-न्यूज डेस्क-
सरगुजा/रायपुर/कोरिया ,10 अगस्त 2026 (घटती-घटना)। चुनावों में अक्सर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम की सुरक्षा और पारदर्शिता को लेकर सवाल उठते हैं,लेकिन छत्तीसगढ़ आयुर्वेद एवं यूनानी चिकित्सा पद्धति तथा प्राकृतिक चिकित्सा परिषद के चुनाव में विवाद ने एक अलग ही दिशा पकड़ ली है,यहां सवाल ईवीएम का नहीं,बल्कि डाक मतपत्रों की डिलीवरी, उनकी सुरक्षा और संबंधित मतदाता तक उनकी वास्तविक पहुंच को लेकर उठ रहा है। सरगुजा संभाग से चुनाव मैदान में उतरे डॉ. भुवन भास्कर साहू,ग्राम सोनहत,जिला कोरिया द्वारा निर्वाचन अधिकारी एवं रजिस्ट्रार के समक्ष प्रस्तुत ज्ञापन तथा उसके साथ लगाए गए डाक विभाग के कथित डिलीवरी रिकॉर्ड और पावती दस्तावेजों ने कई सवाल खड़े किए हैं, शिकायतकर्ता का दावा है कि अलग-अलग चिकित्सकों के नाम से भेजे गए डाक मतपत्रों की डिलीवरी से संबंधित दस्तावेजों में एक ही व्यक्ति के समान अथवा मिलते-जुलते हस्ताक्षर दिखाई देते हैं, यदि दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है कि अलग-अलग पंजीकृत मतदाताओं के लिए भेजे गए डाक मतपत्र किसी एक व्यक्ति ने प्राप्त किए,तो मामला केवल डाक वितरण की तकनीकी त्रुटि तक सीमित नहीं रहेगा,इससे मतदाता की गोपनीयता, मतदान के अधिकार और पूरी निर्वाचन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े हो सकते हैं।
एक हस्ताक्षर,कई मतदाता और कई मतपत्र-आखिर पहुंचे किसके हाथ?
शिकायत में सबसे गंभीर सवाल डाक मतपत्रों की प्राप्ति प्रक्रिया को लेकर उठाया गया है, शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों में अलग-अलग चिकित्सकों के नाम से भेजी गई डाक वस्तुओं की डिलीवरी के संबंध में ऐसे हस्ताक्षर दिखाई देने का दावा किया गया है,जिन्हें शिकायतकर्ता ने एक ही व्यक्ति से संबंधित बताया है,यहीं से विवाद का मूल सवाल सामने आता है—यदि मतपत्र अलग-अलग पंजीकृत मतदाताओं के लिए भेजे गए थे तो उनकी प्राप्ति एक ही व्यक्ति द्वारा किस आधार पर की गई? क्या संबंधित व्यक्ति को इन डाक वस्तुओं को प्राप्त करने के लिए कोई अधिकृत अनुमति थी? क्या डाक वितरण के दौरान प्राप्तकर्ता की पहचान का सत्यापन किया गया? क्या प्रत्येक डाक वस्तु के लिए अलग-अलग प्राप्ति प्रमाण उपलब्ध है? क्या संबंधित चिकित्सकों ने स्वयं अपने मतपत्र प्राप्त किए थे? इन सवालों का अंतिम उत्तर केवल मूल डाक रिकॉर्ड, डिलीवरी मैनिफेस्ट, हस्ताक्षरों के सत्यापन और संबंधित मतदाताओं के बयान से ही सामने आ सकता है।
सरकारी पद के प्रभाव का भी लगाया गया आरोप-शिकायत में केवल डाक मतपत्रों की डिलीवरी को लेकर ही सवाल नहीं उठाए गए हैं,प्रत्याशी द्वारा निर्वाचन अधिकारी को दिए गए ज्ञापन में यह भी आरोप लगाया गया है कि चुनाव से जुड़े कुछ शासकीय पदों पर कार्यरत अधिकारी या कर्मचारी अपने पद अथवा प्रशासनिक प्रभाव का इस्तेमाल कर चिकित्सकों पर किसी विशेष प्रत्याशी के पक्ष में मतदान करने का दबाव बना रहे हैं,कुछ मतदाताओं को कथित तौर पर विरोध करने की स्थिति में प्रशासनिक या दंडात्मक कार्रवाई की धमकी दिए जाने का भी आरोप लगाया गया है, हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि फिलहाल नहीं हुई है, ऐसे में इनका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही निकाला जा सकता है, लेकिन यदि किसी निर्वाचन में मतदाताओं पर दबाव या पद के प्रभाव के इस्तेमाल की शिकायत सामने आती है तो निर्वाचन प्राधिकरण के लिए उसकी निष्पक्ष जांच महत्वपूर्ण हो जाती है।
