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अम्बिकापुर@छत्तीसगढ़ में हाथियों की मौत और जनहानि बड़ी चुनौती,रोकथाम के लिए बदलेगी रणनीति…

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पीसीसीएफ बोले…देशभर की सफल तकनीक अपनाएंगे,लेमरू एलीफेंट रिजर्व और वनभूमि संरक्षण पर रहेगा विशेष फोकस


-संवाददाता-
अम्बिकापुर,20 जुलाई 2026 (घटती-घटना)। छत्तीसगढ़ में लगातार बढ़ रहे हाथी-मानव संघर्ष और हाथियों की मौत को लेकर वन विभाग अब नई रणनीति पर काम करेगा। प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) अरुण कुमार पांडे ने कहा कि राज्य में मानव और हाथियों दोनों की जान बचाना सबसे बड़ी चुनौती है। इसके लिए देश के अन्य राज्यों में अपनाई जा रही सफल तकनीकों और आधुनिक प्रबंधन प्रणाली का अध्ययन कर उन्हें छत्तीसगढ़ में लागू किया जाएगा। उन्होंने कहा कि केवल मुआवजा देना समाधान नहीं है,बल्कि ऐसी व्यवस्था विकसित करनी होगी जिससे हाथी-मानव संघर्ष की घटनाएं ही कम हों। सरगुजा प्रवास के दौरान वन विभाग के अधिकारियों की बैठक लेने के बाद पत्रकारों से चर्चा में पीसीसीएफ ने बताया कि वर्तमान में हाथियों की निगरानी मोबाइल एप और हाथी मित्र दल के माध्यम से की जा रही है। हाथियों की गतिविधियों की पूर्व सूचना ग्रामीणों तक पहुंचाकर उन्हें सतर्क किया जाता है। उन्होंने कहा कि केरल जैसे राज्यों में हाथियों की संख्या छत्तीसगढ़ से लगभग दोगुनी है, लेकिन वहां जनहानि और हाथियों की मौत के मामले अपेक्षाकृत कम हैं। वहां अपनाई गई तकनीक और प्रबंधन प्रणाली का अध्ययन कर उसे छत्तीसगढ़ में लागू किया जाएगा। पीसीसीएफ ने स्वीकार किया कि हाथियों की मौत भी गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने कहा कि फसल और संपत्ति के नुकसान का मुआवजा सरकार देती है,लेकिन किसी व्यक्ति की जान या वन्यजीव की मौत की भरपाई संभव नहीं है। इसलिए विभाग का पूरा जोर संघर्ष की घटनाओं को रोकने और दोनों पक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित करने पर रहेगा। वनभूमि पर बढ़ते अतिक्रमण को भी उन्होंने गंभीर समस्या बताया। उन्होंने कहा कि कई क्षेत्रों में वनभूमि पर लगातार कब्जे हो रहे हैं, जिससे हाथियों के प्राकृतिक आवास प्रभावित हो रहे हैं। अधिकारियों को नियमित मॉनिटरिंग और सख्त कार्रवाई के निर्देश दिए गए हैं। एसईसीएल के अधिकारियों के साथ संयुक्त टीम बनाकर कोयला चोरी और वनभूमि पर अतिक्रमण रोकने के लिए भी अभियान चलाया जाएगा। सामाजिक वानिकी के विस्तार पर भी विशेष ध्यान दिया जाएगा। हसदेव क्षेत्र में नई कोयला खदानों के कारण पेड़ों की कटाई और जैव विविधता पर पडऩे वाले प्रभाव के संबंध में उन्होंने कहा कि इसका वास्तविक आकलन दीर्घकालिक अध्ययन के बाद ही संभव होगा। फिलहाल इस विषय पर कोई अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। उन्होंने कहा कि वन विभाग नए पौधे भी लगा रहा है और पर्यावरणीय प्रभावों की लगातार निगरानी की जा रही है। पीसीसीएफ ने बताया कि लेमरू एलीफेंट रिजर्व का क्षेत्रफल बढ़ाकर 1,995 वर्ग किलोमीटर कर दिया गया है और इसका अधिसूचना भी जारी हो चुकी है। परियोजना के लिए राशि स्वीकृत हो गई है तथा विकास कार्य जल्द गति पकड़ेंगे।
उन्होंने कहा कि संरक्षित क्षेत्रों में यदि कहीं पुनर्वास की आवश्यकता होगी तो वह पूरी तरह ग्रामीणों की सहमति और नियमानुसार ही किया जाएगा। उन्होंने कहा कि हाथी-मानव संघर्ष जैसी चुनौती का समाधान केवल वन विभाग के प्रयासों से संभव नहीं है। इसके लिए स्थानीय समुदाय, जनप्रतिनिधियों, प्रशासन और आम नागरिकों के सहयोग से दीर्घकालिक और वैज्ञानिक रणनीति पर काम करना होगा, ताकि मानव जीवन और वन्यजीव दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके।


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