- वोट हर चुनाव में,सड़क आज तक नहीं,78 साल बाद भी धुमड़ाड की बदहाल तस्वीर…
- अविभाजित मध्यप्रदेश के दौर की पंचायत,लेकिन धुमड़ाड आज भी पक्की सड़क को तरस रहा…
- धुमड़ाड की पीड़ा,लोकतंत्र के हर चुनाव में भागीदारी,फिर भी पक्की सड़क का सपना अधूरा
- अविभाजित मध्यप्रदेश और सरगुजा के दौर से अस्तित्व में है ग्राम पंचायत,न जाने कितने सरपंच,विधायक और सांसद बदले,लेकिन आज भी कीचड़ में घिसट रही जिंदगी…
- चुनाव में वोट चाहिए,लेकिन सड़क नहीं,बरसात में कट जाता है गांव, एम्बुलेंस नहीं पहुंचती, बच्चे कीचड़ पार कर जाते हैं स्कूल
रवि सिंह
कोरिया/सोनहत,25 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। आज़ादी के 78 वर्ष पूरे हो चुके हैं, देश अमृतकाल का जश्न मना रहा है,सरकारें ‘विकसित भारत’,‘ग्रामीण विकास’,‘हर गांव तक सड़क’,‘सबका साथ-सबका विकास’ और ‘अंतिम व्यक्ति तक योजनाओं का लाभ’ जैसे दावे कर रही हैं,लेकिन कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चकडाड़ के आश्रित ग्राम धुमड़ाड की जमीनी हकीकत इन दावों की परतें उधेड़ देती है,यह कोई नया बसा गांव नहीं है,यह उस दौर का गांव है,जब न कोरिया जिला बना था और न ही प्रदेश का विभाजन हुआ था,अविभाजित मध्यप्रदेश और अविभाजित सरगुजा जिले के समय से अस्तित्व में रहे इस ग्राम पंचायत ने लोकतंत्र के हर पड़ाव को देखा है,न जाने कितने पंचायत चुनाव हुए,कितने सरपंच बने, कितने जनपद और जिला पंचायत सदस्य बदले, कितने विधायक और सांसद जनता ने चुने, कितनी सरकारें आईं और चली गईं, लेकिन इन 78 वर्षों में यदि कुछ नहीं बदला, तो वह है धुमड़ाड की सड़क,आज भी इस गांव के लोग यह सवाल पूछने को मजबूर हैं कि आखिर लोकतंत्र में उनकी भूमिका केवल वोट डालने तक ही सीमित क्यों रह गई? बता दे की कोरिया जिले के सोनहत विकासखंड अंतर्गत ग्राम पंचायत चकडाड़ के आश्रित ग्राम धुमड़ाड की कहानी विकास के उन दावों पर सवाल खड़ी करती है,जिनमें हर गांव तक मूलभूत सुविधाएं पहुंचाने की बात कही जाती है,यह कोई नया गांव नहीं,बल्कि अविभाजित मध्यप्रदेश और अविभाजित सरगुजा जिले के समय से अस्तित्व में रही एक पुरानी ग्राम पंचायत का हिस्सा है,इतने लंबे समय में न जाने कितने पंचायत चुनाव हुए,कई सरपंच चुने गए, जनपद और जिला पंचायत प्रतिनिधि बदले, विधायक और सांसद भी बदलते रहे,लेकिन धुमड़ाड आज भी एक पक्की सड़क के लिए तरस रहा है,ग्रामीणों का कहना है कि आज़ादी के 78 वर्ष बाद भी बरसात के दिनों में गांव का संपर्क लगभग टूट जाता है,सड़क की जगह कीचड़ और दलदल नजर आता है,ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब इतने वर्षों में सरकारें और जनप्रतिनिधि बदलते रहे, तो आखिर धुमड़ाड तक विकास की सबसे बुनियादी सुविधा—पक्की सड़क—क्यों नहीं पहुंच सकी?
हर चुनाव में वादे,हर चुनाव के बाद खामोशी-ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव आते ही नेताओं के वाहन गांव तक पहुंच जाते हैं, विकास के वादे किए जाते हैं,सड़क बनाने के आश्वासन दिए जाते हैं, लेकिन चुनाव समाप्त होते ही गांव फिर उसी बदहाल सड़क और उपेक्षा के भरोसे छोड़ दिया जाता है,एक ग्रामीण की पीड़ा व्यवस्था पर सीधा सवाल खड़ा करती है नेता वोट मांगने आते हैं,सड़क बनाने का वादा करते हैं, लेकिन चुनाव जीतने के बाद कोई वापस नहीं आता। हम हर बार भरोसा करते हैं और हर बार ठगे जाते हैं।
मतदान बहिष्कार की चेतावनी भी बेअसर- लोकसभा चुनाव के दौरान ग्रामीणों ने सड़क निर्माण की मांग को लेकर मतदान बहिष्कार तक का निर्णय लिया था,बाद में प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के आश्वासन पर उन्होंने लोकतंत्र में विश्वास दिखाते हुए मतदान किया,लेकिन चुनाव समाप्त होने के बाद न सड़क बनी और न ही कोई ठोस पहल दिखाई दी,अब ग्रामीणों का सवाल है कि यदि आश्वासन केवल मतदान कराने के लिए थे, तो फिर जनता का विश्वास कौन लौटाएगा?
