
- चंदन गया, तालाब बहा… अब जवाबदेही भी जंगल में खो गई क्या?
- कोरिया वन मंडल में संरक्षण नहीं, भ्रष्टाचार का ‘संरक्षण’! आखिर किसके साए में चल रही अनियमितता
- वन विभाग या निर्माण विभाग? जंगल बचाने से ज्यादा निर्माणों में क्यों उलझा कोरिया वन मंडल
- चंदन चोरी से लेकर बहते तालाब तक… हर कांड पर चुप्पी,आखिर किसे बचा रहा वन विभाग?
- जंगल में जो चाहे करो! कोरिया वन मंडल में शिकायतें भी बेअसर, कार्रवाई भी नदारद…
- तालाब बहा,चंदन गायब…लेकिन जिम्मेदारों पर कार्रवाई कब होगी?
- कोरिया वन मंडल में एक के बाद एक अनियमितताओं पर सवाल, फिर भी जिम्मेदारों पर कार्रवाई नहीं
- कोरिया वन मंडल में संरक्षण नहीं, ‘निर्माण और मौन’ का राज? बार-बार उजागर हो रही अनियमितताओं पर आखिर जिम्मेदार कौन?
राजन पाण्डेय
कोरिया/सोनहत,26 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। वन विभाग का नाम आते ही सबसे पहले जंगल, वन्यजीव, पौधों का संरक्षण,अवैध कटाई पर रोक और प्राकृतिक संपदा की सुरक्षा की तस्वीर सामने आती है,लेकिन कोरिया वन मंडल की तस्वीर कुछ अलग कहानी कहती नजर आ रही है,यहां ऐसा प्रतीत होने लगा है कि जंगलों की हरियाली से ज्यादा रुचि निर्माण कार्यों में दिखाई दे रही है और संरक्षण से ज्यादा ‘संरक्षण’ उन लोगों को मिल रहा है जिन पर सवाल उठ रहे हैं,दैनिक घटती-घटना लगातार वन विभाग से जुड़े मामलों को उजागर करता रहा है,कभी सरकारी नर्सरी से लाखों रुपये मूल्य के चंदन के पेड़ गायब होने का मामला सामने आया, कभी तालाब निर्माण में मशीनों के उपयोग और गुणवत्ता पर सवाल उठे, फिर पहली ही बारिश में तालाब बह गया, लेकिन इन घटनाओं के बाद यदि कुछ नहीं बदला तो वह है, जवाबदेही तय करने की व्यवस्था, ऐसा लगने लगा है कि कोरिया वन मंडल में यदि कोई अनियमितता होती है तो सबसे पहले उसकी जांच की बात होती है,फिर फाइल बनती है, फिर समय गुजरता है और अंत में मामला भी जंगल की हरियाली में कहीं गुम हो जाता है।
चंदन गया… लेकिन जिम्मेदार नहीं मिले- सरकारी नर्सरी,जहां सबसे सुरक्षित व्यवस्था होनी चाहिए,वहीं से बहुमूल्य चंदन के पेड़ गायब हो गए, सवाल उठे कि आखिर पेड़ हवा में उड़ गए या जमीन निगल गई? लेकिन जनता आज भी उसी सवाल का जवाब तलाश रही है कि आखिर इस पूरे मामले में किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय हुई? यदि मुख्यालय की नर्सरी ही सुरक्षित नहीं रह सकी तो दूरस्थ जंगलों की सुरक्षा के दावे कितने मजबूत हैं, इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है।
जंगल में जो चाहे करो…कोई पूछने वाला नहीं?- ग्रामीणों का कहना है कि जिस विभाग को अवैध कटाई रोकनी चाहिए, उसी विभाग के कार्यों को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं, यदि जंगल के बीच करोड़ों रुपये के निर्माण कार्य हों और उन पर गुणवत्ता के गंभीर आरोप लगें…यदि पहली ही बारिश में निर्माण बह जाए…यदि सरकारी नर्सरी से चंदन के पेड़ गायब हो जाएं…यदि सूचना बोर्ड तक न लगाए जाएं…और फिर भी किसी बड़े अधिकारी की जिम्मेदारी तय न हो…तो जनता आखिर क्या निष्कर्ष निकाले?
हर खबर के बाद वही कहानी—जांच होगी… कार्रवाई होगी… फिर सन्नाटा- कोरिया वन मंडल में यह एक नई परंपरा बनती दिखाई दे रही है,पहले घटना, फिर शिकायत,फिर खबर,फिर जांच का आश्वासन, फिर कुछ दिन चर्चा, और उसके बाद…मौन,जनता पूछ रही है कि क्या जांच केवल इसलिए होती है ताकि कार्रवाई न करनी पड़े?
