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अंबिकापुर@6 महीने में चौथी फरारी : प्लेस ऑफ सेफ्टी और बाल संप्रेक्षण गृह 2-2 से बराबर,आखिर कब जागेगा बाल संरक्षण तंत्र ?

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  • बैठक दिन में,रात में फिर फरारी…2012 से खाली जिला बाल संरक्षण अधिकारी का पद,प्रभारी व्यवस्था के भरोसे चल रहा पूरा तंत्र
  • बैठक दिन में…फरारी रात में…24 घंटे भी नहीं टिक सकी बाल संरक्षण व्यवस्था
  • 15…11…13…अब 3 फिर फरार,अपचारी बच्चों की
  • भागमभाग पर क्यों नहीं लग रही लगाम?
  • प्लेस ऑफ सेफ्टी बनाम संप्रेक्षण गृह,फरारी का स्कोर 2-2,हार गई पूरी व्यवस्था
  • बार-बार फरारी, हर बार जांच…फिर भी नहीं बदली व्यवस्था,
  • छह महीने में चार बार टूटा सुरक्षा घेरा
  • 2012 से जिला बाल संरक्षण अधिकारी का पद खाली,
  • छह महीने में चार फरारी ने खोली पूरे तंत्र की पोल
  • बाल संरक्षण या ‘फरारी केंद्र’? छह महीने में 42
  • अपचारी बच्चे भागे,जवाबदेही अब भी अधूरी
  • फरारी की बराबरीः प्लेस ऑफ सेफ्टी और संप्रेक्षण गृह 2-2 से बराबर,सुरक्षा व्यवस्था फिर बेबस
  • दैनिक घटती-घटना लगातार उठाता रहा सवाल,फिर भी नहीं हुआ अपेक्षित सुधार।