रजिस्ट्रार को सौंपा गया ज्ञापन, कार्रवाई पर नजर-शिकायतकर्ता के अनुसार निर्वाचन अधिकारी एवं रजिस्ट्रार कार्यालय में प्राप्ति क्रमांक 44, दिनांक 07 अगस्त 2026 के माध्यम से ज्ञापन प्रस्तुत किया गया। इसके साथ डाक वितरण से संबंधित दस्तावेज भी लगाए गए और निर्वाचन प्रक्रिया में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई,अब सवाल यह है कि शिकायत मिलने के बाद निर्वाचन अधिकारी की ओर से क्या कार्रवाई की गई,क्या संबंधित डाकघर से मूल रिकॉर्ड मंगाया गया? क्या डिलीवरी मैनिफेस्ट की जांच की गई? क्या संबंधित चिकित्सकों से संपर्क कर यह पुष्टि की गई कि उन्होंने अपना डाक मतपत्र स्वयं प्राप्त किया था? क्या विवादित हस्ताक्षरों की विशेषज्ञ जांच कराने की प्रक्रिया शुरू हुई? इन सवालों पर निर्वाचन अधिकारी एवं रजिस्ट्रार का आधिकारिक पक्ष सामने आना महत्वपूर्ण होगा।
बिलासपुर,बस्तर और रायपुर से भी शिकायतों के दावे-शिकायतकर्ता पक्ष से जुड़े दावों के अनुसार डाक मतपत्रों की डिलीवरी को लेकर असंतोष केवल सरगुजा संभाग तक सीमित नहीं बताया जा रहा है, बिलासपुर, बस्तर और रायपुर संभाग से जुड़े कुछ प्रत्याशियों द्वारा भी डाक मतपत्रों की समय पर डिलीवरी, मतपत्र किसे सौंपे गए और वितरण प्रक्रिया की पारदर्शिता को लेकर सवाल उठाए जाने की बात सामने आई है, हालांकि इन दावों की भी स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है, यदि प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से समान प्रकृति की शिकायतें सामने आती हैं तो निर्वाचन प्राधिकरण के लिए पूरे डाक मतपत्र वितरण तंत्र की समीक्षा करना अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगा।
चुनाव परिणाम से पहले पारदर्शिता की परीक्षा-इस विवाद को केवल किसी एक प्रत्याशी की जीत या हार से जोड़कर देखना उचित नहीं होगा,चुनाव में मतदाता के मत की गोपनीयता और उसकी स्वतंत्र इच्छा सर्वोच्च महत्व रखती है, यदि शिकायत में लगाए गए आरोप निराधार हैं तो निष्पक्ष जांच से स्थिति स्पष्ट हो सकती है,लेकिन यदि दस्तावेजों में दिखाई देने वाली अनियमितताएं स्वतंत्र जांच में सही साबित होती हैं तो यह सवाल गंभीर होगा कि डाक मतपत्रों की सुरक्षा में चूक कहां हुई और उसकी जिम्मेदारी किसकी थी।
अब निगाहें निर्वाचन अधिकारी और डाक विभाग की जांच पर-आयुर्वेद परिषद चुनाव में उठे विवाद का समाधान आरोप-प्रत्यारोप से नहीं,बल्कि दस्तावेज आधारित और पारदर्शी जांच से ही संभव है। डाक विभाग के मूल रिकॉर्ड और निर्वाचन कार्यालय के दस्तावेजों का मिलान, संबंधित चिकित्सकों के बयान तथा विवादित हस्ताक्षरों का सत्यापन इस मामले की वास्तविक तस्वीर सामने ला सकते हैं,फिलहाल यह कहना जल्दबाजी होगा कि डाक मतपत्रों में चुनावी गड़बड़ी हुई है,लेकिन यदि अलग-अलग मतदाताओं के मतपत्र वास्तव में एक ही व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए जाने के दस्तावेजी संकेत मौजूद हैं, तो इसकी निष्पक्ष जांच होना जरूरी है, क्योंकि सवाल केवल एक डाक मतपत्र का नहीं है—सवाल उस भरोसे का है जिसके आधार पर एक चिकित्सक अपना मत देता है और अपेक्षा करता है कि उसका वोट उसकी इच्छा के अनुरूप सुरक्षित और गोपनीय रहेगा।
मतपत्र की गोपनीयता पर भी सवाल…
डाक मतपत्र सामान्य पत्र या पार्सल नहीं होता। वह एक पंजीकृत मतदाता के मतदान अधिकार से जुड़ा चुनावी दस्तावेज है,ऐसे में उसकी प्राप्ति से लेकर मतदान और निर्वाचन अधिकारी के पास वापस पहुंचने तक पूरी प्रक्रिया में गोपनीयता और सुरक्षा बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है, शिकायतकर्ता का सवाल है कि यदि अलग-अलग मतदाताओं के मतपत्र वास्तव में किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए गए,तो यह जांचना जरूरी है कि इसके बाद उन मतपत्रों की अभिरक्षा किसके पास रही और वे संबंधित मतदाताओं तक पहुंचे भी या नहीं,यहां यह भी स्पष्ट करना जरूरी है कि केवल किसी डिलीवरी पावती पर समान हस्ताक्षर दिखाई देना अपने आप में चुनावी धांधली का अंतिम प्रमाण नहीं है,यह जांच का आधार जरूर बन सकता है, लेकिन निष्कर्ष के लिए मूल रिकॉर्ड और संबंधित मतदाताओं की पुष्टि आवश्यक होगी।
जांच के लिए इन सवालों का जवाब जरूरी
