- 1970 में बना स्कूल अब खुद सहारे की तलाश में, बारिश में कक्षाएं बनीं तालाब,छत से झड़ रहा प्लास्टर,कभी भी हो सकता है बड़ा हादसा
- शिक्षा के मंदिर की बदहाल तस्वीर,जर्जर स्कूल में मौत के साये तले पढ़ रहे छात्र
- 1970 में बना स्कूल अब खुद सहारे का मोहताज,बारिश में कक्षाएं बनीं तालाब
- सोनहत का 54 साल पुराना स्कूल बना हादसे का इंतजार,छत टपकी तो एक कोने में सिमटे छात्र
- करोड़ों की शिक्षा योजनाएं,लेकिन स्कूल की छत से टपक रहा पानी
- जर्जर भवन में चल रही पढ़ाई, हर बारिश के साथ बढ़ रहा हादसे का खतरा
- बच्चों की पढ़ाई या जान से खिलवाड़? 54 साल पुराने स्कूल की भयावह हकीकत
- कहीं देर न हो जाए…जर्जर स्कूल भवन में हर दिन हादसे के साये में शिक्षा
-राजन पाण्डेय-
सोनहत,23 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। शिक्षा को बेहतर बनाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च करने का दावा करती हैं,स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा,नई शिक्षा नीति और गुणवत्तापूर्ण अधोसंरचना जैसे बड़े-बड़े वादे किए जाते हैं,लेकिन कोरिया जिले के दूरस्थ आदिवासी विकासखंड सोनहत स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय की स्थिति इन सभी दावों पर गंभीर सवाल खड़े करती है। वर्ष 1970 में स्थापित यह विद्यालय आज 54 वर्ष पुराने जर्जर भवन में संचालित हो रहा है,जहां छात्र-छात्राएं हर दिन पढ़ाई से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करने को मजबूर हैं,बरसात शुरू होते ही विद्यालय की हालत इतनी खराब हो जाती है कि कई कक्षाएं पानी से भर जाती हैं,छत से लगातार पानी टपकता रहता है और दीवारों से सीलन के साथ प्लास्टर झड़ने लगता है, इसके बावजूद सैकड़ों छात्र-छात्राएं इसी भवन में बैठकर पढ़ाई करने को विवश हैं।
क्या किसी बड़ी दुर्घटना का इंतजार है?-यह पहला अवसर नहीं है जब किसी सरकारी स्कूल की जर्जर स्थिति चर्चा में आई हो,प्रदेश में पहले भी कई स्थानों पर स्कूल भवनों की छत गिरने,दीवार ढहने और प्लास्टर गिरने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं,ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन किसी दुर्घटना के बाद ही जागेगा? क्या बच्चों की सुरक्षा केवल कागजों तक सीमित रह गई है?
54 साल पुराना भवन अब जवाब दे रहा है-वर्ष 1970 में बने इस विद्यालय ने कई पीढि़यों को शिक्षा दी है, लेकिन समय के साथ भवन पूरी तरह जर्जर हो चुका है, स्थानीय लोगों का कहना है कि वर्षों से नए भवन की मांग की जा रही है,अनेक बार अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों को ज्ञापन भी सौंपे गए,इसके बावजूद आज तक कोई ठोस पहल दिखाई नहीं दी।
करोड़ों की योजनाएं,लेकिन स्कूल अब भी बदहाल-सरकार शिक्षा के क्षेत्र में लगातार बजट बढ़ाने की बात करती है,स्कूलों के आधुनिकीकरण,स्मार्ट क्लास, डिजिटल शिक्षा और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार के दावे किए जाते हैं,लेकिन सोनहत का यह विद्यालय उन दावों की जमीनी हकीकत बयान कर रहा है,जब बच्चों के सिर पर सुरक्षित छत ही नहीं है,तब आधुनिक शिक्षा की बातें स्थानीय लोगों को खोखली लगती हैं।
ग्रामीणों ने दी आंदोलन की चेतावनी-स्थानीय ग्रामीणों,अभिभावकों और विद्यार्थियों ने स्पष्ट कहा है कि यदि जल्द ही विद्यालय के लिए नए भवन की स्वीकृति नहीं दी गई अथवा तब तक सुरक्षित वैकल्पिक भवन में कक्षाओं का संचालन शुरू नहीं किया गया, तो वे लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन करने को मजबूर होंगे,उनका कहना है कि बच्चों की सुरक्षा से बड़ा कोई मुद्दा नहीं हो सकता।
जनता के सवाल
क्या प्रशासन किसी बड़े हादसे का इंतजार कर रहा है?
54 वर्ष पुराने जर्जर भवन में आखिर कब तक पढ़ेंगे छात्र?
शिक्षा के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद सुरक्षित विद्यालय भवन क्यों उपलब्ध नहीं हो पा रहा?