-संवाददाता-
अंबिकापुर,24 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। बाल संरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य कानून से संघर्षरत बच्चों को सुरक्षित वातावरण, परामर्श, शिक्षा और सुधार का अवसर देना होता है, लेकिन अंबिकापुर में संचालित प्लेस ऑफ सेफ्टी और बाल संप्रेक्षण गृह अब अपने मूल उद्देश्य से अधिक लगातार होने वाली फरारी की घटनाओं के कारण चर्चा में हैं,वर्ष 2026 के केवल छह महीनों में चार बार अपचारी बच्चों के फरार होने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं, सबसे चिंताजनक बात यह है कि हर घटना के बाद जांच,समीक्षा,निर्देश और कार्रवाई के दावे किए गए,लेकिन व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं दिया,अब स्थिति यह है कि प्लेस ऑफ सेफ्टी और बाल संप्रेक्षण गृह दोनों से दो-दो बार बच्चे फरार हो चुके हैं, यदि आंकड़ों पर नजर डालें तो ऐसा प्रतीत होता है मानो दोनों संस्थानों के बीच अनचाही ‘बराबरी’ की स्थिति बन गई हो,यह तुलना व्यंग्यात्मक जरूर है, लेकिन इसके पीछे छिपा सच बेहद गंभीर है—बाल संरक्षण व्यवस्था लगातार सवालों के घेरे में है।
बता दे की चार घटनाएं,चार जांचें,कई बैठकें,अनेक निर्देश और लगातार उठते सवाल
फिर भी सुरक्षा व्यवस्था में अपेक्षित सुधार दिखाई नहीं देता,यदि सुधार गृहों से ही बच्चे बार-बार फरार हो रहे हैं,तो यह केवल संस्थानों की सुरक्षा का नहीं, बल्कि पूरे बाल संरक्षण तंत्र की कार्यप्रणाली का विषय बन जाता है, अब आवश्यकता केवल जांच की नहीं,बल्कि जवाबदेही तय करने, रिक्त पदों को भरने, सुरक्षा मानकों की स्वतंत्र समीक्षा कराने और ऐसी स्थायी व्यवस्था विकसित करने की है, जिससे भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके,तभी बाल संरक्षण व्यवस्था अपने वास्तविक उद्देश्य के अनुरूप प्रभावी और विश्वसनीय बन पाएगी।
छह महीने…चार बड़ी घटनाएं-सबसे पहली बड़ी घटना 17 फरवरी 2026 को सामने आई, जब महिला एवं बाल विकास विभाग के अधीन संचालित प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 अपचारी किशोर दीवार फांदकर फरार हो गए, इस घटना ने पूरे प्रदेश में सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए थे, इसके बाद 24 जून 2026 को बाल संप्रेक्षण गृह से 11 अपचारी बालक खिड़की तोड़कर फरार हो गए, विभाग ने जांच के आदेश दिए और सुरक्षा मजबूत करने का दावा किया, लेकिन सुधार के दावों की पोल 14 जुलाई 2026 को फिर खुल गई, जब इसी बाल संप्रेक्षण गृह से 13 अपचारी बच्चे दोबारा भाग निकले। लगातार दूसरी घटना ने स्पष्ट कर दिया कि पहले की चूक से कोई ठोस सबक नहीं लिया गया, इसके बाद 23 जुलाई 2026 की रात प्लेस ऑफ सेफ्टी से तीन अपचारी बच्चे खिड़की तोड़कर फरार हो गए, इस घटना के साथ ही दोनों संस्थानों से फरारी की घटनाओं का आंकड़ा दो-दो पर पहुंच गया।
2012 से खाली जिला बाल संरक्षण अधिकारी का पद-पूरे मामले का एक और महत्वपूर्ण पहलू सामने आया है, जानकारी के अनुसार अंबिकापुर में जिला बाल संरक्षण अधिकारी का पद वर्ष 2012 से रिक्त है, करीब 14 वर्षों से पूरा जिला प्रभारी अधिकारी के भरोसे संचालित हो रहा है, बाल संरक्षण जैसी संवेदनशील व्यवस्था में जहां नियमित निरीक्षण, निगरानी,संस्थागत सुधार और जवाबदेही सबसे महत्वपूर्ण होती है,वहां वर्षों तक नियमित अधिकारी की नियुक्ति नहीं होना कई सवाल खड़े करता है।
क्या प्रभारी व्यवस्था पर्याप्त है?- जिला बाल संरक्षण अधिकारी की जिम्मेदारियों में शामिल हैं बाल संरक्षण संस्थाओं की निगरानी,सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित करना,निरीक्षण करना,बच्चों के पुनर्वास कार्यक्रमों की निगरानी, विभिन्न विभागों के साथ समन्वय,राज्य और जिला स्तर पर रिपोर्टिंग, ऐसे में यदि वर्षों तक पूरा तंत्र प्रभारी व्यवस्था पर चलता रहे तो यह स्वाभाविक प्रश्न है कि क्या इसका असर संस्थानों की कार्यप्रणाली पर पड़ा है?
हर घटना के बाद वही प्रक्रिया- हर बार घटना होती है, जांच समिति बनती है, रिपोर्ट तैयार होती है,सुरक्षा मजबूत करने की बात होती है,जवाबदेही तय करने की घोषणा होती है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद फिर कोई नई फरारी हो जाती है, ऐसे में जनता यह जानना चाहती है कि क्या पिछली जांच रिपोर्टों पर अमल हुआ? क्या सुरक्षा ऑडिट कराया गया? क्या खिड़कियां, दीवारें और सुरक्षा उपकरण सुधारे गए? यदि सुधारे गए तो फिर बच्चे बार-बार कैसे भाग रहे हैं?
अब शासन के सामने कई बड़े सवाल
– आखिर छह महीने में चार बार बच्चे कैसे फरार हो गए?
– दोनों संस्थानों में सुरक्षा व्यवस्था बार-बार क्यों विफल हो रही है?
– क्या सुरक्षा मानकों का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाएगा?
– 2012 से खाली जिला बाल संरक्षण अधिकारी के पद पर नियमित नियुक्ति कब होगी?
– क्या हर फरारी की घटना में जिम्मेदारी तय हुई?
– क्या संबंधित अधिकारियों पर वास्तविक कार्रवाई हुई?
– क्या अब भी केवल जांच होगी या व्यवस्था में स्थायी सुधार भी होगा?