क्या अधिकारियों का संरक्षण ही सबसे बड़ा संरक्षण है?-अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इतनी शिकायतों के बाद भी यदि जिम्मेदारी तय नहीं होती तो इसका कारण क्या है? क्या निगरानी कमजोर है? क्या व्यवस्था कमजोर है? या फिर जिन पर सवाल उठ रहे हैं उन्हें विभागीय संरक्षण प्राप्त है? यह सवाल इसलिए उठ रहे हैं क्योंकि लगातार सामने आ रही घटनाओं के बाद भी किसी बड़े अधिकारी की जवाबदेही सार्वजनिक रूप से तय होती दिखाई नहीं देती।
डीएफओ की भूमिका पर भी उठ रहे सवाल- वन मंडल का प्रशासनिक और कार्यकारी नेतृत्व संभालने वाले अधिकारी के रूप में स्वाभाविक रूप से लोगों की नजर जिला वन अधिकारी (ष्ठस्नह्र) पर भी जाती है, जनता पूछ रही है—क्या इतनी सारी घटनाएं उनकी जानकारी के बिना हो रही हैं? यदि जानकारी थी तो समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं हुई? यदि जानकारी नहीं थी तो निगरानी व्यवस्था पर सवाल क्यों न उठें? और यदि शिकायतें लगातार मिल रही थीं तो सुधारात्मक कदम क्यों दिखाई नहीं दिए? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर सामने आना आवश्यक है।
सरकारी पैसा… लेकिन जवाबदेही निजी क्यों हो जाती है?-सरकारी योजनाओं का पैसा जनता का पैसा है, तालाब भी जनता का, जंगल भी जनता का, चंदन भी जनता का, लेकिन जब नुकसान होता है तो जिम्मेदारी किसी की नहीं रहती, क्या सरकारी धन केवल खर्च दिखाने के लिए है? क्या गुणवत्ता केवल कागजों में होती है? क्या निरीक्षण केवल फाइलों तक सीमित रह गया है?
तालाब बना…पहली बारिश आई…और सच्चाई बहकर बाहर आ गई-
इसके बाद सोनहत क्षेत्र में जल संरक्षण के नाम पर तालाब निर्माण का मामला सामने आया, निर्माण को लेकर स्थानीय लोगों ने शुरुआत से ही गुणवत्ता पर सवाल उठाए, दैनिक घटती-घटना ने इन सवालों को प्रमुखता से प्रकाशित किया, फिर पहली तेज बारिश हुई और तालाब का एक हिस्सा बह गया, यह केवल मिट्टी का कटाव नहीं था, इसके साथ निर्माण गुणवत्ता पर उठे सवाल भी मजबूत हो गए, यदि निर्माण मानकों के अनुरूप हुआ था तो पहली ही बारिश में वह क्यों बह गया? यदि गुणवत्ता सही थी तो तकनीकी स्वीकृति किस आधार पर दी गई? यदि गुणवत्ता गलत थी तो भुगतान कैसे हो गया? इन सवालों का उत्तर आज भी जनता को नहीं मिला।
क्या वन विभाग का मूल काम बदल गया है?-
वन विभाग का मूल उद्देश्य जंगल बचाना, वन्यजीवों की सुरक्षा करना और पर्यावरण संरक्षण है, लेकिन हाल के वर्षों में जो मामले सामने आए हैं, उनमें सबसे ज्यादा चर्चा निर्माण कार्यों की हो रही है, कहीं तालाब…कहीं सड़क…कहीं मिट्टी…कहीं मशीन…कहीं गुणवत्ता…ऐसा लगने लगा है कि जंगलों की रक्षा अब दूसरे नंबर पर है और निर्माण गतिविधियां पहले नंबर पर।
दैनिक घटती-घटना लगातार उठाता रहा सवाल…
दैनिक घटती-घटना ने क्रमबद्ध तरीके से इन मामलों को सामने रखा सरकारी नर्सरी से चंदन चोरी, सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल, तालाब निर्माण में मशीनों और गुणवत्ता पर सवाल, पहली बारिश में तालाब बहने की खबर, निर्माण गुणवत्ता और तकनीकी परीक्षण की मांग, विभागीय जवाबदेही पर लगातार सवाल, लेकिन इन खबरों के बाद भी यदि व्यवस्था में कोई बड़ा बदलाव दिखाई नहीं देता तो यह स्वयं प्रशासनिक व्यवस्था के लिए चिंतन का विषय है।
अब जनता केवल जांच नहीं,परिणाम चाहती है…
लोगों का कहना है कि हर बार जांच समिति बना देना पर्याप्त नहीं है, यदि कहीं भी गुणवत्ता में कमी,वित्तीय अनियमितता,तकनीकी लापरवाही या नियमों की अनदेखी हुई है तो जिम्मेदार अधिकारियों और संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध पारदर्शी और समयबद्ध कार्रवाई होनी चाहिए,सबसे बड़ा सवाल तालाब तो बह गया…चंदन के पेड़ भी कट गए…लेकिन क्या हर बार जिम्मेदारी भी बह जाएगी? या फिर इस बार कोरिया वन मंडल में केवल निर्माण नहीं, जवाबदेही की भी नींव रखी जाएगी?
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