- पण्डो समाज का सवाल-जब ग्राम सभा का प्रस्ताव मान्य है तो 80 साल पुराने दस्तावेज क्यों?
- जाति प्रमाण पत्र के लिए 1946 का रिकॉर्ड! विशेष पिछड़ी जनजाति पण्डो ने कलेक्टर से लगाई गुहार
- कमिश्नर की रिपोर्ट में ‘भुइंहार-परहिया’ पण्डो की उपजाति,फिर भी
- प्रमाण पत्र पर अड़चन क्यों?
- शासन के आदेश अलग,जमीनी हकीकत अलग! जाति प्रमाण पत्र के लिए भटक रहा पण्डो समाज
- 1946 के दस्तावेज नहीं,इसलिए नहीं मिल रहा अधिकार? पण्डो समाज ने उठाए प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल
- जाति प्रमाण पत्र के अभाव में शिक्षा और नौकरी पर संकट,पण्डो समाज ने मांगा कलेक्टर का हस्तक्षेप
- कागजों में उलझा पण्डो समाजः
- आयोग की गाइडलाइन के बावजूद जाति प्रमाण-पत्र के लिए लंबा इंतजार
-राजन पाण्डेय-
सोनहत/कोरिया,21 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ की विशेष पिछड़ी जनजाति (पीवीटीजी) पण्डो समाज आज एक ऐसी प्रशासनिक उलझन में फंस गया है, जिसने समाज की नई पीढ़ी के भविष्य पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया है, जिस जाति ने सदियों तक जंगलों और पहाड़ों के बीच प्रकृति के साथ अपना जीवन व्यतीत किया, आज उसी समाज के युवाओं से 1946-47 के भूमि राजस्व अभिलेख प्रस्तुत करने की अपेक्षा की जा रही है, ऐसे दस्तावेज, जो अधिकांश परिवारों के पास कभी थे ही नहीं, अब जाति प्रमाण पत्र का आधार बनाए जा रहे हैं, इस स्थिति ने सैकड़ों छात्र-छात्राओं की उच्च शिक्षा,छात्रवृत्ति,प्रतियोगी परीक्षाओं और सरकारी नौकरियों के रास्ते रोक दिए हैं,पण्डो जनजाति कल्याण समिति ने इसे केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि समाज के भविष्य से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए जिला कलेक्टर से तत्काल हस्तक्षेप की मांग की है।
नई पीढ़ी के सपनों पर लग गया विराम-जाति प्रमाण पत्र नहीं बनने का सबसे अधिक असर विद्यार्थियों और युवाओं पर पड़ रहा है,समिति के अनुसार कई छात्र-छात्राएं कॉलेजों में अनुसूचित जनजाति कोटे का लाभ नहीं ले पा रहे हैं, छात्रवृत्तियां रुक रही हैं, प्रतियोगी परीक्षाओं में आरक्षण का लाभ नहीं मिल रहा और अनेक युवा सरकारी नौकरियों के आवेदन से ही वंचित हो रहे हैं,समाज का कहना है कि प्रशासनिक प्रक्रिया की जटिलता के कारण प्रतिभाशाली युवाओं का भविष्य अंधकारमय होता जा रहा है।
जब आयोग ने ग्राम सभा के प्रस्ताव को पर्याप्त माना,फिर आपत्ति क्यों?- समिति ने अपने ज्ञापन में छत्तीसगढ़ राज्य अनुसूचित जनजाति आयोग द्वारा वर्ष 2014 में जारी दिशा-निर्देशों का उल्लेख किया है,आयोग की कंडिका-11 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति के पास जाति सिद्ध करने के लिए आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं,तो ग्राम सभा द्वारा पारित प्रस्ताव को पर्याप्त आधार मानते हुए जाति प्रमाण पत्र जारी किया जा सकता है,पण्डो समाज का आरोप है कि इस स्पष्ट व्यवस्था के बावजूद कई मामलों में ग्राम सभा के प्रस्ताव को पर्याप्त महत्व नहीं दिया जा रहा और पुराने राजस्व अभिलेखों पर ही जोर दिया जा रहा है, समिति का सवाल है कि जब आयोग ने वैकल्पिक व्यवस्था निर्धारित कर दी है तो उसका पालन क्यों नहीं हो रहा।
