकली दवाओं की सप्लाई कर स्थानीय मेडिकल दुकानों तक पहुंचाने से जुड़ा था,यह अपडेट बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि बाद की पुलिस जांच में नकली दवा का संगठित नेटवर्क सामने आया और आरोपी गिरफ्तार हुए, तो अब यह सवाल और गंभीर हो जाता है कि दिसंबर से शुरू हुई विभागीय कार्रवाई के दौरान किस स्तर पर क्या-क्या चूक हुई?
नेताम पर कार्रवाई हुई, लेकिन बाकी सवालों का क्या?
संजय नेताम के खिलाफ सरकार की कार्रवाई का अपना आधार है,शासन का कहना है कि उन्होंने कार्यालयीन समय में नकली दवा मामले के आरोपी से मुलाकात की और प्रकरण से जुड़ी फाइल दिखाई,इसलिए उनके खिलाफ निलंबन किया गया,लेकिन पत्रकारिता का सवाल यह है कि एक अधिकारी की कथित आचरण संबंधी गलती की जांच और पूरे नकली दवा नेटवर्क की प्रशासनिक जिम्मेदारी—क्या दोनों को एक ही तराजू में तौला जा सकता है? यदि नेताम दोषी हैं तो विभागीय जांच पूरी कर स्पष्ट निष्कर्ष सामने आना चाहिए,यदि वे दोषी नहीं हैं तो उन्हें बहाल किया जाना चाहिए,और यदि जांच अभी चल रही है तो विभाग को यह बताना चाहिए कि जांच किस स्तर पर है,जांच अधिकारी कौन है, आरोपपत्र जारी हुआ या नहीं और समय सीमा क्या है? निलंबन कोई अंतिम सजा नहीं है। निलंबन जांच के दौरान प्रशासनिक व्यवस्था का हिस्सा है,इसलिए अनिश्चितकाल तक किसी अधिकारी को निलंबित रखकर मामले को फाइलों में ठंडा छोड़ देना भी पारदर्शी व्यवस्था का उदाहरण नहीं माना जा सकता।
षड्यंत्र कहें या विभागी
राजनीति…फैसला जांच से ही होगा

ह्यइस पूरे मामले को सीधे‘षड्यंत्र’कहना फिलहाल जल्दबाजी होगी। लेकिन इसे केवल एक अधिकारी के निलंबन की सामान्य कहानी मान लेना भी उतना ही आसान निष्कर्ष होगा,क्योंकि सवाल बहुत हैं नकली दवा का नेटवर्क कौन चला रहा था? पहली जांच में क्या कमी
रही? दूसरी कार्रवाई में इतनी बड़ी मात्रा कैसे सामने आई? निरीक्षण दल से हटाए गए अधिकारी अवकाश के दौरान दोबारा निरीक्षण में कैसे शामिल हुए? निरीक्षण से पहले दुकान खाली कैसे मिली? संजय नेताम की मुलाकात का पूरा संदर्भ क्या था? क्या विभागीय जांच ने इन सभी पहलुओं को एक साथ देखा? और सबसे बड़ा सवाल है की यदि अप्रैल में नकली दवा नेटवर्क के आरोपी गिरफ्तार हो चुके हैं,तो अगस्त तक संजय नेताम की विभागीय स्थिति पर अंतिम तस्वीर क्यों साफ नहीं हुई? यही वह सवाल है जहां मामला‘निलंबन’से निकलकर विभागीय जवाबदेही का बन जाता है,नकली दवा बेचने वाला दोषी है तो उसे सजा मिलनी चाहिए, अधिकारी दोषी है तो जांच के बाद कार्रवाई होनी चाहिए, अधिकारी निर्दोष है तो बहाली होनी चाहिए,लेकिन यदि फाइल ही फैसला नहीं कर रही,तो फिर जनता यह मानने को मजबूर होती है कि दवा का नकली खेल तो जांच में आ गया,मगर विभागीय राजनीति की असली दवा अभी तक तैयार नहीं हुई है,अब सरकार और खाद्य एवं औषधि प्रशासन से यही अपेक्षा है कि संजय कुमार नेताम की विभागीय जांच की स्थिति,जांच अधिकारी,आरोप-पत्र, सुनवाई और वर्तमान प्रशासनिक स्थिति को सार्वजनिक किया जाए,इससे न केवल नेताम की स्थिति स्पष्ट होगी, बल्कि नकली दवा प्रकरण की पूरी कार्रवाई पर उठ रहे सवालों का भी जवाब मिलेगा।
20 दिसंबरः दूसरी टीम और करीब 27 लाख की कार्रवाई
इसके बाद नियंत्रक खाद्य एवं औषधि प्रशासन दीपक कुमार अग्रवाल के स्तर से दूसरी टीम भेजे जाने की बात सामने आई,इस टीम में संजय कुमार नेताम,सुरेश कुमार साहू और टेकचंद धीरहे के नाम सामने आते हैं,दूसरी कार्रवाई में करीब 27 लाख रुपये की दवाइयां जब्त किए जाने की बात कही गई,इसके बाद पूर्व निरीक्षण दल से स्पष्टीकरण लिया गया,यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ…यदि एक ही प्रकरण से जुड़ी कार्रवाई में अलग-अलग अधिकारियों की भूमिका थी तो सभी के खिलाफ कार्रवाई का पैमाना समान क्यों नहीं रहा? किसी का वेतन रोका गया,किसी पर निलंबन की कार्रवाई हुई,यह अंतर अपने आप में जांच का विषय है।
15 जनवरीः नीरज साहू को टीम से हटाया गया,फिर छुट्टी में कैसे पहुंचे?
