- शासन ने खत्म किया संलग्नीकरण,एमसीबी ने निकाला नया फॉर्मूला! 27 शिक्षकों को मिला दोहरा दायित्व
- संलग्नीकरण खत्म… या सिर्फ नाम बदला? एमसीबी में 27 शिक्षकों को फिर मिला छात्रावासों का जिम्मा
- स्कूल भी,छात्रावास भी : संलग्नीकरण खत्म होने के बाद एमसीबी का नया प्रयोग चर्चा में…
- संलग्नीकरण पर नया ‘फॉर्मूला’,एमसीबी में 27 शिक्षकों को अतिरिक्त प्रभार,उठे कई सवाल
- शिक्षा विभाग का आदेश और एमसीबी का मॉडल,खत्म हुआ संलग्नीकरण या बदल गई परिभाषा?
- स्कूल लौटे शिक्षक,फिर मिला छात्रावास का जिम्मा, एमसीबी के आदेश पर प्रशासनिक बहस तेज
- एक आदेश खत्म, दूसरा शुरू! एमसीबी में ‘अतिरिक्त प्रभार’ ने फिर छेड़ी संलग्नीकरण की बहस
- संलग्नीकरण खत्म…या सिर्फ नाम बदला?
- एमसीबी में 27 शिक्षकों को फिर मिला छात्रावासों
-रवि सिंह-
एमसीबी/कोरिया,21 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। शिक्षा विभाग में वर्षों से विवाद का विषय रही संलग्नीकरण व्यवस्था को समाप्त करने के लिए राज्य शासन ने हाल ही में बड़ा फैसला लिया था,सरकार ने स्पष्ट निर्देश जारी किए कि शिक्षा विभाग के शिक्षक और गैर शिक्षकीय कर्मचारी अपने मूल पदस्थापना स्थल पर लौटेंगे और सभी प्रकार के संलग्नीकरण समाप्त किए जाएंगे, शिक्षा मंत्री ने भी स्पष्ट शब्दों में कहा था कि शिक्षक पढ़ाने के लिए हैं,इसलिए उन्हें स्कूलों में ही रहना चाहिए। इस आदेश के बाद पूरे प्रदेश में हलचल मच गई, वर्षों से विभिन्न कार्यालयों,आश्रम-छात्रावासों और अन्य संस्थाओं में कार्यरत संलग्न शिक्षकों के बीच बेचैनी बढ़ गई,कई जिलों में कलेक्टरों ने तत्काल कार्रवाई करते हुए संलग्नीकरण समाप्त करने के निर्देश जारी किए,एमसीबी और कोरिया जिले में भी आदिम जाति विकास विभाग के छात्रावासों में वर्षों से कार्यरत शिक्षकों को उनके मूल विद्यालयों में लौटने के आदेश जारी हो गए,ऐसा लगा कि अब संलग्नीकरण का अध्याय समाप्त हो जाएगा,लेकिन कुछ ही दिनों बाद एमसीबी जिले से जारी एक नए आदेश ने पूरे मामले को फिर चर्चा के केंद्र में ला दिया।
स्कूल भी…छात्रावास भी…आखिर कैसे?- सरकारी आदेशों में दोहरी जिम्मेदारी लिख देना आसान है, लेकिन व्यवहारिक रूप से यह व्यवस्था कितनी सफल होगी? एक शिक्षक को प्रतिदिन विद्यालय में अध्यापन करना है। वहीं छात्रावास अधीक्षक के रूप में उसे विद्यार्थियों की उपस्थिति, भोजन, स्वास्थ्य, अनुशासन, सुरक्षा, अभिभावकों से संपर्क,आकस्मिक परिस्थितियों और रात्रिकालीन व्यवस्था पर भी नजर रखनी होगी,ऐसे में प्रश्न यह उठ रहा है कि क्या दोनों जिम्मेदारियां समान गुणवत्ता के साथ निभाई जा सकेंगी? यदि शिक्षक विद्यालय में रहेंगे तो छात्रावास कौन देखेगा, और यदि छात्रावास में अधिक समय देंगे तो विद्यालय की पढ़ाई प्रभावित होगी या नहीं?
27 शिक्षकों को फिर मिला छात्रावास का दायित्व
15 जुलाई 2026 को कलेक्टर (आदिवासी विकास) कार्यालय,एमसीबी द्वारा जारी आदेश में जिले के 27 शिक्षकों को उनके मूल विद्यालय में अध्यापन कार्य करते हुए विभिन्न आश्रम एवं छात्रावासों का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया,आदेश में स्पष्ट किया गया कि संबंधित कर्मचारी अपने मूल पद पर कार्य करेंगे,साथ ही छात्रावासों की व्यवस्थाओं का संचालन भी करेंगे, उनका वेतन मूल संस्था से ही आहरित होगा तथा नियमानुसार अन्य प्रावधान लागू रहेंगे,यहीं से सवालों का सिलसिला शुरू हो गया।
संलग्नीकरण खत्म हुआ या उसकी परिभाषा बदल गई?
शासन के आदेश का मूल उद्देश्य था कि शिक्षक केवल अपने विद्यालयों में रहें और अध्यापन कार्य प्रभावित न हो,लेकिन अब जब वही शिक्षक स्कूल के साथ-साथ छात्रावास भी संभालेंगे,तो शिक्षा जगत में यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है,या केवल उसका नाम बदल गया है? पहले शिक्षक छात्रावास में ‘संलग्न’ थे,अब वे ‘अतिरिक्त दायित्व’ निभाएंगे,फाइलों की भाषा बदल गई, लेकिन जमीन पर व्यवस्था कितनी बदली,यही सबसे बड़ा प्रश्न बन गया है।
सरकार का उद्देश्य क्या था?