पहले बने प्रमाण पत्र,अब क्यों बदले नियम?- पण्डो समाज के लोगों का कहना है कि पूर्व वर्षों में शासन के दिशा-निर्देशों के अनुरूप अनेक लोगों के जाति प्रमाण पत्र जारी किए गए थे, समिति का प्रश्न है कि यदि उसी प्रकार के मामलों में पहले प्रमाण पत्र जारी किए जा सकते थे,तो अब उन्हीं परिस्थितियों में लोगों को क्यों भटकना पड़ रहा है? समाज ने प्रशासन से एक समान नीति अपनाने और सभी पात्र परिवारों को समान अवसर देने की मांग की है।
भूमि माफियाओं के सक्रिय होने की भी आशंका- समिति ने ज्ञापन में एक और गंभीर चिंता व्यक्त की है, उनका कहना है कि पुराने रिकॉर्ड की त्रुटियों और दस्तावेजों की अनुपलब्धता का फायदा कुछ भूमि माफिया और बिचौलिए उठा रहे हैं,समिति का आरोप है कि सीधे-साधे आदिवासी परिवारों को भ्रमित कर उनकी भूमि और अधिकारों पर प्रभाव डालने की कोशिशें की जा रही हैं,यदि शासन के आदेशों का सही ढंग से पालन कराया जाए तो इस प्रकार के शोषण पर भी रोक लगाई जा सकती है।
कलेक्टर से की गई प्रमुख मांगें-पण्डो जनजाति कल्याण समिति ने जिला कलेक्टर से मांग की है कि जिले के सभी एसडीएम (राजस्व) एवं तहसीलदारों को स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं,आयोग,कमिश्नर कार्यालय और विभागीय आदेशों का पालन सुनिश्चित कराया जाए,जहां पुराने दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं,वहां ग्राम सभा के प्रस्ताव को पर्याप्त आधार माना जाए,लिपिकीय त्रुटियों और स्थानीय नामों के अंतर के कारण किसी पात्र व्यक्ति को वंचित न किया जाए,जाति प्रमाण पत्र जारी करने की प्रक्रिया को सरल,पारदर्शी और समयबद्ध बनाया जाए।
प्रशासन के सामने परीक्षा,
क्या मिलेगा समाधान?
पण्डो समाज का यह मुद्दा केवल एक प्रमाण पत्र तक सीमित नहीं है,यह शिक्षा,रोजगार,सामाजिक न्याय और संवैधानिक अधिकारों से जुड़ा प्रश्न है, यदि शासन द्वारा जारी दिशा-निर्देशों और विभागीय आदेशों का प्रभावी पालन होता है तो बड़ी संख्या में पात्र परिवारों को राहत मिल सकती है,अब निगाहें जिला प्रशासन पर टिकी हैं कि वह इस विषय में क्या निर्णय लेता है और क्या विशेष पिछड़ी जनजाति के युवाओं को लंबे समय से चली आ रही इस समस्या से राहत मिल पाती है।
इनका कहना है…
‘राजस्व रिकॉर्ड की त्रुटियों और पुराने कागजातों की अनुपलब्धता का अनुचित लाभ उठाकर भूमि माफिया और बिचौलिए सीधे-साधे आदिवासियों का शोषण कर रहे हैं। यदि शासन और कमिश्नर कार्यालय के निर्देशों का अक्षरशःपालन करते हुए एसडीएम (राजस्व) और तहसीलदारों को स्पष्ट निर्देश दिए जाएं, तो पण्डो समाज को इस गंभीर समस्या से राहत मिल सकती है। ‘
पवन साय पण्डो,प्रदेश सह सचिव, पण्डो जनजाति कल्याण समिति
जाति प्रमाण पत्र बना सबसे बड़ी चुनौती