पूरे मामले में निर्वाचन प्राधिकरण और डाक विभाग को यदि जांच करनी है तो कई बिंदुओं का सत्यापन किया जा सकता है विवादित डाक वस्तु वास्तव में किसे सौंपी गई? प्राप्तकर्ता ने किस पहचान के आधार पर डाक स्वीकार की? डिलीवरी के समय संबंधित मतदाता मौजूद था या नहीं? डिलीवरी मैनिफेस्ट में दर्ज हस्ताक्षर किसके हैं? क्या संबंधित चिकित्सकों ने अपने मतपत्र प्राप्त करने की पुष्टि की है? क्या किसी मतदाता ने लिखित रूप से बताया है कि उसका मतपत्र उसे नहीं मिला? विवादित मतपत्रों की आगे की स्थिति क्या रही? डाक विभाग के पास उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक डिलीवरी रिकॉर्ड क्या कहता है? क्या निर्वाचन कार्यालय के रिकॉर्ड में उन मतपत्रों की वापसी और प्राप्ति दर्ज है? इन सवालों के जवाब सामने आने के बाद ही विवाद की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
डाक रिकॉर्ड बन सकता है पूरे विवाद की ‘कुंजी’
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य डाक विभाग के रिकॉर्ड हो सकते हैं, यदि शिकायत में लगाए गए दस्तावेजों को निर्वाचन प्राधिकरण गंभीरता से लेता है तो प्रत्येक विवादित डाक मतपत्र की डिलीवरी तारीख, समय,प्राप्तकर्ता, हस्ताक्षर, डिलीवरी मैनिफेस्ट और उपलब्ध इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड का मिलान किया जा सकता है,जरूरत पड़ने पर हस्ताक्षरों की विशेषज्ञ जांच भी कराई जा सकती है,इसके साथ ही संबंधित चिकित्सकों के बयान लिए जाने पर यह भी स्पष्ट हो सकता है कि उन्होंने स्वयं अपना मतपत्र प्राप्त किया था या नहीं,यदि किसी चिकित्सक द्वारा यह पुष्टि की जाती है कि उसके नाम से भेजा गया डाक मतपत्र उसने स्वयं प्राप्त नहीं किया,तो जांच का दायरा स्वाभाविक रूप से और गंभीर हो जाएगा।
मुख्यमंत्री से लेकर पोस्टमास्टरजनरल तक शिकायत की बात
शिकायतकर्ता की ओर से मामले की प्रतिलिपि मुख्यमंत्री,स्वास्थ्य मंत्री, प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण,संचालक आयुष तथा पोस्टमास्टर जनरल सहित संबंधित अधिकारियों को भेजे जाने की बात कही गई है,इससे मामला केवल एक प्रत्याशी और निर्वाचन अधिकारी के बीच की शिकायत नहीं रह जाता, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और निर्वाचन प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा विषय बन जाता है,यदि जांच में आरोप गलत पाए जाते हैं तो संबंधित पक्ष को भी स्पष्टता मिलेगी और चुनाव प्रक्रिया पर उठ रहे संदेह दूर हो सकेंगे,लेकिन यदि दस्तावेजों और स्वतंत्र सत्यापन में अनियमितता सामने आती है तो फिर जिम्मेदारी तय करने और नियमानुसार कार्रवाई का सवाल उठेगा।
अब तीन सवालों पर टिकी
निगाह इस पूरे मामले में फिलहाल तीन सवाल सबसे महत्वपूर्ण हैं…
पहला-क्या अलग-अलग पंजीकृत मतदाताओं के डाक मतपत्र वास्तव में किसी एक व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए गए?
दूसरा-यदि ऐसा हुआ तो क्या संबंधित व्यक्ति उन मतपत्रों को प्राप्त करने के लिए अधिकृत था और क्या मतपत्र बाद में वास्तविक मतदाताओं तक पहुंचे?
तीसरा-शिकायत मिलने के बाद निर्वाचन अधिकारी,रजिस्ट्रार और डाक विभाग इस मामले में किस स्तर की स्वतंत्र जांच कराते हैं? इन तीन सवालों के जवाब ही यह तय करेंगे कि मामला महज डाक वितरण की तकनीकी या प्रशासनिक त्रुटि था अथवा इसके पीछे निर्वाचन प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली कोई गंभीर अनियमितता थी,फिलहाल आरोप सिद्ध नहीं हुए हैं,लेकिन शिकायत के साथ प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर उठे सवालों को निष्पक्ष जांच के जरिए स्पष्ट करना अब निर्वाचन प्राधिकरण की जिम्मेदारी है,चुनाव की निष्पक्षता केवल परिणाम से नहीं,बल्कि मतपत्र के मतदाता तक सुरक्षित पहुंचने की पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता से भी तय होती है।
घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur घटती-घटना – Ghatati-Ghatna – Online Hindi News Ambikapur