शासन द्वारा संलग्नीकरण समाप्त करने का निर्णय इसलिए लिया गया था क्योंकि लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं कि अनेक शिक्षक अपने मूल विद्यालयों में न जाकर अन्य स्थानों पर कार्य कर रहे हैं,जिससे स्कूलों में शिक्षकों की कमी पैदा हो रही है,सरकार का उद्देश्य था कि प्रत्येक शिक्षक अपने मूल विद्यालय में लौटे और विद्यार्थियों को नियमित पढ़ाई मिल सके,अब यदि अतिरिक्त दायित्व के नाम पर वही शिक्षक फिर छात्रावासों में जिम्मेदारी निभाने लगें,तो इस निर्णय के मूल उद्देश्य को लेकर भी चर्चा होना स्वाभाविक है।
निकटस्थ संकुल का नया फॉर्मूला
जारी आदेश का अवलोकन करने पर यह भी सामने आता है कि अधिकांश मामलों में संबंधित छात्रावासों के निकट स्थित विद्यालयों के शिक्षकों को ही अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। इससे यह संकेत मिलता है कि प्रशासन ने दूरी कम रखने और स्थानीय स्तर पर व्यवस्था बनाए रखने का प्रयास किया है,प्रशासनिक दृष्टि से यह व्यवस्था व्यावहारिक मानी जा सकती है, लेकिन इससे यह बहस भी शुरू हो गई है कि यदि यही मॉडल पहले अपनाया जा सकता था, तो वर्षों तक पूर्णकालिक संलग्नीकरण की आवश्यकता क्यों पड़ी?
कोरिया जिले में भी बढ़ी हलचल
एमसीबी के आदेश के बाद कोरिया जिले के शिक्षकों और छात्रावासों में कार्यरत कर्मचारियों के बीच भी चर्चाएं तेज हो गई हैं,चर्चा है कि यदि कोरिया में भी इसी प्रकार की व्यवस्था लागू होती है तो संकुल और निकटस्थ संकुल के शिक्षकों को छात्रावासों की जिम्मेदारी दी जा सकती है, हालांकि अभी तक इस संबंध में कोई आधिकारिक आदेश जारी नहीं हुआ है।
वर्षों से छात्रावासों में जमे शिक्षकों का क्या होगा?
संलग्नीकरण समाप्ति की कार्रवाई के दौरान ऐसे कई शिक्षक मूल विद्यालयों में लौटे जो लंबे समय से छात्रावासों में कार्यरत थे,इनमें कुछ ऐसे भी थे जो पदोन्नति के बाद भी वर्षों तक विद्यालयों में नियमित रूप से नहीं लौटे थे,अब बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में छात्रावासों की जिम्मेदारी किसे मिलेगी? क्या निकटस्थ विद्यालयों के शिक्षक ही यह जिम्मेदारी निभाएंगे या फिर पुराने अनुभव के आधार पर वही शिक्षक दोबारा व्यवस्था का हिस्सा बनेंगे?
दोहरी जिम्मेदारी पर शिक्षक क्या सोचते हैं?
नई व्यवस्था में अतिरिक्त वेतन का कोई उल्लेख नहीं है,ऐसे में यह जानना भी महत्वपूर्ण होगा कि शिक्षक इस व्यवस्था को किस नजर से देखते हैं,क्या इसे सेवा का अतिरिक्त दायित्व माना जा रहा है? क्या इससे विद्यालय और छात्रावास दोनों की व्यवस्था बेहतर होगी? या फिर शिक्षक संगठनों की ओर से इस पर कोई अलग राय सामने आएगी? इन सवालों के जवाब आने वाले समय में ही स्पष्ट होंगे।
छात्र सबसे महत्वपूर्ण कड़ी…
पूरे विवाद के बीच सबसे महत्वपूर्ण पक्ष छात्र हैं,विद्यालयों में पढ़ने वाले बच्चे हों या छात्रावासों में रहने वाले विद्यार्थी—दोनों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुरक्षित वातावरण मिलना चाहिए,यदि नई व्यवस्था से दोनों संस्थानों का संचालन बेहतर होता है तो इसे सकारात्मक कदम माना जाएगा,लेकिन यदि किसी भी स्तर पर पढ़ाई,अनुशासन या छात्रावास प्रबंधन प्रभावित होता है तो प्रशासन को समय रहते समीक्षा करनी होगी।
शासन से अपेक्षा
एमसीबी जिले का यह आदेश अब पूरे सरगुजा संभाग में चर्चा का विषय है,शासन द्वारा संलग्नीकरण समाप्त करने के निर्णय के बाद यह पहला बड़ा प्रशासनिक मॉडल सामने आया है, अब आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा विभाग और आदिम जाति विकास विभाग संयुक्त रूप से स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करें कि छात्रावासों में अधीक्षक की व्यवस्था किस प्रकार संचालित होगी,अतिरिक्त दायित्व की सीमा क्या होगी और यह व्यवस्था अस्थायी है या स्थायी, क्योंकि यदि हर जिले में अलग-अलग मॉडल अपनाए गए तो भविष्य में फिर वही भ्रम की स्थिति पैदा हो सकती है,जिसे समाप्त करने के लिए संलग्नीकरण खत्म करने का निर्णय लिया गया था,एमसीबी का आदेश फिलहाल इतना जरूर बता रहा है कि संलग्नीकरण की बहस समाप्त नहीं हुई है,उसका स्वरूप बदल गया है,और अब यह बहस इस बात पर केंद्रित है कि क्या अतिरिक्त दायित्व की यह व्यवस्था शासन की मूल मंशा के अनुरूप है या फिर प्रशासनिक आवश्यकता के तहत निकाला गया एक व्यावहारिक समाधान।
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