कोरिया जिले में पण्डो समाज के लोगों का कहना है कि आज सबसे बड़ी समस्या भोजन, आवास या रोजगार नहीं, बल्कि जाति प्रमाण पत्र बनवाना है, बिना जाति प्रमाण पत्र के अनुसूचित जनजाति वर्ग को मिलने वाले अधिकांश संवैधानिक और शासकीय लाभ प्राप्त नहीं हो सकते, समिति के प्रदेश सह सचिव पवन साय पण्डो ने कलेक्टर को सौंपे ज्ञापन में कहा है कि वर्तमान में कई मामलों में राजस्व विभाग द्वारा जाति प्रमाण पत्र जारी करने के लिए 1946-47 के भूमि राजस्व अभिलेख मांगे जा रहे हैं, यह शर्त ऐसे समाज पर लागू की जा रही है, जिसके अधिकांश पूर्वज कभी राजस्व अभिलेखों में दर्ज ही नहीं हुए, समिति का कहना है कि यह प्रक्रिया न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि शासन की भावना के भी विपरीत है।
जंगलों में रहने वाले समाज से 80 साल
पुराने दस्तावेज मांगना कितना न्यायसंगत?
पण्डो समाज छत्तीसगढ़ की उन विशेष पिछड़ी जनजातियों में शामिल है, जिनका पारंपरिक जीवन जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़ा रहा है, समाज के बुजुर्ग बताते हैं कि उनके पूर्वजों के पास न तो भूमि के स्वामित्व संबंधी अभिलेख थे और न ही उस समय राजस्व रिकॉर्ड में उनका व्यवस्थित पंजीयन हुआ था, ऐसे में वर्तमान पीढ़ी से 1946-47 के दस्तावेज मांगना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है। समिति का कहना है कि प्रशासनिक स्तर पर इसी कारण बड़ी संख्या में आवेदन लंबित हैं और पात्र लोगों को भी जाति प्रमाण पत्र नहीं मिल पा रहा है।
कमिश्नर की रिपोर्ट में भी मिल चुका है स्पष्ट आधार
ज्ञापन में सरगुजा संभाग के तत्कालीन आयुक्त कार्यालय द्वारा वर्ष 2022 में कराए गए विस्तृत क्षेत्रीय अध्ययन एवं अनुसंधान प्रतिवेदन का भी उल्लेख किया गया है, समिति के अनुसार इस अध्ययन में स्पष्ट कहा गया है कि राजस्व अभिलेखों में दर्ज ‘भुइंहार’, ‘परहिया’ और ‘पहारिया’ अलग-अलग जातियां नहीं हैं, बल्कि पण्डो जनजाति के स्थानीय नाम अथवा उपजातियां हैं, समाज का कहना है कि कई बार पुराने दस्तावेजों में स्थानीय बोली के कारण अलग-अलग नाम दर्ज हो गए, लेकिन इससे मूल जनजातीय पहचान नहीं बदल जाती, इसलिए केवल नामों के अंतर के आधार पर किसी पात्र व्यक्ति को अनुसूचित जनजाति का लाभ देने से वंचित नहीं किया जाना चाहिए।
विभाग ने भी दिए थे त्रुटियां सुधारने के निर्देश
पण्डो समाज ने अपने ज्ञापन में यह भी उल्लेख किया है कि आदिम जाति तथा अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा वर्ष 2022 में जारी आदेशों में स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि पुराने राजस्व अभिलेखों में स्थानीय भाषा, लिपिकीय त्रुटियों अथवा नामों में अंतर के कारण उत्पन्न विवादों का समाधान करते हुए पात्र लोगों को जाति प्रमाण पत्र जारी किया जाए, समिति का कहना है कि यदि इन आदेशों का प्रभावी पालन हो तो अधिकांश विवाद स्वतः समाप्त हो जाएंगे, लेकिन जमीनी स्तर पर इनका अपेक्षित पालन नहीं हो रहा।
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