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खड़गवां/एमसीबी @ ग्रामीणों ने मांगी गांव-गांव भौतिक जांच,वैक्सीन खपत और रिकॉर्ड की निष्पक्ष पड़ताल की मांग

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-राजेन्द्र शर्मा-
खड़गवां/एमसीबी,20 जुलाई 2026 (घटती-घटना)।
एमसीबी जिले में पशुपालन विभाग द्वारा संचालित टीकाकरण अभियान अब सवालों के घेरे में है, ग्रामीणों और पशुपालकों का दावा है कि जिले के कई गांवों में न तो टीकाकरण दल पहुंचे और न ही पशुओं को वैक्सीन लगाई गई,जबकि शासन को संबंधित क्षेत्रों में 100 प्रतिशत टीकाकरण पूरा होने की रिपोर्ट भेजे जाने की चर्चा है,यदि यह दावा और जमीनी स्थिति में अंतर है,तो अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि शासन से प्राप्त वैक्सीन का उपयोग आखिर कहां हुआ? मामले को लेकर स्थानीय स्तर पर चर्चा तेज हो गई है,ग्रामीणों का कहना है कि यदि गांवों में टीकाकरण अभियान चला ही नहीं,तो फिर शत-प्रतिशत सफलता की रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई,उनका मानना है कि पूरे मामले की केवल कागजी जांच नहीं,बल्कि गांव-गांव जाकर स्वतंत्र और निष्पक्ष भौतिक सत्यापन होना चाहिए।
जमीन पर दावा कुछ और,रिकॉर्ड में कुछ और?-पशुपालकों का आरोप है कि कई गांवों में टीकाकरण दल कभी पहुंचे ही नहीं, कई पशुपालकों का कहना है कि उनके पशुओं को इस अभियान के दौरान कोई टीका नहीं लगाया गया,दूसरी ओर यदि विभागीय अभिलेखों में इन गांवों को भी पूर्ण टीकाकृत दिखाया गया है,तो रिकॉर्ड और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की आशंका पैदा होती है, हालांकि,इन दावों की आधिकारिक पुष्टि स्वतंत्र रूप से नहीं हुई है और इसी कारण स्थानीय लोग निष्पक्ष जांच की मांग कर रहे हैं।
सबसे बड़ा सवाल—वैक्सीन गई कहाँ?- पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू वैक्सीन की उपलब्धता और उसके उपयोग को लेकर है, यदि शासन ने जिले के विकासखंडों को निर्धारित संख्या में वैक्सीन उपलब्ध कराई थी, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि कितनी वैक्सीन जिले को प्राप्त हुई?किस विकासखंड को कितनी मात्रा आवंटित की गई? कितनी वैक्सीन का उपयोग दर्ज किया गया? कितनी वैक्सीन शेष बची और उसका रिकॉर्ड क्या है? यदि रिकॉर्ड में पूरी वैक्सीन उपयोग होना दर्शाया गया है, लेकिन कुछ गांवों में टीकाकरण नहीं हुआ, तो जांच का विषय यह होगा कि वैक्सीन का वास्तविक उपयोग किस प्रकार हुआ।
स्टॉक रजिस्टर से लेकर कोल्ड-चेन तक जांच की मांग- ग्रामीणों और पशुपालकों ने मांग की है कि जांच केवल टीकाकरण रिपोर्ट तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, उनका कहना है कि निम्नलिखित दस्तावेजों की भी गहन जांच की जाए वैक्सीन स्टॉक रजिस्टर, विकासखंडवार वितरण रजिस्टर,गांववार टीकाकरण विवरण,कोल्ड-चेन रखरखाव रिकॉर्ड, वैक्सीन प्राप्ति एवं उपयोग संबंधी अभिलेख, अभियान से जुड़े अधिकारियों और कर्मचारियों की कार्यवाही रिपोर्ट, इन सभी दस्तावेजों का आपस में मिलान करने से वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
भौतिक सत्यापन ही बताएगा सच्चाई- स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जांच केवल कार्यालयों में बैठकर की गई तो सच्चाई सामने आना कठिन होगा,उनकी मांग है कि प्रत्येक गांव में जाकर पशुपालकों से जानकारी ली जाए कि उनके पशुओं का वास्तव में टीकाकरण हुआ था या नहीं, यदि गांववार सर्वे कराया जाता है, तो रिकॉर्ड और जमीनी स्थिति का अंतर आसानी से सामने आ सकता है।
यदि अंतर मिला तो मामला गंभीर हो सकता है-यदि जांच में यह सामने आता है कि रिकॉर्ड में टीकाकरण दर्शाया गया लेकिन वास्तविकता में अभियान पूरा नहीं हुआ,तो मामला केवल आंकड़ों की त्रुटि तक सीमित नहीं रहेगा,ऐसी स्थिति में वैक्सीन के उपयोग, सरकारी संसाधनों के प्रबंधन और विभागीय जवाबदेही जैसे मुद्दों की भी जांच आवश्यक हो सकती है, हालांकि, यह सब जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
जांच में इन बिंदुओं पर हो विशेष पड़ताल- स्थानीय लोगों ने मांग की है कि जांच के दौरान विशेष रूप से इन प्रश्नों के उत्तर तलाशे जाएं शासन से जिले को कुल कितनी वैक्सीन प्राप्त हुई? प्रत्येक विकासखंड को कितनी वैक्सीन वितरित की गई? गांववार कितने पशुओं का टीकाकरण दर्ज किया गया? बची हुई वैक्सीन का स्टॉक कहां और कितना है? जिन गांवों में टीकाकरण नहीं होने का दावा किया जा रहा है,वहां 100 प्रतिशत सफलता की रिपोर्ट किस आधार पर तैयार की गई? वैक्सीन वितरण और उपयोग के लिए कौन-कौन अधिकारी एवं कर्मचारी जिम्मेदार थे?
पारदर्शी जांच से ही दूर होगा संदेह- पशुपालन विभाग का टीकाकरण अभियान पशुओं को संक्रामक बीमारियों से बचाने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है, ऐसे में यदि अभियान को लेकर किसी भी प्रकार के संदेह सामने आते हैं, तो उनका समय पर और निष्पक्ष निराकरण होना आवश्यक है, अब जिले में सबसे बड़ा प्रश्न यही है—यदि कुछ गांवों में वास्तव में टीकाकरण नहीं हुआ, तो शासन से प्राप्त वैक्सीन का उपयोग कहां और कैसे हुआ? इस प्रश्न का उत्तर केवल निष्पक्ष, दस्तावेज़-आधारित और जमीनी सत्यापन वाली जांच ही दे सकती है।


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