प्रकरण का सबसे दिलचस्प अध्याय भाटापारा की प्रेम प्रकाश एजेंसी से जुड़ा है,सूत्रों के अनुसार 15 जनवरी 2026 को दोबारा निरीक्षण के लिए नई टीम बनाई गई और नीरज साहू को इस बार टीम से अलग रखा गया,टीम में ईश्वरी नारायण सिंह और टेकचंद धीरहे के शामिल होने की बात सामने आई,लेकिन इसी दौरान एक और सवाल खड़ा हुआ,बताया गया कि नीरज साहू 15 और 16 जनवरी को पारिवारिक कार्यक्रम के लिए अवकाश पर थे,इसके बावजूद सूत्रों के अनुसार ईश्वरी नारायण सिंह ने उन्हें ‘सहयोग’ के लिए निरीक्षण में शामिल कर लिया,अब सवाल यह है कि यदि किसी अधिकारी को पहले निरीक्षण दल से हटाया गया था और वह अवकाश पर भी था,तो उसे मौके पर बुलाने की अनुमति किस स्तर से मिली? और सबसे महत्वपूर्ण…यदि वह निरीक्षण में शामिल हुआ तो क्या इसका कोई औपचारिक आदेश था? यह सवाल इसलिए और गंभीर हो जाता है क्योंकि उसी निरीक्षण से जुड़ी तस्वीरों में ईश्वरी नारायण सिंह और नीरज साहू के साथ होने की बात सामने आई और प्रेम प्रकाश एजेंसी के खाली मिलने की जानकारी भी सामने आई,व्यंग्य में कहें तो विभागीय नियमों की किताब शायद उस दिन छुट्टी पर थी…अधिकारी छुट्टी पर थे,लेकिन जांच में मौजूद थे! हालांकि यह कहना कि दुकान खाली होने के पीछे निश्चित रूप से किसी अधिकारी की भूमिका थी, बिना जांच के उचित नहीं होगा,लेकिन सूचना लीक हुई या नहीं, दुकान निरीक्षण से पहले खाली क्यों मिली और निरीक्षण दल में अवकाश पर मौजूद अधिकारी कैसे शामिल हुए—इन सवालों की जांच जरूर होनी चाहिए।
क्या बेनी राम साहू की एंट्री महज संयोग है?
इसी पूरे घटनाक्रम के बीच बेनी राम साहू का नाम भी लगातार चर्चा में रहा, उपलब्ध जानकारी के अनुसार उनके पास खाद्य एवं औषधि प्रशासन में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां रही हैं और बाद में रायपुर लाइसेंस अथॉरिटी के प्रभार को लेकर भी उनका नाम सामने आया,यहीं से इस प्रकरण को लेकर विभागीय राजनीति की चर्चा शुरू होती है, क्या प्रभार परिवर्तन केवल प्रशासनिक जरूरत थी? क्या यह स्टाफ की कमी का परिणाम था? या फिर नकली दवा प्रकरण में घटनाओं के बीच हुए प्रशासनिक बदलावों की अलग से जांच होनी चाहिए? इन सवालों का जवाब बिना दस्तावेजी जांच के नहीं दिया जा सकता,इसलिए किसी व्यक्ति को षड्यंत्र का जिम्मेदार घोषित करना उचित नहीं होगा,लेकिन प्रभार परिवर्तन की तारीख,निलंबन की तारीख और उससे पहले हुई विभागीय कार्रवाई की पूरी टाइमलाइन सार्वजनिक होने से संदेहों का समाधान जरूर हो सकता है।
आठ महीने बाद असली सवाल यही है…जांच कहां पहुंची?
दिसंबर 2025 से अगस्त 2026 तक घटनाक्रम काफी आगे बढ़ चुका है,नकली दवा की खेप पकड़ी गई,सारंगढ़ और भाटापारा में कार्रवाई हुई,बड़ी मात्रा में दवाइयां जब्त होने की जानकारी सामने आई,संजय कुमार नेताम का नाम विवाद में आया,फरवरी में उन्हें निलंबित किया गया, अप्रैल में पुलिस ने नकली दवा नेटवर्क से जुड़े तीन आरोपियों को गिरफ्तार किया,लेकिन अब भी जनता के सामने सबसे जरूरी सवाल है…संजय नेताम के खिलाफ विभागीय जांच का अंतिम परिणाम क्या है? उपलब्ध सार्वजनिक रिपोर्टों में निलंबन और विभागीय जांच शुरू होने की जानकारी तो है,लेकिन 20 अगस्त 2026 तक जांच पूरी होने या नेताम की बहाली का कोई स्पष्ट सार्वजनिक आदेश हमें नहीं मिला।


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