78 वर्षों में आखिर जवाबदेह कौन?- यह सवाल केवल वर्तमान सरकार से नहीं,बल्कि उन सभी जनप्रतिनिधियों से है जिन्होंने वर्षों तक इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया, आखिर क्यों धुमड़ाड जैसी पुरानी पंचायत आज भी सड़क जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है? जब करोड़ों रुपये की विकास योजनाएं स्वीकृत होती हैं, ग्रामीण सड़क योजनाएं संचालित होती हैं और पंचायतों को विकास मद में राशि मिलती है, तो फिर धुमड़ाड तक उसका लाभ क्यों नहीं पहुंचा? यदि यह प्रशासनिक विफलता है तो जिम्मेदार कौन है? यदि यह राजनीतिक उपेक्षा है तो उसका जवाब कौन देगा?
क्या विकास के नक्शे में धुमड़ाड का नाम ही नहीं है?
प्रदेश और देश में विकास की तस्वीरें दिखाई जाती हैं,करोड़ों की लागत से सड़कें बन रही हैं, एक्सप्रेस-वे,फ्लाईओवर और स्मार्ट सिटी की चर्चा होती है,लेकिन धुमड़ाड तक पहुंचने वाली सड़क आज भी इस बात की गवाही देती है कि विकास के सरकारी दावों और जमीनी सच्चाई के बीच कितना बड़ा अंतर है,बरसात शुरू होते ही गांव की सड़क सड़क नहीं रहती,बल्कि दलदल में बदल जाती है,जगह-जगह गहरे गड्ढे कीचड़ और पानी का जमाव ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं कि मानो यह सड़क नहीं,किसी उपेक्षित जंगल का रास्ता हो, पैदल चलना मुश्किल हो जाता है,दोपहिया वाहन फिसलकर गिर जाते हैं और चारपहिया वाहन गांव तक पहुंचने की हिम्मत नहीं कर पाते,सवाल यह है कि क्या प्रशासन और जनप्रतिनिधियों को इस गांव का अस्तित्व केवल चुनाव के समय ही याद आता है?
सड़क नहीं,मौत का रास्ता बन चुका है यह मार्ग…
धुमड़ाड की बदहाल सड़क केवल असुविधा नहीं है,बल्कि यह लोगों की जान पर भी भारी पड़ रही है,ग्रामीण बताते हैं कि बरसात में एम्बुलेंस गांव तक नहीं पहुंच पाती,गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना किसी परीक्षा से कम नहीं होता,गंभीर मरीजों और बुजुर्गों को चारपाई या खाट पर उठाकर कई किलोमीटर तक ले जाना पड़ता है,स्वास्थ्य सेवाओं की बात करने वाली व्यवस्था से ग्रामीण पूछ रहे हैं कि यदि मरीज अस्पताल तक ही नहीं पहुंच पाएगा,तो स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ आखिर किसे मिलेगा?
बच्चों का भविष्य भी कीचड़ में फंस रहा है…
धुमड़ाड के बच्चे हर दिन कीचड़ और दलदल से जूझते हुए स्कूल पहुंचते हैं,बरसात में कई बच्चे रास्ते में फिसल जाते हैं,उनकी किताबें और स्कूल ड्रेस खराब हो जाती हैं,कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि बच्चे स्कूल ही नहीं पहुंच पाते,सरकार शिक्षा के अधिकार की बात करती है,लेकिन धुमड़ाड के अभिभावक पूछ रहे हैं कि क्या सुरक्षित सड़क भी शिक्षा के अधिकार का हिस्सा नहीं होनी चाहिए?
ग्रामीणों की मांग…अब केवल आश्वासन नहीं…सड़क चाहिए…
ग्रामीणों ने प्रशासन से मांग की है कि तत्काल गांव का स्थलीय निरीक्षण कराया जाए,पक्की सड़क निर्माण की स्वीकृति दी जाए तथा पंचायत क्षेत्र में हुए विकास कार्यों और खर्च की निष्पक्ष जांच कराई जाए,ग्रामीणों का कहना है कि यदि इस बार भी उनकी वर्षों पुरानी मांगों की अनदेखी की गई तो वे लोकतांत्रिक और संवैधानिक तरीके से व्यापक आंदोलन करने को मजबूर होंगे।
अब सवाल जनता का नहीं, व्यवस्था की जवाबदेही का है…
धुमड़ाड केवल एक गांव नहीं,बल्कि उन तमाम ग्रामीण इलाकों का प्रतीक है जहां लोकतंत्र की सबसे बड़ी जिम्मेदारी समान विकास अब भी अधूरी है। जिस गांव में एम्बुलेंस नहीं पहुंच सकती,जहां बच्चे कीचड़ में स्कूल जाने को मजबूर हों और जहां बरसात में पूरा गांव दुनिया से कट जाए,वहां विकास के दावे स्वतः कठघरे में खड़े हो जाते हैं,आज़ादी के 78 वर्ष बाद धुमड़ाड पूछ रहा है क्या हमारे हिस्से में केवल वोट देने का अधिकार है,या फिर सम्मानपूर्वक जीने का अधिकार भी इस लोकतंत्र में कभी मिलेगा?
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