क्या ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों की सुरक्षा शासन की प्राथमिकता में शामिल नहीं है?
यदि कोई दुर्घटना होती है तो उसकी जिम्मेदारी कौन लेगा?
अब निर्णय प्रशासन को लेना है…
सोनहत का शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय केवल एक जर्जर इमारत नहीं,बल्कि ग्रामीण शिक्षा व्यवस्था की उपेक्षा का प्रतीक बनता जा रहा है, हर दिन सैकड़ों छात्र-छात्राएं डर और असुरक्षा के बीच पढ़ाई करने पहुंचते हैं। शिक्षक भी जोखिम उठाकर अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं, अब जरूरत केवल आश्वासनों की नहीं, बल्कि तत्काल कार्रवाई की है,या तो विद्यालय के लिए नए भवन की स्वीकृति दी जाए या तब तक सुरक्षित वैकल्पिक भवन में कक्षाओं का संचालन सुनिश्चित किया जाए, क्योंकि शिक्षा का अधिकार तभी सार्थक होगा, जब विद्यालय केवल पढ़ाई का केंद्र ही नहीं, बल्कि बच्चों के लिए सुरक्षित स्थान भी होगा।
बारिश शुरू होते ही कक्षा नहीं,तालाब बन जाता है स्कूल
मानसून की पहली अच्छी बारिश के साथ ही विद्यालय की असल तस्वीर सामने आ जाती है,कई कमरों की छतें पूरी तरह से रिसने लगती हैं,छत से गिरता पानी सीधे फर्श पर जमा हो जाता है और कुछ ही देर में पूरी कक्षा तालाब जैसी नजर आने लगती है, ऐसी स्थिति में बच्चों को अपनी बेंच-डेस्क एक कोने में खिसकाकर बैठना पड़ता है, जहां किसी तरह पानी कम टपक रहा हो,कई बार पूरी कक्षा को एक ही कोने में बैठकर पढ़ाई करनी पड़ती है,शिक्षक भी मजबूरी में उसी स्थिति में पढ़ाई कराते हैं,क्योंकि वैकल्पिक कक्ष उपलब्ध नहीं हैं।
हर पल सिर पर मंडराता खतरा
विद्यालय भवन केवल पुराना ही नहीं,बल्कि अब बेहद जर्जर भी हो चुका है,छतों में जगह-जगह बड़ी दरारें दिखाई दे रही हैं। कई स्थानों से प्लास्टर पूरी तरह झड़ चुका है,लोहे के एंगल जंग खा चुके हैं और टीन शेड भी क्षतिग्रस्त हो चुके हैं, सबसे बड़ी चिंता यह है कि बारिश के दौरान लगातार नमी बढ़ने से भवन की मजबूती पर भी असर पड़ रहा है,शिक्षकों और अभिभावकों का कहना है कि यदि समय रहते नए भवन की व्यवस्था नहीं हुई या व्यापक मरम्मत नहीं कराई गई, तो किसी भी दिन बड़ा हादसा हो सकता है।
शिक्षक भी हैं परेशानी में…
समस्या केवल विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है, विद्यालय का स्टाफ रूम भी पानी टपकने से प्रभावित है, शिक्षकों को बैठने तक के लिए सुरक्षित स्थान नहीं मिल पा रहा, विद्यालय के महत्वपूर्ण अभिलेख, परीक्षा रिकॉर्ड, अंकसूचियां, उपस्थिति रजिस्टर, प्रयोगशाला सामग्री, पुस्तकालय की पुस्तकें तथा अन्य शैक्षणिक सामग्री भी पानी से खराब होने की कगार पर हैं, हर बारिश के साथ सबसे बड़ी चिंता यह रहती है कि सरकारी रिकॉर्ड कैसे सुरक्षित रखे जाएं।
पढ़ाई से ज्यादा चिंता सुरक्षा की…
विद्यालय में अध्ययनरत विद्यार्थियों का कहना है कि बरसात के दिनों में उनका पूरा ध्यान पढ़ाई पर नहीं रह पाता, कभी छत से पानी टपकता है,कभी प्लास्टर गिरता है तो कभी पूरी कक्षा में पानी भर जाता है, ऐसे माहौल में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की कल्पना करना भी मुश्किल दिखाई देता है।
अभिभावकों में बढ़ रही बेचैनी…
बच्चों के अभिभावकों का कहना है कि हर दिन बच्चों को स्कूल भेजते समय मन में डर बना रहता है, उन्हें आशंका रहती है कि कहीं अचानक छत का प्लास्टर न गिर जाए,दीवार का कोई हिस्सा न टूट जाए या पानी के कारण बिजली का कोई हादसा न हो जाए, अभिभावकों का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी उनकी जान की सुरक्षा है।
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