अब स्कोर 2-2…लेकिन हार पूरी व्यवस्था की…
यदि घटनाओं को क्रमवार देखा जाए तो पहले प्लेस ऑफ सेफ्टी से 15 बच्चे भागे, फिर बाल संप्रेक्षण गृह से 11 बच्चे भागे, इसके बाद फिर बाल संप्रेक्षण गृह से 13 बच्चे फरार हुए, अब प्लेस ऑफ सेफ्टी से तीन बच्चे भाग गए,यानी प्लेस ऑफ सेफ्टी – 2 बार बाल संप्रेक्षण गृह – 2 बार यह कोई प्रतियोगिता नहीं है,बल्कि यह बताने वाला आंकड़ा है कि दोनों संस्थानों की सुरक्षा व्यवस्था समान रूप से सवालों के घेरे में है।
सबसे बड़ा संयोग या सबसे बड़ी विफलता?
23 जुलाई की घटना इसलिए और अधिक गंभीर हो जाती है क्योंकि उसी दिन कलेक्टर ने महिला एवं बाल विकास विभाग की समीक्षा बैठक ली थी,बैठक में अपचारी बच्चों के बार-बार फरार होने के मामलों पर चर्चा हुई, सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने और जिम्मेदारी तय करने की बात कही गई,यह भी कहा गया कि यदि भविष्य में फिर बच्चे भागे तो संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई की जाएगी,लेकिन विडंबना देखिए बैठक खत्म हुई और उसी रात प्लेस ऑफ सेफ्टी से तीन बच्चे फरार हो गए, यानी बैठक के बाद सुरक्षा व्यवस्था 24 घंटे भी नहीं टिक सकी, अब सवाल यह है कि क्या बैठकों में लिए गए निर्णय केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं?
दैनिक घटती-घटना ने लगातार निभाई अपनी जिम्मेदारी
इस पूरे मामले में दैनिक घटती-घटना ने लगातार अपनी पत्रकारिता की जिम्मेदारी निभाते हुए हर घटना को प्रमुखता से प्रकाशित किया, 17 फरवरी को 15 बच्चों की फरारी से लेकर 24 जून को 11 बच्चों के भागने, 30 जून को व्यवस्था की खामियों पर विशेष रिपोर्ट, 16 जुलाई को तीसरी फरारी के बाद विस्तृत विश्लेषण और अब 23 जुलाई को फिर हुई फरारी तक अखबार ने लगातार सवाल उठाए कि आखिर सुरक्षा व्यवस्था में सुधार क्यों नहीं हो रहा, समाचारों में सुरक्षा व्यवस्था, जवाबदेही, रिक्त पदों, निगरानी प्रणाली और प्रशासनिक कमियों को तथ्यों के आधार पर सामने रखा गया, इसके बावजूद फरारी की घटनाओं का सिलसिला नहीं रुका। अब लगातार चार घटनाओं के बाद यह प्रश्न और गंभीर हो गया है कि आखिर जांच रिपोर्टों और समीक्षा बैठकों का वास्तविक परिणाम क्या निकला?
जनता पूछ रही है…
– फरारी की घटनाएं कब रुकेंगी?
– क्या अगली घटना का इंतजार किया जा रहा है?
– क्या बाल संरक्षण संस्थान वास्तव में सुरक्षित हैं?
– क्या बच्चों की सुरक्षा की जिम्मेदारी केवल कागजों तक सीमित है?
– क्या वर्षों से रिक्त पदों को भरने की दिशा में कोई ठोस कदम उठाया जाएगा?

अपचारी बच्चों के फरार होने की घटनाओं की सारणी (वर्ष 2026)

संस्थावार स्थिति

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